लाइव टीवी

OPINION: राजनीति में मील का पत्थर साबित होगा दिल्ली विधानसभा चुनाव
Delhi-Ncr News in Hindi

Sudhir Jain | News18India
Updated: February 8, 2020, 7:11 PM IST
OPINION: राजनीति में मील का पत्थर साबित होगा दिल्ली विधानसभा चुनाव
दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए शनिवार को मतदान हुआ. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

चुनावों में युद्ध जैसी आक्रामकता पहले ही बढ़ती ही जा रही थी. लेकिन इस बार तो राजनीतिक खून-खच्चर भी दिखाई देने लगा. गाली, गोली, मैं नायक तू खलनायक, ठगों की तरह वायदों का लालच, भय, रौद्र, घृणा जैसे रसों से भीगे इस चुनाव के बाद विश्लेषकों को चुनावी राजनीतिक में अनैतिकता के पहलू पर भी जरूर चर्चा करनी चाहिए.

  • News18India
  • Last Updated: February 8, 2020, 7:11 PM IST
  • Share this:
नई दिल्ली. दिल्ली में मतदान खत्म हो चुका है. उसके बाद तरह-तरह के विश्लेषण आने लगे हैं. एग्जिट पोल और उसके भी विश्लेषण. इस बार खासतौर पर इसकी भी चर्चा होगी कि आखिर मतदान कम क्यों हुआ. हालांकि मतदान हो जाने के बाद इस तरह की चर्चाओं की ज्यादा अहमियत है नहीं. इनसे नतीजों पर तो असर पड़ना नहीं है. फिर भी इस तरह के विश्लेषणों की जरूरत इसलिए तो पड़ती ही है, क्योंकि चुनाव के दौरान कई सर्वेक्षण एजेंसियों ने ओपिनियन पोल के जरिए चुनाव (Delhi Election 2020) में हिस्सा लिया था. माना जाता है कि ओपनियन पोल के जरिए कई व्यापार एजेंसियां अपने-अपने ग्राहक राजनीतिक दलों के पक्ष में हवा बनाने का काम करती हैं. जाहिर है उन्हें अपने आगे के धंधे के लिए अपनी विश्वसनीयता बचाने की भी जरूरत होती है. यानी दिल्ली में मतदान के बाद होने वाले विश्लेषणों को गौर से देखा जाना चाहिए कि चुनाव पूर्व भविष्यवाणियों और एग्जिट पोल में कहीं बहुत ज्यादा अंतर तो नहीं है.

ज्यादा उत्साह न होने का कारण
इसकी जांच पड़ताल बहुत ही मुश्किल काम माना जाता है. विशेषज्ञ चुनाव विश्लेषक इस पचड़े में नहीं पड़ते. चुनाव खत्म होने के बाद उनका काम भी खत्म हो जाता है. लिहाजा मतदान कम क्यों हुआ? इसे बताने का काम राजनीतिक दलों के प्रवक्ता या विश्लेषक संभालते हैं. पुराने अनुभव हैं कि मतदान कम होने को सभी राजनीतिक दल अपने पक्ष में और अपने प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ बताते हैं. लेकिन इस बार दिल्ली में मतदान कम होने की मात्रा कुछ ज्यादा ही कम हाने के लक्षण साफ दिख गए हैं. जाहिर है कि विश्लेषणों में सबसे ज्यादा समय इसी बात को मिलेगा.

मतदान कम होने का मनोवैज्ञानिक पहलू



राजनीतिक उदासी हो तो मतदाता ज्यादा हलचल नहीं दिखाते. मतदान को लोकतांत्रिक नागरिक का कर्तव्य जरूर बताया जाता है, लेकिन इस कर्तव्य की गंभीरता का प्रचार ज्यादा कभी नहीं दिखता. सभी राजनीतिक दल चाहते हैं कि सिर्फ उनके पक्ष के मतदाता ही किसी तरह मतदान केंद्र तक ले जाए जाएं. लगता है इस बार राजनीतिक दलों के सक्रिय कार्यकर्ता अपने-अपने मतदाताओं को घर से निकालकर पोलिंग बूथ तक पहुंचा नहीं पाए. व्यावसायिक चुनाव प्रबंधन के युग में ऐसा हो नहीं सकता कि बड़े दलों ने अपनी ताकत नहीं झोंकी होगी. फिर भी अगर कम मतदाता बूथ तक पहुंचे तो इसकी शोधपरक चर्चा जरूर होनी चाहिए.

opinion-delhi-elections-will-be-milestone-in-politics | Opinion: राजनीति में मील का पत्थर बनेगा दिल्ली चुनाव

