Lockdown diaries: छह किलोमीटर दूर पापा के दफ्तर जाती थी नेट चलाने ताकि ऑनलाइन क्लास ले सकूँ
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Lockdown diaries: छह किलोमीटर दूर पापा के दफ्तर जाती थी नेट चलाने ताकि ऑनलाइन क्लास ले सकूँ
MP में निजी और सरकारी स्कूलों में प्राइमरी सेक्शन तक online क्लासेस पर रोक

लॉकडाउन (Lockdown) ने लोगों को परिस्थितियों से समझौता करना सिखा दिया है. ऐसे तमाम दिलचस्प किस्से सामने आ रहे हैं जो इस दौर की दिक्कतों (Problam), और उनसे निपटने के लिए किए जा रहे संघर्षों को बताते हैं.

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नई दिल्ली. विश्वव्यापी महामारी कोरोना (Covid 19) के चलते हुए लॉकडाउन (Lockdown) ने लोगों को परिस्थितियों से समझौता करना सिखा दिया है. इतना ही नहीं ऐसे तमाम दिलचस्प किस्से सामने आ रहे हैं जो इस दौर की दिक्कतों, उलझनों और उनसे निपटने के लिए किए जा रहे संघर्षों को बताते हैं. लॉकडाउन डायरीज में ऐसे ही किस्से उन्ही लोगों की जुबानी. इसी कड़ी में एक किस्सा जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल स्टडीज़ की छात्रा और फिलहाल जम्मू से 100 किमी दूर गांव में फंसी श्रेया ने news18hindi से साझा किया.

"मैं इस वक्त जम्मू से 110 किमी दूर दिलावर गांव में हूँ. जम्मू के पारंपरिक गांवों की तरह ही यह गांव है. जहां अभी भी टूजी सर्विसेज़ चलती हैं. मैं पिछले कई सालों से पढ़ाई के लिए घर से बाहर ही रही हूँ लेकिन इस बार कोरोना के कारण यहां आना हुआ. बाहर जाने के बाद यह पहली दफा है जब मैं इतने लंबे समय के लिए यहां रुकी हूं.

मार्च में जैसे ही दिल्ली में लॉकडाउन की घोषणा हुई, यूनिवर्सिटी में हम सभी को भी अपने-अपने घर जाने के लिए कह दिया गया. जल्दी जल्दी जो कुछ समझ में आया, मैं वो सब पैक करके ले आई लेकिन एक छात्र को किताबों के अलावा भी पढ़ाई के लिए बहुत चीजों की ज़रूरत होती है. जिनकी कमी यहां साफ महसूस की जा सकती है.



और शुरू हुआ ऑनलाइन क्लासेज़ का सिलसिला लेकिन..
जेएनयू से आने के बाद पढ़ाई को जारी रखने के लिए ऑनलाइन क्लासेज़ शुरू कर दी गईं. मुझे भी प्रोफेसर्स के लेक्चर्स लेने थे लेकिन हाथ में स्मार्टफोन होने के बाद भी उसे चलाने के लिए इंटरनेट की ज़रूरत होती है. यहां टूजी कनेक्टिविटी में पढ़ाई के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को खोलना भी मुश्किल होता है. ऐसे में क्लासेज़ मिस होने लगीं.

पापा के दफ्तर में जाकर करने लगी पढ़ाई

मेरे पापा एसेंशियल कमोडिटी के ऑफिस में हैं तो वहां लॉकडाउन में भी जाना होता है. गांव से छह किलोमीटर दूर में भी पापा के साथ दफ्तर जाने लगी ताकि वहां लगे वाई फाई से पढ़ाई कर सकूं. मैं दो घण्टे की क्लास के लिए पापा के साथ पूरे दिन बैठी रहती. कुछ दिन ये सिलसिला चलता रहा.

लॉकडाउन की कड़ाई और कॉलेज की टाइमिंग से सब हो गया बन्द

उस वक्त दो से 4 बजे तक क्लासेज़ होती थीं, लेकिन धीरे-धीरे लॉकडाउन और ज्यादा कड़ा हो गया साथ ही हमारी क्लास की टाइमिंग भी बदल गयी. गांव से आधा किमी आगे एक पुल है, जहां सीआरपीएफ वाले होते हैं तो वे वहां से आगे बढ़ने ही नहीं देते. वहीं क्लास भी अब रोजाना शाम को पांच से सात बजे होती है. लिहाजा इस वक्त गांव से वहां अकेले नहीं जाया जा सकता. इस तरह तीसरे लॉकडाउन में ऑनलाइन पढ़ाई भी बन्द हो गयी.

रिकॉर्डेड लेक्चर का है बस इंतज़ार

अपनी मज़बूरी को लेकर मैंने जेएनयू के प्रोफेसर्स को बताया तो उन्होंने यूनिवर्सिटी आने पर रिकॉर्डेड लेक्चर का एक्सेस देने का भरोसा दिलाया है. प्रोफेसर्स ने भी बताया कि मेरे जैसे सैकड़ों छात्र हैं जो ये परेशानी झेल रहे हैं, उन्हें भी एक्सेस दिया जाएगा. लेकिन जाने कब तक ये आपदा रहेगी और कब तक रिकॉर्डेड लेक्चर्स का भी इंतज़ार करना पड़ेगा. काफी कीमती समय बीतता जा रहा है लेकिन अब मजबूरी है तो क्या करें."

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