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Loksabha Election 2019: मुसलमान लोकसभा में इसलिए सिमट गए सिर्फ 24 सीट पर

Loksabha Election 2019: मुसलमान लोकसभा में इसलिए सिमट गए सिर्फ 24 सीट पर

ग्राफिक्स-न्यूज18 हिन्दी.

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1980-84 का ही वो दौर था जब मुसलमान 49 और 42 के बड़े नंबर के साथ लोकसभा पहुंचे थे. उसके बाद से ये नंबर नीचे गिरता चला गया, हालांकि उनकी आबादी बढ़ती गई.

    मुसलमानों की नुमाइंदगी को लेकर शायर मुनव्वर राणा का एक शेर है..

    मुसाहिब की सफों में भी मेरी गिनती नहीं होती
    यह वह मुल्क है जिसकी मैं सरकारें बनाता था.

    कमोबेश देश की सियासत में मुसलमानों की जगह और उनकी पहुँच इस शेर में बयान हो गई है. 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में सिर्फ़ 11 मुसलमान चुनकर संसद आए. जिसके लिए 42 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में थे. हालांकि 1980 में उन्हें सबसे ज़्यादा 49 सीटें मिलीं. लेकिन ये नम्बर भी 291 मुस्लिम उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने के बाद मिला था.

    एएमयू, अलीगढ़ के प्रोफ़ेसर शकील समदानी कहते हैं- सिर्फ 1980-84 का ही वो दौर था जब मुसलमान 49 और 42 के बड़े नंबर के साथ लोकसभा पहुंचे थे. उसके बाद से ये नंबर नीचे गिरता चला गया, हालांकि उनकी आबादी बढ़ती गई.

    ग्राफिक्स-न्यूज18 हिन्दी.


    भारत में 24 करोड़ मुसलमान हैं यानी क़रीब 13.5%. मगर 16वीं लोकसभा में इस वक़्त सिर्फ़ 24 मुसलमान हैं यानी 4.2%. इन 24 में सिर्फ़ एक मुस्लिम महिला संसद पहुँच पाई हैं.

    देश की सियासत में मुसलमानों के साथ बहुत धोखा हुआ है. सेक्युलरिज्म की आड़ में मुसलमानों को धोखा दिया गया है. जो सियासी पार्टियां अपने को सेक्युलर कहती हैं अगर वो वाकई में सेक्यूलर हैं तो मुसलमान उम्मीदवार को वहां टिकट देकर जिताएं जहां मुसलमान कम और हिन्दू वोटर ज्यादा हैं.̓

    डॉ. तसलीम अहमद रहमानी, अध्यक्ष, मुस्लिम पॉलिटिकल काउंसिल ऑफ इंडिया


    ग्राफिक्स-न्यूज18 हिन्दी.


    वोट बंटवारे से राजनीति में पिछड़े मुसलमान

    डॉ. बीआर अंबेडकर विश्वविद्वालय, आगरा के प्रोफेसर मोहम्मद अरशद का कहना है कि ̔1980-84 के उस दौर में मुसलमान उम्मीदवार इसलिए जीते क्योंकि मैदान में एक या दो ही मुस्लिम उम्मीदवार हुआ करते थे. आज की तरह से एक सीट पर 5 से 7 उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ा करते थे. जैसे 2014 के लोकसभा चुनाव में पूर्वी दिल्ली में 6, चांदनी चौक में 6 और मुरादाबाद सीट पर 7 मुस्लिम उम्मीदवार खड़े हुए थे.

    प्रोफेसर अरशद इस मामले में यूपी की सहारनपुर सीट का उदाहरण देते हैं. वह कहते हैं कि मुस्लिम बाहुल होने के बावजूद कांग्रेस के इमरान मसूद यहां से इसलिए हारे क्योंकि उनके मुकाबले उनके चचेरे भाई शाजान मसूद सपा की टिकट पर लड़ रहे थे. मसूद करीब 70,000 वोटों से हारे, जबकि उनके चचेरे भाई को 50,000 से अधिक वोट मिले.

    उनके मुताबिक़ दूसरा उदाहरण है कभी मौलाना अबुल कलाम आजाद की सीट रही रामपुर का. जहां सपा के नसीर अहमद खान की हार की बड़ी वजह कांग्रेस के नवाब काजिम अली खान उर्फ नवेद मियां को मिले 1.5 लाख से अधिक वोट हैं.

    फाइल फोटो-एएमयू.


