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Twitter पर कपिल मिश्रा ने डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया से पूछे यह 10 सवाल

कपिल मिश्रा ने दिल्ली की शिक्षा पर उठाए सवाल.
कपिल मिश्रा ने दिल्ली की शिक्षा पर उठाए सवाल.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 22, 2020, 6:06 PM IST
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नई दिल्ली. भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता कपिल मिश्रा (Kapil Mishra) ने दिल्ली सरकार (Delhi Government) की शिक्षा व्यवस्था पर कई सवाल उठाए हैं. उन्होंने दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया (Manish Sisodia) से दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था पर 10 सवाल किए हैं. उन्होंने ट्विट (Tweet) कर कहा है कि इससे पहले मनीष सिसौदिया यूपी की जनता से झूठ बोलें, मेरी ये चुनौती है कि इन 10 सवालों का जवाब दे दीजिए. उन्होंने कहा है कि दिल्ली में शिक्षा क्रांति नहीं "विज्ञापन क्रांति" की गई है. उनका आरोप है कि दिल्ली की शिक्षा (Delhi Education) व्यवस्था फेल है.

बच्चे सरकारी स्कूल छोड़कर प्राइवेट स्कूलों में क्यों गए?

कपिल मिश्रा ने कहा है कि अगर दिल्ली के सरकारी स्कूल अच्छे हुए, तो सरकारी स्कूल छोड़कर प्राइवेट स्कूलों में जाने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी क्यों?, दिल्ली सरकार द्वारा जारी इकॉनोमिक सर्वे की रिपोर्ट के आंकड़े इसका प्रमाण भी देते हैं. इस सर्वे के अनुसार वर्ष 2014-15 में जहां दिल्ली के प्राइवेट स्कूलों का शेयर केवल 31 फीसदी था, वर्ष 2017-18 में वह बढ़कर 45.5 फीसदी से भी अधिक हो गया. उन्होंने सवाल पूछा है कि जहां एक तरफ दिल्ली की जनसंख्या बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों में 10वीं और 12वीं की परीक्षा देने वाले बच्चों की संख्या लगातार कम कैसे होती चली गई? 2014 में एक लाख 66 हजार बच्चे 12वीं की परीक्षा में बैठे.



2015 में एक लाख 40 हजार, 2016 में एक लाख 31 हजार, 2017 में एक लाख 21 हजार, 2018 में केवल एक लाख 11 हजार बच्चे ही 12वीं की परीक्षा में बैठे. ये कमी आखिर क्यों और कैसे आई?  2014 के मुकाबले सरकारी स्कूलों से निकलकर एक लाख 40 हजार छात्र प्राइवेट स्कूल में क्यों गए? 2014 की तुलना में सरकारी स्कूल के 42,000 छात्र 12वीं बोर्ड में क्यों कम पास हुए?
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10वीं का रिजल्ट ठीक दिखाने को 50 फीसदी बच्चों को 9वीं में फेल किया

उन्होंने ट्विट में कहा है कि 10वीं का रिजल्ट ठीक दिखाने के लिए करीब 50 फीसदी बच्चों को 9वीं में फेल किया जा रहा है. दिल्ली में 2016-17 में 47.7 फीसदी बच्चे 9वीं क्लास में फेल किए गए और 10वीं पास करके 11वीं में आए बच्चों में से भी 20 फीसदी बच्चे फेल किए गए. यानी 9वीं की तुलना में केवल आधे बच्चे 10वीं में और केवल एक तिहाई बच्चे 12वीं कक्षा में पहुंचे. ये आंकड़ा आज़ादी के बाद का सबसे खराब आंकड़ा है. विज्ञापन में 10वीं और 12वीं का रिजल्ट अच्छा दिखने के लिए लाखों बच्चों को 9वींऔर 11वीं में फेल किया जा रहा है. लाखों बच्चों को फेल करने, सरकारी स्कूलों से बाहर करने, प्राइवेट स्कूलों में बच्चे बढ़ने और सरकारी स्कूलों में छात्रों में भयानक कमी होने के कारण क्या हैं?

केवल बजट की घोषणा हुई, काम नहीं हुआ

शिक्षा के बजट की घोषणा बड़े बड़े विज्ञापन देकर की जाती है लेकिन क्या मनीष सिसोदिया ये बताएंगे कि बजट खर्च कितना होता है? 2017-18 में शिक्षा बजट में से ₹2000 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं हुए. पिछले पांच सालों में शिक्षा बजट ना खर्च करने का आंकड़ा हर साल 2000 करोड़ रुपये के आसपास ही रहा हैं. यानी केवल बजट की घोषणा हुई और काम कुछ नहीं हुआ.

पांच साल में नहीं बने एक भी नए सरकारी स्कूल

उन्होंने सवाल किया है कि दिल्ली में कितने नए सरकारी स्कूल बने, बने बनाए स्कूलों में कमरे नहीं, असली में कितने नए स्कूल बने, जवाब है पांच साल में जीरो नए सरकारी स्कूल. दिल्ली में लगभग 15,000 अस्थायी कमरे बनाए गए पहले से बने स्कूलों में. लगभग 3000 स्कूल पहले से बने हैं. औसतन एक स्कूल में पांच नए कमरा बने. सात साल में एक स्कूल में पांच नए कमरा बनाना, वो भी अस्थायी. क्या ये शिक्षा क्रांति कहलायेगा?

छात्रों की सुविधाएं लगातार हो रहीं कम

उन्होंने पूछा है कि सात सालों में कितने टीचर्स की भर्ती हुई? क्यों 70 फीसदी स्कूलों में प्रिंसिपल का पद खाली हैं? क्यों 92 फीसदी स्कूलों में अध्यापकों की कमी है? क्यों 76 फीसदी स्कूलों में पीने का पानी का कनेक्शन तक नहीं है? क्या इन सवालों के जवाब देंगे मनीष सिसोदिया. दिल्ली के सरकारी स्कूलों में खेल के मैदान में 62 फीसदी की कमी, साइंस लैब में 53 फीसदी की कमी, पुस्तकालय में लगभग 74 फीसदी की कमी पिछले पांच साल में आई है. यानी छात्रों के लिए सुविधाएं बढ़ने की जगह लगातार कम हो रही हैं. आखिर क्यों?

होर्डिंग लगाने वाली एजेंसी और आपके साले में क्या रिश्ता?

ना नए स्कूल बने, ना नए कॉलेज बने, ना टीचर्स की भर्ती हुई, ना शिक्षा बजट खर्च हुआ, ना पीने का पानी तक स्कूलों तक पहुंचा, हुआ तो केवल विज्ञापन और मीडिया मैनेजमेंट. ये शिक्षा क्रांति नहीं विज्ञापन क्रांति हैं. और आखिरी सवाल दिल्ली में जगह-जगह विज्ञापन और होर्डिंग लगाने वाली एजेंसी के मालिक और आपके सगे साले साहब का आपस में क्या रिश्ता है?
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