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निर्भया केस: एक आम गृहिणी ने कैसे लड़ी इतनी बड़ी कानूनी जंग, फांसी के फंदे तक पहुंचे दरिंदे
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Updated: March 20, 2020, 6:10 AM IST
निर्भया केस: एक आम गृहिणी ने कैसे लड़ी इतनी बड़ी कानूनी जंग, फांसी के फंदे तक पहुंचे दरिंदे
हैवानों को फांसी देने की मांग करते निर्भया के माता-पिता, साथ में योगिता भयाना (File Photo)

निर्भया के दरिंदों को फांसी के फंदे तक लटकवाने के लिए तो पूरा देश सड़क पर खड़ा था, लेकिन एक महिला पैरोकार ऐसी भी है जो खुद जल्लाद बनने को भी तैयार थी

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  • Last Updated: March 20, 2020, 6:10 AM IST
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नई दिल्ली. निर्भया (Nirbhaya) के माता और पिता ने दरिंदों को फांसी के फंदे तक पहुंचाकर अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए जमीन आसमान एक कर दिया. मां के रूप में एक साधारण सी गृहिणी और नौकरीपेशा पिता ने जब न्याय के लिए अदालतों की चौखट पर जाना शुरू किया तो उन्हें उम्मीद थी कि जिस बेटी के लिए पूरा देश सड़कों पर खड़ा था उसे तो जल्दी इंसाफ मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. निर्भया के लिए न्याय का इंतजार बढ़ता गया. हैवानों को फंदे तक पहुंचाने के लिए सात साल तीन महीना लग गया. ये तब है जब फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई हुई. यहां बड़ा सवाल ये है कि एक आम गृहिणी ने आखिरी इतनी बड़ी कानूनी जंग को कैसे जीता?

इस सफर में कौन-कौन उनके साथ शुरू से अंत तक खड़ा रहा. इसका जवाब यह है कि पूरे देश के न्याय पसंद लोगों ने निर्भया की मां को हौसला दिया. लोग समय-समय पर इस हैवानियत के खिलाफ आवाज उठाते रहे. मां-बाप का हर तरह से साथ देते रहे. लेकिन एक शख्सियत और भी है जो हमेशा उनके साथ रही. वो हैं सोशल एक्टिविस्ट योगिता भयाना. वो 18 दिसंबर 2012 को शुरू हुए आंदोलन से आज तक उनके साथ खड़ी हैं. भयाना इस केस की पैरोकार हैं. वो लोअर कोर्ट से सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) तक इस सफर की साक्षी हैं.

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निर्भया के माता-पिता के साथ एक्टिविस्ट योगिता भयाना और आकाशदीप (File Photo)




भयाना का कहना है कि हम सभी चाहते हैं कि निर्भया केस का फैसला एक ऐसा उदाहरण बने ताकि कोई भी लड़की और महिला के साथ दरिंदगी करने से पहले सौ बार सोचे. उन्होंने हर पल निर्भया की मां आशा देवी (Asha Devi) का साथ देकर उन्हें टूटने से बचाया. इन लोगों ने हार नहीं मानी और दोषियों को फांसी होने तक लड़ाई लड़ते रहने का एलान किया.



जब बार-बार फांसी टल रही थी तो आशा देवी ने पूरे सिस्टम पर सवाल उठाया.  जबकि योगिता कुछ महिलाओं के साथ हाथों में रस्सी लेकर तिहाड़ जेल के गेट नंबर-4 के बाहर प्रदर्शन करने पहुंच गईं. वो इस कोशिश में जुट गईं कि फांसी टलने का मामला संसद में भी उठवाया जाए और ऐसा हुआ भी. सांसद हनुमान बेनिवाल ने यह मामला संसद में उठाते हुए कहा- ‘निर्भया के दोषियों को तुरंत फांसी पर लटवाया जाए. सबसे बड़ी ताकत पार्लियामेंट के पास है.’

जब तिहाड़ जेल प्रशासन का एक बयान आया कि वह जल्लाद की तलाश कर रहा है, उसके पास जेल में कोई जल्लाद नहीं है. तब भयाना ने खुद जल्लाद बनने की मांग की. उन्होंने कहा- मैं दूंगी दोषियों को फांसी, मुझे बना दो जल्लाद. योगिता ने पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र को लिखित अनुरोध भेजकर कहा है कि 20 मार्च के दिन 'बलात्कार रोकथाम दिवस' मनाया जाना चाहिए.

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निर्भया के माता-पिता और उनके समर्थक


रेप पीड़िताओं को न्याय दिलाने के लिए ‘परी’ (PARI-People Against Rapes in India) नामक संगठन चलाने वाली योगिता कहती हैं कि कहीं भी इस तरह की घटना हो वो पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए लड़ती रहेंगी. आजकल वो संसद में हर साल दो दिन महिला स्पेशल सत्र चलाने की मांग को पूरा करवाने के लिए काम कर रही हैं.

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First published: March 20, 2020, 6:10 AM IST
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