क्यों घाटे का सौदा है इंजीनियर बनना, नौकरी के भी पड़े लाले

प्रतीकात्मक फोटो.
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इंजीनियरिंग की डिग्री होने पर भी आपको एक अदद नौकरी के लिए एक कंपनी से दूसरी कंपनी तक चक्कर काटने पड़ सकते हैं. लेकिन ये कवायद भी इस बात की गारंटी नहीं है कि आपको इंजीनियरिंग डिग्री के आधार पर नौकरी मिल ही जाए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 21, 2019, 4:12 PM IST
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आपने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है. आपके पास सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री है या फिर ऑटोमोबाइल की. लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि इंजीनियरिंग की भारी-भरकम डिग्री होने पर भी आपको एक अदद नौकरी के लिए एक कंपनी से दूसरी कंपनी तक चक्कर काटने पड़ सकते हैं. लेकिन ये कवायद भी इस बात की गारंटी नहीं है कि आपको इंजीनियरिंग डिग्री के आधार पर नौकरी मिल ही जाए.

अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) के आंकड़े तो इसी तरफ इशारा कर रहे हैं. एआईसीटीई के आंकड़े बताते हैं कि देशभर में अलग-अलग कॉलेजों से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने वाले 60 प्रतिशत से भी कम छात्रों को नौकरी मिल पा रही है. क्या है इसकी वजह है न्यूज18 हिन्दी ने जानी एक्सपर्ट की राय.

बिमटेक इंस्टीट्यूट के निदेशक हरिवंश चतुर्वेदी का कहना है, “इंजीनियरिंग में कोर्स पुराने हैं. डिमांड कम है और इंजीनियर ज्यादा बन रहे हैं. सीट बढ़ गई हैं. ऑटो मेशन और रोबोटिक्स इंजीनियरिंग का जमाना है. सिविल इंजीनियरिंग का हाल भी खराब है. कंप्यूटर साइंस भी इससे अछूता नहीं रहा है. डीवीआर मोहन रेड्डी कमेटी की रिपोर्ट है 2020 के बाद कोई कॉलेज नहीं खुलेगा. 50 पेज की रिपोर्ट है. 2007 से 2012 के बीच नामांकन भी 6 से 12 लाख कर दिया गया. अब तो 13 लाख से अधिक हो गया है. तो ऐसे में आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि इंजीनियरिंग की डिग्री हाथ में होने पर नौकरी मिल ही जाएगी.”



ये चार्ट बताता है कि कितने छात्र पास हुए और कितने छात्रों को जॉब मिली.

डॉ. बीआर अंबेडकर विश्वविद्वालय, आगरा में प्रोफेसर डॉ. संजीव कुमार का कहना है, “देश में इंडस्ट्री की मांग और बाहर जाने वाले बच्चों की संख्या को देखते हुए ही कॉलेज में सीट होनी चाहिए. अभी कॉलेज इतने खुल गए हैं कि गुणवत्त बची नहीं है और बच्चों की संख्या भी अनाप-शनाप हो गई है. कुछ गिने चुने संस्थान से ही नौकरी मिल रही हैं, वर्ना अब तो 60 प्रतिशत छात्रों को कैम्पस प्लेसमेंट में नौकरी नहीं मिल रही हैं.”

इंजीनियरिंग कॉलेज में टीचर दिवाकर तिवारी का कहना है, “सिलेबस पुराना है आज की इंडस्ट्री से मैच नहीं कर रहा है. इसे वर्तमान बाज़ार के हिसाब से अपडेट करने की जरूरत है. दूसरे ये कि प्राइवेट कॉलेज पढ़ाने का नहीं नम्बर बांटने का काम कर रहे हैं. बच्चों को इंटरनल में 80 से 90 प्रतिशत तक नम्बर दिए जा रहे हैं और एक्सटर्नल में पासिंग नम्बर छात्र ले ही आता है. इस तरह से इंजीनियर नहीं इंजीनियरिंग की डिग्री तैयार की जा रही हैं.”

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एआईसीटीई में पॉलिसी एंड एकेडमिक प्लानिंग ब्यूरो के सहायक निदेशक मनोज सिंह का इस बारे में कहना है, “हाल ही में कुछ कोर्स को अपडेट किए जाने की प्रक्रिया शुरु की गई है. कोर्स को इंडस्ट्री के हिसाब से अपडेट करने के लिए हम लगातार फिक्की, एस्सोचैम, सीआईआई आदि के साथ भी बात करके उनकी मांग पूछते हैं. वहीं अतंरराष्ट्रीय बाज़ार के हिसाब से भी कुछ नए कोर्स लाने की कवायद चल रही है.”

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