Opinion: इस लॉकडाउन के बाद मशीनी तो नहीं होने जा रहा देश का भविष्य?

ऑनलाइन एजुकेशन बच्चों के लिए मानवीय संबंधों की पाठशाला बन सकते हैं क्या? (सांकेतिक तस्वीर)

ऑनलाइन एजुकेशन बच्चों के लिए मानवीय संबंधों की पाठशाला बन सकते हैं क्या? (सांकेतिक तस्वीर)

युवा पीढ़ी जानती है कि डिजिटल युग कर्म क्षेत्र तो हो सकता है, पर वह जिंदगी का मर्म क्षेत्र नहीं हो सकता, इसलिए शारीरिक उपस्थिति का कोई अवसर वह नहीं छोड़ना चाहेगी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 20, 2021, 4:08 PM IST
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देश में कोरोना संक्रमण का खौफ अब कम हो चला है. इसके वैक्सीन की खोज हो जाने के बाद मन को अजीब सुकून मिला है और जो भयानक खौफ का आलम था, वह काफूर हो चुका है. लेकिन हम अब भी सजग और सतर्क हैं. बताए गए तमाम एहतियात बरतने की पूरी कोशिश देश के लोग कर रहे हैं. स्कूल, कॉलेज, थियेटर, मॉल जैसी तमाम जगहों को खोलने की सशर्त इजाजत दी जा चुकी है. स्पष्ट निर्देश है कि इन जगहों पर कोरोना गाइडलाइन का पालन किया जाए. सामाजिक दूरी बनाई रखी जाए. मास्क और सैनेटाइजर के इस्तेमाल में लापरवाही न बरती जाए. जाहिर है इसके बाद कोरोना हमपर असर नहीं करेगा.

लेकिन जो असर पड़ चुका, उसका क्या?

लेकिन कोरोना की वजह से किए गए लॉकडाउन का जो असर हमारी जिंदगी पर पड़ चुका, उसका क्या किया जाए? यह सच है कि लॉकडाउन की वजह से आम जिंदगी में ढेर सारे परिवर्तन हो चुके हैं. साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, पारिवारिक और राजनीतिक जीवन पर गहरा असर पड़ा है. लाखों लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं, रोजगार का बुरा हाल है. व्यवसाय चौपट हो चुके हैं. आमलोगों की आर्थिक स्थिति डगमगा चुकी है. सारे पारंपरिक प्रचलन (ट्रेंड) अब बदलकर डिजिटल प्लेटफार्म पर आते जा रहे हैं. इसे दूसरे रूप में कहें तो हम तकनीकी रूप से ज्यादा सक्षम हुए हैं. उसके इस्तेमाल में पहले के मुकाबले ज्यादा पारंगत हुए हैं. इस नए प्लेटफार्म पर भरोसा करना अब हमारी मजबूरी होती गई है.

सानिध्य सुख की कमी
दफ्तरी कामकाज हो या सांस्कृतिक आयोजन, राजनीतिक कार्यक्रम हो या शैक्षिक – सब अब ऑनलाइन के भरोसे टिके हैं. डिजिटल प्लेटफार्म पर कक्षाएं चल रही हैं, शादियां हो रही हैं. कार्यक्रमों में दर्शक और श्रोता जुटाए जा रहे हैं और उनसे संवाद हो रहा है. जाहिर है इस प्लेटफार्म पर हुए आयोजनों का विस्तार वैश्विक है. यह सच है कि जिस पीढ़ी ने सामाजिक उपस्थिति (फिजिकल अपियरेंस) को डिजिटल अपियरेंस में बदलते देखा है, वह इसके अंतर को समझ सकती है. उसके लिए शारीरिक उपस्थिति के मायने आज भी अर्थपूर्ण हैं. वह जानती है कि डिजिटली हम जितने करीब आ जाएं, इसके जरिए व्यवसाय, शिक्षा और विभिन्न आयोजन जितने सलीके और आसानी से हो जाएं, पर जो सानिध्य सुख दैहिक मौजूदगी से मिलता है, जो आत्मीयता आप एक-दूसरे से मिलकर महसूस करते हैं, उसे डिजिटल प्लेटफार्म से हासिल नहीं किया जा सकता. स्पर्श से मिली वह ऊर्जा डिजिटल प्लेटफार्म मुहैया नहीं करा सकता.

