आम लोगों को होती है फांसी की सजा देखने की मनाही, सिर्फ ये लोग रह सकते हैं मौजूद

16 दिसंबर 2012 की रात को चलती बस में एक 23 साल की पैरामेडिकल स्टूडेंट के साथ 6 लोगों ने गैंगरेप किया था.

जेल रिफॉर्म्स कमेटी 1980-83 की रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण सिफारिश की गई है कि बंदी को मृत्युदंड देते समय उसके रिश्तेदारों को उपस्थित रहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.

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    नई दिल्ली. निर्भया केस (Nirbhaya Case) में हत्यारों को जल्‍द फांसी (Hanging) होने की संभावना है. ऐसे में फांसी की सजा से जुड़े नियमों को भी लोग जानना चाहते हैं. आइए जानते हैं कि आखिर फांसी देखने की मनाही क्यों होती है? 'आंखों देखी फांसी' नामक अपनी पुस्तक में वरिष्ठ पत्रकार गिरिजाशंकर लिखते हैं कि जेल मैन्युअल के अनुसार कैदी को फांसी दिये जाने के दौरान अधिकतम 6 वयस्क पुरुष रिश्तेदारों को जेल अधीक्षक की स्वीकृति से प्रवेश की अनुमति दी जा सकेगी. जेल अधीक्षक को यह अधिकार होगा कि अगर वह परिस्थितिवश न्यायसंगत समझे तो इन सभी को या इनमें से किसी व्यक्ति विशेष को जेल में प्रवेश की अनुमति देने से इनकार कर दे.

    इन रिश्तेदारों को फांसी के फंदे से कुछ दूरी पर रखा जाएगा. इनके पास रिजर्व गार्ड खड़े किए जाने का प्रावधान है. जिससे उनके द्वारा किसी प्रकार की गड़बड़ी करने या कैदी को मुक्त कराने के किसी प्रयत्न को रोका जा सके. इसके अलावा किसी अन्य व्यक्ति की उपस्थिति के बारे में जेल मैन्युअल खामोश है, जिसे प्रशासन मनाही मानकर चलता है.

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     जेल रिफॉर्म्स कमेटी की ये हैं सिफारिश
    जेल रिफॉर्म्स कमेटी 1980-83 की रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण सिफारिश की गई है कि बंदी को मृत्युदंड देते समय उसके रिश्तेदारों को उपस्थित रहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. यदि जेल अधीक्षक चाहे तो सोशल साइंटिस्ट, सॉयकोलॉजिस्ट और मनोविज्ञानी को उपस्थित रहने की अनुमति दी जा सकती है, जो इस विषय पर रिसर्च वर्क कर रहे हों. यह भी सिफारिश की गई है कि फांसी देते समय कौन उपस्थित रहे और कौन नहीं. इस मामले में जेल अधीक्षक का विवेक मान्य होगा. इस विषय में अभी तक शासन द्वारा कोई नीतिगत निर्णय नहीं लिया गया है और न ही पुराने नियमों में कोई बदलाव किया गया है.

    जहां तक फांसी की सजा देते समय बंदी के रिश्तेदारों को उपस्थित न रहने देने की सिफारिश का प्रश्न है तो यहां यह स्पष्ट नहीं होता है कि इसके पीछे कारण क्या हैं. कैदी के कुछ रिश्तेदार ऐसे हो सकते हैं जो स्वयं ही अपने प्रियजन को जिंदा फांसी के फंदे पर लटकते देखने का साहस ही न जुटा पाएं और संभव है कि कुछ इस घटना के साक्षी न बनना चाहें.

    क्यों जरूरी है रिश्तेदारों का रहना?
    गिरिजाशंकर लिखते हैं कि वैसे यह माना जाता है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के समय रिश्तेदार अन्य कारणों से उसके पास रहें. अपने जीवन के अंतिम समय में व्यक्ति भी चाहता है कि उसके प्रियजन उसके पास हों. प्रियजनों की भी यही आस होती है. फांसी की सजा सुनाए जाने के पश्चात उसकी शारीरिक, मानसिक और व्यक्तित्व में आने वाले बदलावों का अध्ययन करने के लिए रिश्तेदारों, मित्रों एवं वकीलों के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के विशेषज्ञों को न सिर्फ फांसी की सजा देते समय बल्कि सजा का दंड सुनाए जाने के पश्चात से ही इंटरव्यू की अनुमति देने जैसे बिंदुओं पर स्पष्ट नियम बनाए जाने चाहिए. ऐसा होने पर अनुमति देने वाले अधिकारी एवं अनुमति चाहने वाले व्यक्ति के लिए किसी प्रकार की दुविधा नहीं रहेगी.

    इन लोगों की उपस्थिति जरूरी
    फांसी की सजा दिए जाने के दौरान जेल अधीक्षक, जिला मजिस्ट्रेट या उसके द्वारा नियुक्त मजिस्ट्रेट जो प्रथम श्रेणी का हो तथा सहायक सर्जन या उससे ऊपर की श्रेणी का चिकित्सा अधिकारी अनिवार्य रूप से उपस्थित रहेगा.

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    फांसी देते समय कुछ ही लोग रह सकते हैं मौजूद


    फांसी देने से पहले क्या होगा
    सजा प्राप्त कैदी को काल कोठरी से बाहर निकालने के पहले जेल अधीक्षक डेथ वारंट जोर से पढ़कर सुनाएगा और जेलर उसका मतलब कैदी को समझाएगा. उसके बाद जेल अधीक्षक व संबंधित अधिकारी उस कैदी की पहचान करेंगे कि यह वही व्यक्ति है जो वारंट में नामांकित है. उसके बाद ही फांसी की सजा देने की प्रक्रिया शुरू होगी.

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