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दार्जिलिंग लोकसभा सीट: इस सीट से बीजेपी लगा पाएगी जीत की हैट्रिक?

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मोदी लहर में दार्जिलिंग सीट बीजेपी के एसएस अहलूवालिया निकाल ले गए. यहां से 2009 में जसवंत सिंह सांसद चुने गए थे.

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    पश्चिम बंगाल में 2014 में बीजेपी ने जो दो सीटें जीती थीं, उनमें आसनसोल के साथ दार्जिलिंग की सीट थी. बीजेपी को गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने समर्थन दिया था. मोदी लहर में दार्जिलिंग सीट बीजेपी के एसएस अहलूवालिया निकाल ले गए. यहां से 2009 में जसवंत सिंह सांसद चुने गए थे. इस बार के चुनाव में बीजेपी ने एसएस अहलूवालिया का टिकट काटकर राजू बिस्ट को अपना उम्मीदवार बनाया है.

    इस सीट से टीएमसी के टिकट पर अमर सिंह रॉय चुनौती दे रहे हैं. कांग्रेस ने शंकर मालाकार को टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा है. सीपीएम ने समन पाठक को उतारा है. वहीं बीएसपी, इंड‍ियन डेमोक्रेट‍िक र‍िपब्ल‍िकन फ्रंट, गोरखा राष्ट्रीय कांग्रेस, राष्ट्रीय जनसचेतन पार्टी, ऑल इंड‍िया जन आंदोलन पार्टी, आमार बंगाली के प्रत्याशी भी चुनाव मैदान में हैं.

    2014 के चुनाव का हाल

    दार्जिलिंग लोकसभा सीट पर बीजेपी का 2009 से ही कब्जा है. 2014 के चुनाव में यहां से बीजेपी उम्मीदवार एसएस अहलूवालिया ने जीत हासिल की थी. उन्होंने टीएमसी उम्मीदवार बाइचुंग भूटिया को बड़े अंतर से हराया था. एसएस अहलूवालिया को कुल 4 लाख 88 हजार 257 वोट मिले थे. जबकि बाइचुंग भूटिया को 2 लाख 91 हजार 18 वोट ही हासिल हुए.

    अहलूवालिया को कुल वोट का करीब 42.73 फीसदी वोट हासिल हुए जबकि भूटिया को सिर्फ 25.47 फीसदी मत मिले. हालांकि बीजेपी की 2009 की जीत इससे भी बड़ी थी. 2009 में बीजेपी के जसवंत ने 4 लाख 97 हजार 649 वोट हासिल किए थे. ये कुल वोट का 51.50 फीसटी वोट था. 2009 के चुनाव में टीएमसी का उम्मीदार कहीं नहीं था लेकिन 2014 के चुनाव में टीएसी दूसरे स्थान पर रही.

    दार्जिलिंग सीट का राजनीतिक इतिहास

    चाय बगानों के लिए मशहूर दार्जिलिंग पर ज्यादातर चुनावों में कांग्रेस और सीपीएम के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है. यहां सबसे पहले 1957 में लोकसभा के चुनाव हुए. पहले चुनाव में कांग्रेस के थिओडोर मानेने सांसद चुने गए. इसके बाद 1962 का चुनाव भी थिओडोर मानेन ने ही जीता. 1967 के चुनाव में यहां से निर्दलीय उम्मीदवार एम बसु को जीत हासिल हुई.



    इसके बाद 1971 में हुए चुनाव में सीपीएम के रतनलाल ब्राह्मण यहां से चुनकर संसद पहुंचे. इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए चुनाव में कांग्रेस के कृष्ण बहादुर छेत्री ने जीत हासिल की. इसके बाद 1980 और 1984 के चुनाव में सीपीएम के टिकट पर लगातार दो बार आनंद पाठक ने चुनाव जीता. 1989 के चुनाव में नौवीं लोकसभा के लिए 1989 में चुनावों में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट के इंद्रजीत चुनाव जीतने में कामयाब रहे है. 1989 के चुनाव में यहां से गोरखा नेशनल लिब्रेशन फ्रंट के टिकट पर इंद्रजीत चुनाव जीते. वो बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए और 1991 का चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़कर जीते. 1996 से लेकर 1999 के चुनाव तक लगातार तीन बार इस सीट से सीपीएम के उम्मीदवार जीते.

    1996 में इस सीट से आर बी राय, 1998 में आनंद पाठक और 1999 में एस पी लेप्चा ने जीत हासिल की. 2004 में इस सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार को जीत मिली. 2009 में ये सीट बीजेपी के खाते में चली गई. जसवंत सिंह ने सीपीएम के उम्मीदवार जिबेश सरकार को 2 लाख वोटों से ज्यादा के अंतर से शिकस्त दी. वहीं 2014 में यहां से एसएस अहलूवालिया ने टीएमसी के बाइचुंग भूटिया को बड़े अंतर से हराया.

    दार्जिलिंग सीट की अहम बातें



    दार्जिलिंग अपने चाय बगानों के लिए मशहूर हैं. यहां उत्पादित चाय का निर्यात विदेशों में होता है. 1800 के मध्य यहां पर चाय की खेती शुरू हुई थी. दार्जिलिंग शब्द दो तिब्बती शब्दों दोर्जे यानी बज्र और लिंग यानी स्थान से मिलकर बना है.

    दार्जिलिंग जिले और उत्तरी दीनाजपुर जिले के कुछ हिस्सों को मिलाकर ये संसदीय सीट बना है. 2011 की जनगणना के मुताबिक यहां की आबादी 22 लाख 1 हजार 799 है. यहां करीब 66.68 फीसदी लोग गांवों में रहते हैं जबकि 33.32 फीसदी आबादी शहरी है. इस आबादी की करीब 17 फीसदी आबादी अनुसूचित जाति की और 18.99 फीसदी आबादी अनुसूचित जनजाति की है. 2009 की परिसीमन की रिपोर्ट के बाद दार्जिलिंग संसदीय क्षेत्र को 7 विधानसभा क्षेत्रों में बांटा गया है. इनमें मतिगारा-नक्सलबाड़ी सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित है और फंसीदेवा सीट अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित है. कलिम्पोंग, दार्जिलिंग, कुर्सियांग, सिलीगुड़ी और चोपरा सीट सामान्य है.

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