डिजीटल किताबों के फायदे और सीमाएं

इसे ऐसे समझें कि अब किताबें डिजिटल रूप में आ रही हैं. पुरानी से पुरानी और नई से नई किताबें आपको डिजिटल रूप में मिल जाएंगी. आप उन्हें पहले के मुकाबले ज्यादा आसानी से पढ़ सकते हैं. रखने का झंझट भी नहीं. जिल्द फटने की चिंता नहीं. अक्षर के छोटे होने का संकट नहीं, अपनी जरूरत के मुताबिक जितना चाहें बढ़ा लें. लेकिन इन डिजिटल किताबों में पन्ने की वह खुशबू नहीं मिलती, जो छपी किताबों में मिल जाती है. आपके आलमीरा में रखी किसी पुरानी किताब के बीच दबा हुआ कोई फूल आपको दिख सकता है, छोटे से चुटके में लिखी हुई कोई पंक्ति मिल सकती है. छपी किताबों के पन्ने की खुशबू, दबे फूलों की कसमसाहट या चुटके पर लिखी पंक्तियों से मिलने वाला रोमांच डिजिटल किताबों से नहीं मिल सकते. ठीक वैसा ही है लॉकडाउन से पैदा हुई मजबूरी में हमारे व्यवसाय और हमारे आयोजनों का डिजिटलाइज्ड हो जाना. कह सकते हैं सबकुछ यथावत है, इस ‘यथावत’ के बीच ‘दैहिक मौजूदगी’ के सुख का एक बड़ा खालीपन है.



कर्म क्षेत्र तो हो सकता है डिजिटल प्लेटफार्म, मर्म क्षेत्र नहीं

तो बात हो रही थी उस पीढ़ी की जो इस डिजिटल रूप को देखने से पहले दैहिक मौजूदगी के दौर की भी चश्मदीद रही है. वह पीढ़ी तो इन दोनों स्थितियों के अंतर को समझ सकती है. प्लेटफार्म के बदल जाने की वजहें भी समझ सकती है और इसी नाते वह इस परिवर्तन को तार्किक तौर पर स्वीकार भी कर सकती है, इस उम्मीद के साथ कि गाहे-ब-गाहे वह दैहिक उपस्थिति से अपने आसपास के लोगों से जुड़ी रहेगी. अपने भीतर के खालीपन को भर्ती रहेगी. वह जानती है कि डिजिटल युग कर्म क्षेत्र तो हो सकता है, पर वह जिंदगी का मर्म क्षेत्र नहीं हो सकता, इसलिए शारीरिक उपस्थिति का कोई अवसर वह नहीं छोड़ना चाहेगी, बल्कि ऐसे अवसर वह जुटाती रहेगी.

नई पीढ़ी का संकट

लेकिन आनेवाले कुछ वर्ष पैदा हुई उस पीढ़ी के लिए संकट के रहेंगे, जिसने इस लॉकडाउन के दौरान पहली दफा कक्षा और शिक्षक का चेहरा देखा. जिसने अपने दादा-दादी, नाना-नानी समेत तमाम रिश्तों को मोबाइल और लैपटॉप के जरिए पहचानना शुरू किया. दरअसल, इस पीढ़ी के लिए समाज और रिश्ते-नातों से घुलने-मिलने का मतलब ऑनलाइन होना हो गया. तो जरा सोचें कि तीन से पांच वर्ष के बीच का यह बच्चा-बच्ची लॉकडाउन टूटने के बाद जब अचानक समाज और रिश्तों की भीड़ से घिरेगा तो क्या वह सामान्य रह पाएगा? या उसके लिए यह दुनिया पूरी तरह से नई होगी? ऐसे में हमारी-आपकी भूमिका बड़ी हो जाती है. इन बच्चों को हमें समझाना होगा कि यह जो मोबाइल है, वह तो महज सुविधा है. असल जिंदगी तो बहुत दूसरी है.