    प्रोफेसर अरशद कहते हैं कि ‘इसकी एक बड़ी वजह रीजनल पार्टी भी हैं. जो एक मुसलमान के मुकाबले दो-तीन और मुसलमान उम्मीदवारों को टिकट दे देती हैं. दूसरी वजह ये है कि देश में बहुत ही कम सीट ऐसी हैं जो मुस्लिम बहुल हैं. वर्ना ज्यादातर सीट पर मुसलमान बिखरे हुए हैं.’

    ̔मुसलमानों ने कभी भी अपनी राजनीतिक पार्टी नहीं बनाई. मुस्लिम लीग केरल तक सिमटी हुई थी और औवेसी की पार्टी भी एक दायरे में है. लेकिन मुसलमानों ने हर पार्टी को वोट देकर उसमे अपनी जगह बनाने की कोशिश की. लेकिन इसमे वो कामयाब नहीं हो पाई. जो उन पार्टी की बेईमानी थी. ̓

    कमाल फारूकी, सदस्य ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

    पार्टी के नाम पर भी मुस्लिम उम्मीदवार गवांरा नहीं

    राजनीति में पिछ़ड़ने की दूसरी वजहों में पार्टी के नाम पर भी मुस्लिम उम्मीदवार गवारा न होना है. डॉ. अरशद कहते हैं कि हैरत की बात ये है कि 2014 में क्या कांग्रेस और क्या बीजेपी हर पार्टी के मुस्लिम दिग्गज हारे.

    ग्राफिक्स न्यूज18


    जम्मू-कश्मीर की ऊधमपुर सीट से कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद, राजस्थान की टोंक माधोपुर सीट से कांग्रेस प्रत्याशी और क्रिकेट सितारे मोहम्मद अजहरुद्दीन एक लाख से ज्यादा वोटों से हारे. उत्तर प्रदेश में विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद को हार का सामना करना पड़ा.

    इसी तरह, बीएसपी नेता रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बेटे अफजल सिद्दीकी फतेहपुर सीट से हार गए. आजम खान के क्षेत्र रामपुर लोकसभा सीट से सपा का मुस्लिम प्रत्याशी 20 हजार से ज्यादा वोट से हार गया, जबकि यहां 49 फीसद मुस्लिम वोटर हैं.

    ऐसा भी नहीं है कि गैर भाजपाई दलों के मुस्लिम उम्मीदवारों ने ही हार का मुंह देखा था. बीजेपी के प्रमुख मुस्लिम चेहरे शाहनवाज हुसैन बिहार की भागलपुर लोकसभा सीट से हार गए.

    ग्राफिक्स-न्यूज18 हिन्दी.


    यूपी में बीजेपी ने किसी भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया था. छोटे राज्यों को छोड़ दें तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से एक भी मुस्लिम लोकसभा नहीं पहुंचा. जबकि यूपी में मुस्लिम तबके से बीएसपी ने 19, सपा ने 13 और कांग्रेस ने 11 उम्मीदवार उतारे थे.

    सपा नेता आजम खान के एक बार मीडिया में दिए गए बयान पर गौर करें तो उन्होंने भी इसी ओर इशारा करते हुए कहा था कि ̔मुसलमान तो सपा, बीएसपी, कांग्रेस जहां थे, वहीं बने रहे लेकिन इस बार हिंदुओं ने मुसलमान को वोट नहीं दिया.’

    वहीं सपा से राज्यसभा में सांसद मुनव्वर सलीम ने भी एक बार कहा था कि ̔हमने तो आजादी के वक्त भी एक हिंदू (महात्मा गांधी) को ही अपना राष्ट्रपिता माना था. उसके बाद से किसी न किसी हिंदू नेता के नीचे ही काम करते रहे हैं. लेकिन लगता है कि हिंदू अब किसी मुसलमान को अपना नेता नहीं बनने देना चाहते. और बिना हिंदू मतों के कोई मुसलमान चुनाव नहीं जीत सकता.̓

    ग्राफिक्स-न्यूज18 हिन्दी.


    वहीं इस बारे में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कमाल फारूकी कहते हैं  कि मौजूदा सियासी हालातों में मुसलमानों के पास अब सिर्फ तीन रास्ते ही बचते हैं. पहला ये कि वो सियासत से दूर होक पढ़ाई-लिखाई और कारोबार में तरककी कर अपना मुस्तकबिल तैयार करे. दूसरा अपनी कोई सियासी पार्टी बना ले. या फिर एक राय होकर ऐसी पार्टी को वोट देना शुरु कर दे जो भाषणों में ही नहीं ज़मीन पर भी मुसलमानों के लिए फिक्रमंदी से काम करे.

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    Tags: Election 2019, General Election 2019, Lok Sabha Election 2019

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