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'मिशन 2019' के प्रचार अभियान का लांच पैड है अविश्वास प्रस्ताव!

नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी (फाइल फोटो)

नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी (फाइल फोटो)

विपक्षी दल किसान, रोजगार, हेट क्राइम, दलित, आरक्षण, असहिष्णुता, मोब लिंचिंग, नोटबंदी के नकारात्मक असर, GST को ठीक तरह से लागू न किए जाने और महंगाई पर सरकार को घेरेंगे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: July 20, 2018, 11:10 AM IST
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राजनीतिक दलों ने 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं. इसके लिए सियासी घेराबंदी और रणनीति अब जमीन पर दिखने लगी है. जहां सत्तारूढ़ दल ने रैलियां शुरू कर दी हैं. वहीं विपक्ष गठबंधन के हथियार में धार दे रहा है. विपक्ष की ओर से मोदी सरकार के खिलाफ लाया गया पहला अविश्वास प्रस्ताव भी इसी का हिस्सा माना जा रहा है. इसे मिशन 2019  के चुनाव प्रचार अभियान का लांच पैड की तरह इस्तेमाल किया जाएगा. इससे लगभग तय हो जाएगा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष किन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाएंगे.

बताया गया है कि विपक्षी दल किसान, रोजगार, हेट क्राइम, दलित, आरक्षण, असहिष्णुता, मोब लिंचिंग, नोटबंदी के नकारात्मक असर, GST को ठीक तरह से लागू न किए जाने और महंगाई पर सरकार को घेरेंगे. लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव के बहाने मोदी सरकार की पोल खोलने में कामयाब होगा?  प्रस्ताव पर शुक्रवार को वोटिंग होनी है.

आमतौर पर किसी भी सरकार को सत्‍ता में बने रहने के लिए लोक सभा में बहुमत और विश्‍वासमत की जरूरत होती है. विपक्षी दल अविश्‍वास प्रस्‍ताव यह बताने के लिए लाते हैं कि सत्‍ताधारी दल के पास सदन में बहुमत नहीं है. लेकिन यहां विपक्ष यह जानते हुए भी कि मोदी सरकार के पास बहुमत से ज्यादा नंबर हैं, अविश्वास प्रस्ताव ला रहा है. आखिर क्यों?



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इसका जवाब प्रस्ताव को आगे बढ़ाने वाले टीडीपी सांसद केसीनी श्रीनिवास ने न्यूज 18 से बात करते हुए दिया. उन्होंने कहा 'अविश्वास प्रस्ताव बीजेपी सरकार की ताकत का परीक्षण कम उनकी असफलताओं को सामने लाने के बारे में अधिक है.'

टीडीपी सांसद ने कहा, "राष्ट्रीय स्तर पर मोदी सरकार की विफलताओं और अधूरे वादों पर चर्चा होना जरूरी है. प्रस्ताव के माध्यम से यह होगा और पूरे देश को सच्चाई का पता चलेगा. यह अपने आप में एक सफलता है.”

हालांकि, कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल का कहना है “कैसे कोई कह सकता है कि हमारे पास संख्या नहीं है. कल बहस होने दीजिए. हम केंद्र सरकार के 4 साल की बातों को सामने रखेंगे. आप देखिए सदन में क्या होता है.”

पार्टी नेता पीएल पुनिया कहते हैं कि “संसदीय लोकतंत्र में अविश्वास प्रस्ताव लाना हमारा हक है तो हम लाए हैं, ये समय की बर्बादी कैसे हुई? बीजेपी से शिवसेना, पीडीपी, टीडीपी सभी नाराज हैं. खुद बीजेपी के तमाम सांसद नाराज हैं, ये सब देखने को मिलेगा शुक्रवार को आपको.”

सहयोगी दल सरकार को नोंक पर रखे हुए हैं, उन्होंने कोई आश्वासन नहीं दिया है. शिवसेना ने यू-टर्न लेते हुए कुछ ही घंटों में सांसदों को जारी व्हिप वापस ले लिया है. शिवसेना ने 2019 में अपने राजनीतिक भविष्य को देखते हुए ऐसा फैसला लिया है. उसे लगता है कि महाराष्ट्र में उसकी सियासी जमीन बीजेपी खा रही है. फिलहाल तो बीजेपी को सहयोगियों से अधिक अपनों की चिंता है, क्योंकि कई दलित सांसद नाराज हैं. राजनीति के जानकारों का कहना है कि संख्या बल जानते हुए भी विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव इसलिए ला रहा है ताकि सरकार को घेरा जा सके.

अविश्वास प्रस्ताव टीडीपी ला रही है. लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने बुधवार को प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था. किसी पार्टी के अविश्वास प्रस्ताव को तभी स्वीकार किया जा सकता है, जब सदन में उसे कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन हासिल हो. फिलहाल, संख्या बल के लिहाज से मोदी सरकार मजबूत है.  सदन में एनडीए  के पास स्पीकर समेत 315 सांसद हैं. 545 सदस्यों वाले सदन में इस वक्त 535 सदस्य ही हैं. इसलिए बहुमत का आंकड़ा 268 है. ऐसे में प्रस्ताव गिर सकता है. हालांकि, सोनिया गांधी ने यह कहकर बीजेपी को थोड़ा परेशान जरूर कर दिया है कि ‘कौन कहता है कि हमारे पास नंबर्स नहीं हैं.’

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कब आया था पहला अविश्वास प्रस्ताव
सबसे पहले तीसरी लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव आया था. वर्ष 1963 में नेहरू सरकार के खिलाफ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के तत्कालीन सांसद जेबी कृपलानी प्रस्ताव लाए थे. हालांकि, इससे सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा था. लोकसभा में अब तक 26 बार प्रस्‍ताव लाया जा चुका है. सर्वाधिक 15 बार इंदिरा सरकार के खिलाफ रिकॉर्ड है.
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