राजनीति में नकार ज्यादा तो नहीं बढ़ रहा
राजनीति के उद्यम में शोध अध्ययनों का भारी टोटा पड़ा हुआ है. लिहाजा सिर्फ शोध परिकल्पनाएं ही हो सकती हैं. ऐसी ही एक रिसर्च हाइपोथीसिस बनाई जा सकती है कि 2020 आते-आते मतदाता क्या किसी को हराने के लिए ही पोलिंग बूथ पर उमड़ते हैं. यानी अपना गुस्सा निकालने के लिए वोट डालने लगे हैं. अगर दिल्ली के चुनाव देखें तो दिल्ली में सत्तारूढ़ दल के खिलाफ गुस्सा भड़काने का उपक्रम कामयाब होता नहीं दिखा. सत्तारूढ़ को बेदखल करने के लिए कई विपक्षी दल जो एका कर लिया करते हैं, वह भी नहीं दिखा. इसीलिए माहौल ऐसा नहीं बनाया जा सका कि सत्तारूढ़ दल को बेदखल किया जा सकता है. गौरतलब है कि चुनावी मनोविज्ञान में जीतने की हवा या आंधी चलवाना सबसे कारगर उपाय माना जाता है.

ओपिनियन पोल हवा नहीं बना पाए
दरअसल पिछले चुनाव के नतीजे इतने एकतरफा थे कि अगले चुनाव में किसी विपक्षी दल के पक्ष में अचानक हवा बनाना आसान नहीं होता. अब कम से कम मतदान खत्म होने के बाद तो एक बात का जिक्र किया जा सकता है. वह ये कि इस बार के ज्यादा ओपिनियन पोल ने पिछली बार बुरी तरह पराजित राजनीतिक दलों के पक्ष में बेहतर नतीजों का शुरुआती अनुमान तो प्रचारित किया, लेकिन उसके बाद आगे के अनुमानों में विपक्षी दल की एकतरफा जीत का अनुमान नहीं बता पाए. आजकल चुनावी राजनीति में हवाबाजी या आंधी ही काम करती है. आधी-अधूरी कोशिशें बिल्कुल ही बेकार चली जाती हैं. यानी दिल्ली चुनाव के एग्जिट पोल और दो दिन बाद मतगणना के नतीजों में कोई आंधी निकलने का कुतूहल पालना ठीक नहीं होगा.

क्रिकेट मैच ने कितना असर डाला होगा
युवाओं और क्रिकेट प्रेमियों की तादाद देश में कम नहीं है. इत्तेफाक से मतदान के मुख्य समय में ही भारत-न्यूजीलैंड के बीच दूसरा एकदिवसीय मैच चल रहा था. बहुत संभव है कि मतदान पर इसका कुछ असर पड़ा हो. हालांकि चुनाव भी क्रिकेट से कम रोमांचक नहीं होते. लेकिन यह रोमांच राजनीतिक व पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं में ही ज्यादा होता है. आमलोग आमतौर पर किसी को आउट करने के लिए तो बूथ तक पहुंच सकते हैं, लेकिन अभी अपनी राजनीतिक टीम को जिताने में उतनी दिलचस्पी नहीं दिखाते. बहरहाल जब चुनाव सुधारों को लेकर आयोग गाहे-बगाहे इतनी चिंता जताता रहता है तो उसे चुनाव की तारीखें तय करते समय यह देख लेना चाहिए कि मतदाता उन दिनों किसी तीज-त्योहार या किसी रोमांचक गतिविधि में तो नहीं लगे होंगे.

opinion-delhi-elections-will-be-milestone-in-politics | Opinion: राजनीति में मील का पत्थर बनेगा दिल्ली चुनाव
दिल्ली चुनाव के दौरान नेताओं की बयानबाजियां चर्चा में रहीं.


कुछ चर्चाएं राजनीतिक नैतिकता की भी होनी चाहिए
इस बार दिल्ली के चुनाव के बहाने नैतिकता की बात करने का अच्छा मौका है. चुनावों में युद्ध जैसी आक्रामकता पहले ही बढ़ती ही जा रही थी. लेकिन इस बार तो राजनीतिक खून-खच्चर भी दिखाई देने लगा. गाली, गोली, मैं नायक तू खलनायक, ठगों की तरह वायदों का लालच, भय, रौद्र, घृणा जैसे रसों से भीगे इस चुनाव के बाद विश्लेषकों को चुनावी राजनीतिक में अनैतिकता के पहलू पर भी जरूर चर्चा करनी चाहिए. ये बातें करने का अभी ही मौका है, वरना आगे इसे सामान्य व्यवहार माना जाने लगता है.

ये भी पढ़ें -

Delhi Election LIVE: दिल्ली में शाम 6 बजे तक 54.65 प्रतिशत मतदान दर्ज

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए दिल्ली-एनसीआर से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: February 8, 2020, 7:06 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर