....तो इसलिए दलित मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बेचैन है आयोग!

एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दलित राजनीति में उबाल है
एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दलित राजनीति में उबाल है

दलित उत्पीड़न के खिलाफ काम करने वाली सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था अनुसूचित जाति आयोग के एक सदस्य का कहना है कि अब दलितों के मामले में पुलिस की मनमानी बढ़ेगी.

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सुप्रीम कोर्ट की ओर से 20 मार्च को एससी/एसटी एक्ट पर दिए गए फैसले के खिलाफ न सिर्फ दलितों में नाराजगी है बल्कि दलित उत्पीड़न के खिलाफ काम करने वाली सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में भी बेचैनी है.

देशभर में हुए दलित आंदोलन को देखते हुए  सोमवार (2 अप्रैल) को मोदी सरकार ने कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की. उधर, आयोग ने इस बारे में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से मिलकर अपना पक्ष रखा. आंदोलन के अगले दिन hindi.news18.com संवाददाता ने खान मार्केट के लोकनायक भवन स्थित आयोग का दौरा किया.

यहां पर हर दलित कर्मचारी और ज्यादातर पीड़ित इस एक्ट पर आए फैसले को लेकर बातचीत करते दिखे. आयोग के चेयरमैन रामशंकर कठेरिया, वाइस चेयरमैन एल. मुरुगन और सदस्‍य डॉ. योगेंद्र पासवान, के. रामलू और सुश्री स्‍वराज विद्वान पीएम से मिलने गए थे.



मिलकर आने के बाद डॉ. योगेंद्र पासवान ने कहा, " पीएम ने आश्वासन दिया है कि दलित समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार सुप्रीम कोर्ट गई है. अन्याय नहीं होने पाएगा." पासवान के मुताबिक, "आयोग को आशंका है कि अब दलित उत्पीड़न के मामलों में पुलिस की मनमानी और बढ़ जाएगी. क्योंकि जांच अधिकारी (आईओ) लिखकर दे देगा कि जांच चल रही है. इससे पीड़ित को न्याय मिलने में देरी होगी."
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डॉ. पासवान ने बताया "एससी/एसटी (प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज) एक्ट अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को उत्पीड़न और जातीय भेदभाव से बचाने वाला कानून है. कोर्ट के फैसले से इस कानून का डर कम होने और दलितों के खिलाफ उत्पीड़न बढ़ने की आशंका है."

आयोग के कर्मचारियों ने कहा " सरकारी रिकॉर्ड बता रहे हैं कि दलितों के खिलाफ उत्पीड़न और अन्य मामले बढ़ रहे हैं. इस आयोग में कोई दलित तब आता है जब उसे पुलिस और प्रशासन से न्याय नहीं मिलता. इस आदेश के बाद आयोग की वैल्यू पहले जैसी नहीं रह जाएगी. सबसे प्रमुख होगा केस का जांच अधिकारी. तो आयोग को कौन पूछेगा. इसलिए पूरा आयोग चाहता है कि पुरानी स्थिति बहाल हो. "

क्या है SC/ST एक्ट?

एससी/एसटी (प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज) एक्ट 11 सितंबर 1989 को पारित हुआ था. यह कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर शेष भारत में 30 जनवरी 1990 से लागू है. यह एक्ट दलितों पर जुल्म और भेदभाव करने वाले हर उस व्यक्ति पर लागू होता हैं जो अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति से नहीं  है. यह एससी/एसटी पीड़ितों को विशेष सुरक्षा और अधिकार प्रदान करता है.

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कोर्ट के फैसले से क्या बदला?  

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इस एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी. इसीलिए इसके तहत तुरंत गिरफ्तारी की बजाय जांच की बात कही. कोर्ट ने कहा कि आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी जरूरी नहीं है. प्रथमदृष्टया जांच और संबंधित अधिकारियों की अनुमति के बाद ही कठोर कार्रवाई की जा सकती है. यदि प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है तो अग्रिम जमानत देने पर पूरी तरह से रोक नहीं है. आरोपों की डीएसपी स्तर का अधिकारी करेगा. गिरफ्तारी के लिए एसपी या एसएसपी से इजाजत लेनी होगी.
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