दिल्‍ली वोटर को रिझा नहीं पाए भोजपुरी सिंगर, इसलिए BJP ने केजरीवाल के सामने खेला ये दांव
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दिल्‍ली वोटर को रिझा नहीं पाए भोजपुरी सिंगर, इसलिए BJP ने केजरीवाल के सामने खेला ये दांव
दिल्‍ली बीजेपी प्रदेश अध्‍यक्ष के पद से हटाए गए मनोज तिवारी.

बीजेपी ने हाल ही में मनोज तिवारी (Manoj Tiwari) को दिल्‍ली बीजेपी अध्‍यक्ष पद से हटाकर आदेश कुमार गुप्‍ता को इस पद की जिम्‍मेदारी दी है.

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सिद्धार्थ मिश्रा
भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने हाल ही में दिल्‍ली में बड़ा फैसला लेते हुए प्रदेश अध्‍यक्ष मनोज तिवारी (Manoj Tiwari) को पद से हटा दिया है. उनकी जगह पूर्व मेयर आदेश कुमार गुप्‍ता (Adesh kumar gupta) को इस पद की जिम्‍मेदारी दी गई है.

इस साल फरवरी में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी (आप) के हाथों भारतीय जनता पार्टी की हार ने दो बहुत स्पष्ट निष्कर्ष दिए - एक यह कि बीजेपी दिल्ली इकाई के अध्यक्ष मनोज तिवारी पर्याप्त प्रवासी मतदाताओं को उत्साहित करने में विफल रहे और दूसरा यह भी कि बीजेपी ने अपने पारंपरिक वैश्य (बनिया) वोट खोकर उसे आम आदमी पार्टी को दे देती है.

इन चुनावों में बीजेपी का वैश्य वोट आधार खत्‍म हो गया था. वोटरों ने बीजेपी के बजाय बनिया के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी को चुना. रोहिणी के अपवाद के साथ लगभग सभी वैश्य प्रभुत्व वाली सीटें AAP के पास चली गईं. रोहिणी सीट को दिल्ली बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने बहुत मुश्किल से जीता था.



संभवतः पूर्व मेयर आदेश कुमार गुप्ता को दिल्ली बीजेपी का अध्यक्ष नियुक्त करते हुए पार्टी के शीर्ष नेतृत्‍व ने इन कारकों के बारे में सोचा होगा. हालांकि नए पार्टी अध्यक्ष आदेश गुप्‍ता एक अलग शैली के बनिया हैं. वह दिल्ली के पारंपरिक बनिया के विपरीत हैं, जो हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में अपनी जड़ें जमाते हैं. गुप्ता उत्तर प्रदेश के कन्नौज के रहने वाले हैं. उनके हाथ में जो काम है, वह अप्रैल 2022 के लिए निर्धारित नगरपालिका चुनावों को जीतने के दिया गया है.



जाति और समुदाय के संयोजन के दूसरी ओर, एक अन्य प्रमुख कारक जिसने दिल्ली में बीजेपी की हार में योगदान दिया वह था अरविंद केजरीवाल का मुकाबला करने के लिए एक चेहरे का अभाव. मनोज तिवारी लगभग चार वर्षों तक पार्टी अध्यक्ष बने रहे, लेकिन कभी भी भोजपुरी गायक की अपनी छवि से आगे नहीं बढ़ सके. जो अपने गीतों के गायन के साथ दर्शकों को रिझाते हुए चुनाव जीत सकते थे, जो कई बार अशिष्ट थे.

अपने आप में दिल्ली इकाई के अध्यक्ष के रूप में तिवारी की नियुक्ति आश्चर्यजनक थी. उनकी नियुक्ति से पहले तक, बीजेपी की दिल्ली इकाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में मजबूती से काम करने वाले लोगों और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के लोगों की ओर से देखी जाती थी.

मनोज तिवारी ने 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान गोरखपुर की लड़ाई में बुरी तरह फंसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ चुनाव लड़कर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को हवा दी थी. इसके बाद उन्होंने 2013 के विधानसभा चुनावों से पहले दिल्ली कांग्रेस में शरण ली. उन्हें अंततः बीजेपी में शरण मिली, जो 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान उत्तर पूर्वी दिल्ली में AAP के आनंद कुमार का मुकाबला करने के लिए एक उपयुक्त पूर्वांचली चेहरे की तलाश में था.

राजनीतिक भाग्य वाले व्‍यक्ति को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की टिकट पर चुनाव जीतना आसान हो सकता है, लेकिन अरविंद केजरीवाल जैसे व्‍यक्ति के नेतृत्व वाली प्रतिद्वंद्वी पार्टी के खिलाफ पार्टी इकाई का नेतृत्व करना अस्वाभाविक साबित हुआ.

2017 के नगर निगम चुनावों में भाजपा लगभग 35 प्रतिशत के अपने पारंपरिक वोट शेयर को बनाए रखने में कामयाब रही थी. विपक्षी वोट शेयर कांग्रेस और AAP के बीच विभाजित था. 2019 के लोकसभा चुनावों का एकमात्र श्रेय हमेशा तत्कालीन राष्ट्रीय इकाई के अध्यक्ष अमित शाह द्वारा लगाए गए पोल मशीनरी को दिया जाएगा.
(इसके लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्‍लेषक हैं. उनके विचार निजी हैं.)
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