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अरविंद केजरीवाल: आंदोलन से दिल्ली के तख्त तक

News18Hindi
Updated: January 8, 2020, 4:49 PM IST
अरविंद केजरीवाल: आंदोलन से दिल्ली के तख्त तक
दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल.

अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejiwal) बेहद कम समय में एक साधारण व्यक्ति से लकर दिल्ली की CM कुर्सी तक का सफर पूरा किया है. लेकिन क्या यह सफर वाकई इतना आसान था?

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  • Last Updated: January 8, 2020, 4:49 PM IST
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दिल्ली की सत्ता में अरविंद केजरीवाल का नाम सालों तक लिया जाएगा. आंदोलन की आग में तपकर दिल्ली के तख्त पर कब्जा करने वाले केजरीवाल ने यह सफर बेहद कम समय में पूरा किया. अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के सातवें मुख्यमंत्री के तौर पर विराजमान हुए और पहली दफा दिसंबर 2013 से लेकर फरवरी 2014 तक सत्ता में रहे. अरविन्द दूसरी बार फरवरी 2015 में फिर जीतकर आए और वर्तमान समय तक वो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बरकरार हैं. आगे पढ़ने पर आप पाएंगे कि अरविंद केजरीवाल की कार्यशैली उन्हें दूसरों से कैसे अलग करती है?

दिल्ली की राजनीति में जब से अरविन्द केजरीवाल का पदार्पण हुआ है तब से राजनीति की धुरी की तरह काम कर रहे हैं केजरीवाल. यहां आम आदमी पार्टी के संयोजक होने के नाते होने वाले दो बार के विधानसभा चुनाव में अरविन्द केजरीवाल ने अपनी आम आदमी पार्टी को दिल्ली के लोगों की नजर में नंबर वन की पार्टी बना दिया. साल 2012 में आम आदमी पार्टी की लॉचिंग के बाद अरविन्द केजरीवाल ने धुआंधार कई फैसले लिए जो जनता के दिलों में उन्हें हीरो साबित करने में कारगर साबित रहा. बिजली से लेकर यूपीए के पूर्व और तत्कालीन मुख्यमंत्री के खिलाफ उनके द्वारा लिया गया फैसला जनता की निगाहों में हिट कर गया.

पहली दफा दिसंबर 2013 में आम आदमी पार्टी 70 सीटों में 28 सीटें जीत पाई थी और कांग्रेस की मदद से सरकार बनाने में सफल हुई. लेकिन फरवरी 2014 में अरविन्द केजरीवाल ने इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया. अरविन्द केजरीवाल ने इस्तीफा के बाद कहा कि लोकपाल के मुद्दे पर उनकी सहयोगी पार्टियां उन्हें सहयोग नहीं कर रही हैं, इसलिए वो त्यागपत्र देकर जनता के बीच जाना चाहते हैं.

दरअसल लोकपाल बिल ही ऐसा मुद्दा था जिसको लेकर केजरीवाल ने एलजी से लेकर कांग्रेस और बीजेपी समेत सभी दलों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. अरविन्द केजरीवाल जानते थे कि लोकपाल के नाम पर जनता उन्हें सर आंखों पर बिठाएगी इसलिए शासन और सत्ता में पारदर्शिता के नाम पर जनता के बीच जाने का मन बना लिया. इस दरम्यान वो अन्य मुद्दों पर दिल्ली पुलिस और गृहमंत्रालय के खिलाफ भी धरने पर बैठ गए. इतिहास की नजर में केजरीवाल पहले ऐसे मुख्यमंत्री थे जो सीएम पद पर रहते हुए केंद्र सरकार के खिलाफ धरने पर बैठे थे. लेकिन अरविन्द केजरीवाल की राजनीति की अलग स्टाइल उन्हें कम समय में ही इस मुकाम पर ले आई है.

वैसे साल 2014 में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बनारस से चुनाव लड़ने की उनकी कवायद टांय-टांय फिस हो गई, लेकिन साल 2015 में दिल्ली की सरकार द्वारा आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत मिलना केजरीवाल को की राजनीतिक सफर को शीर्ष पर ला खड़ा किया. आम आदमी पार्टी 70 में से 67 सीटें जीत पाने में कामयाब रही.

साल 2015 से दिल्ली की सत्ता पर काबिज केजरीवाल लगातार सुर्खियों मे रहे हैं. रमन मैग्सैसे अवॉर्ड से सम्मानित किए गए अरविन्द केजरीवाल शासन में पारदर्शिता लाने को लेकर हमेशा से मुखर रहे हैं. उनकी भूमिका सूचना के अधिकार अधिनियम पर बने कानून को लेकर सराही जाती है लेकिन केजरीवाल के द्वारा गाड़ी और बंग्ला नहीं लिए जाने की बात कर वापस उसे लिए जाने को लेकर उनकी काफी आलोचना भी हुई है.

अरविन्द केजरीवाल फिलहाल कई लोकलुभावन फैसले लेकर दिल्ली की जनता को रिझाने में लगे हैं. जिनमें मैट्रो और डीटीसी बसों में महिलाओं का मुफ्त सफर, 200 यूनिट तक की बिजली मुफ्त और 400 यूनिट तक की बिजली पर आधा शुल्क लेने की बात शामिल है.वैसे अरविन्द केजरीवाल की सरकार द्वारा मोहल्ला क्लीनिक और शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों की सराहना होती रही है. लेकिन बीजेपी की साल 2019 में मिली अपार सफलता और दिल्ली में एक भी लोकसभा सीट नहीं मिलने की वजह से आम आदमी पार्टी अपनी राजनीति जमीन मजबूत करने की पुरजोर कोशिश कर रही है. ज़ाहिर है अरविन्द केजरीवाल ही वो शख्सियत हैं जो आम आदमी पार्टी को आने वाले विधानसभा चुनाव में पिछले चुनाव की तरह भारी सफलता दिलवा सकते हैं. ऐसे में अरविन्द केजरीवाल पिछला प्रदर्शन दोहरा पाएंगे ऐसी उम्मीद उनके कार्यकर्ताओं को तो है लेकिन जम्मू कश्मीर में मोदी सरकार द्वारा 370 पर लिए गए फैसले, CAA जैसे फैसलों के बाद कयास लगाया जा रहा है कि इस चुनाव में कमल पर झाड़ू लगना काफी मुश्किल भरा होगा.

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First published: January 3, 2020, 4:41 PM IST
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