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Nirbhaya Case: फांसी देने के बाद इसलिए मीडिया से नहीं मिलना चाहता पवन जल्लाद
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News18Hindi
Updated: March 20, 2020, 10:48 AM IST
Nirbhaya Case: फांसी देने के बाद इसलिए मीडिया से नहीं मिलना चाहता पवन जल्लाद
मेपवन जल्लाद. File Photo

फांसी (Hanging) के बाद पवन जल्लाद (Pawan Jallad) मीडिया (Media) से नहीं मिलना चाहता है. इसके पीछे भी उसने एक बड़ी वजह बताई है.

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  • Last Updated: March 20, 2020, 10:48 AM IST
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नई दिल्ली. निर्भया गैंगरेप केस (Nirbhaya Gangrape Case) के चारों गुनहगारों को तिहाड़ जेल (Tihar Jail) में फांसी हो चुकी है. उनके शवों को पोस्टमॉर्टम (Postmortem) के लिए भेज दिया गया है. अब अगर देशवासियों की निगाहें किसी को तलाश रही हैं तो वो है पवन जल्लाद. पवन ने ही चारों लोगों को फांसी दी है. लेकिन फांसी के बाद पवन मीडिया (Media) से नहीं मिलना चाहता है. इसके पीछे भी उसने एक बड़ी वजह बताई है. यही वजह है कि खबर लिखे जाने तक पवन जेल से बाहर नहीं आया है.

कई दिन तक दिमाग में घूमता है फांसी का मंजर

तिहाड़ जेल जाने से पहले न्यूज18 हिन्दी से हुई बातचीत में पवन जल्लाद ने बताया था कि फांसी की तैयार रात एक बजे से शुरु हो जाती हैं. वैसे तो एक दिन पहले ही डमी फांसी देकर ट्रॉयल कर लिया जाता है, असल फांसी की तैयारी भी कई घंटे पहले करनी पड़ती है. फांसी देने के एक-डेढ़ घंटे पहले गुनहगारों से निगाहें मिलनी शुरु हो जाती हैं. मैंने आजतक ऐसा कोई नहीं देखा जो नॉर्मल रहता हो. इसके बाद उनके चेहरों पर काला कपड़ा डालना, पैरों को रस्सी से बांधना, गले में फंदा पहनाना यह सब काम करने होते हैं.



आखिर में लीवर खींचकर उन्हें फांसी पर लटका दिया जाता है. 5 घंटे का यह काम इतना दिमाग पर इतना हावी हो चुका होता है कि फांसी देने के कई-कई दिन बाद भी एक-एक चीज आंखों के सामने घूमती रहती है. गुनहगारों की आंखों से मेरी आंखों का मिलना, और क्या बताऊं कैसे-कैसे मंजरों का सामना करना पड़ता है. सच पूछों तो इसके बाद किसी से बात करने का मन नहीं करता है. और फिर यहां तो चार लोग हैं.



तिहाड़ से पहले यरवदा जेल में दी गई थी चार लोगों को फांसी

महाराष्ट्र में जोशी अभयंकर केस में एक साथ 10 लोगों का कत्ल हुआ था. इस केस में जिन्हें गुनहगार माना गया था वो राजेन्द्र जक्कल, दिलीप सुतार, शांताराम कान्होजी जगताप और मुनव्वर हारुन शाह थे. खास बात यह है कि यह सभी लोग एक कॉलेज के छात्र थे. 27 नवंबर 1983 को सभी चार गुनहगारों को यरवदा जेल में फांसी दी गई थी.

जबकि इन चारों की फांसी से पहले आज़ाद भारत में सिर्फ दो लोगों को 1982 में एक साथ फांसी दी गई थी. यह फांसी तिहाड़ जेल में हुई थी. यह दोनों गुनहगार रंगा-बिल्ला थे. वहीं निर्भया गैंगरेप केस के चारों आरोपियों को एक साथ फांसी देने का यह तिहाड़ जेल में पहला मौका है.

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First published: March 20, 2020, 10:47 AM IST
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