हमें ही सोचना होगा

इसी लॉकडाउन के वक्त अपनी स्कूलिंग की शुरुआत करनेवाले बच्चे जब लॉकडाउन के बाद सामाजिक संपर्कों में आएंगे तो उनके सामने घुलने-मिलने का बड़ा संकट खड़ा होगा. इस संकट से निबटने के लिए कैसे बच्चों की मदद करें, कैसे उन्हें इसके लिए ट्रेंड करें – यह हमें अपने-अपने स्तर पर सोचना और समझना होगा.

क्या हम महज टेकसेवी होकर रह जाएं

दूसरी तरह के वे बच्चे हैं जो पहले स्कूल जाते रहे हैं और बाकी समय मोबाइल पर बिताते रहे हैं. जिनके मोबाइल पर वक्त गुजारने की आदत से हम पहले ही परेशान होते रहे हैं. वे बच्चे तो अब लॉकडाउन के समय इस मोबाइल के और आदी होते गए हैं. बाहर निकलना तो उनका हमने ही बैन कर रखा है, क्योंकि हमारे पास कोई चारा नहीं था. अब इन बच्चों को तो हमारे रोकने का सहारा भी मिल चुका है तो आखिर ये अब कैसे सामाजिक धारा में फिर लौटेंगे? क्या इन चीजों का असल उनके भविष्य पर भी पड़ने वाला है? क्या हमारी भावी पीढ़ी सिर्फ टेकसेवी होने वाली है? क्या हमारा सामाजिक जीवन अब तार-तार हो जाएगा? मुमकिन है कि हमारी ये आशंकाएं निर्मूल निकलें, लेकिन इनपर हमें सोचने की जरूरत अभी से है कि गर ये अनचाही स्थितियां दिखें तो हमें कैसे इन्हें नियंत्रित करना होगा.

विकल्पों का संकट तो है

यह सही है कि लॉकडाउन का हमारे पास कोई विकल्प नहीं था. इस दौरान बंद हुए स्कूल और ऑनलाइन शिक्षा को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते थे. बच्चों के लिए ऑनलाइन शिक्षा कोई बहुत बेहतर विकल्प नहीं है, पर जिन बच्चों के पास ऑनलाइन पढ़ाई कर सकने के उपकरण थे, उनका इससे जुड़ना एकमात्र विकल्प था. यूनिसेफ की एक रिपोर्ट बतलाती है कि भारतीय परिवार में केवल 24 फीसदी घर ही ऐसे हैं जिनके पास ऑनलाइन शिक्षा की सुविधा है. शेष बच्चे इस दौरान उपेक्षित ही रहे. ऑनलाइन शिक्षा से जुड़े शिक्षक बताते हैं कि इन बच्चों को मोबाइल पर नियंत्रित करना मुश्किल काम है. कुछ बच्चे बेहद शरारती होते हैं. ग्रुप में कई ऐसी चीजें शेयर कर देते हैं जो बच्चों की पहुंच से दूर होने चाहिए. क्लासेज के बीच बच्चे गाना बजाने से लेकर वीडियो चलाने तक का उत्पात करते हैं, उन्हें दूर रहकर नियंत्रित नहीं किया जा सकता.

समस्या तकनीक से नियंत्रण की

समस्या यह नहीं कि बच्चे शिक्षकों से ऑनलाइन पढ़ते वक्त ये सब उत्पात कर रहे. खतरनाक यह है कि इन बच्चों के हाथ ऐसी चीजें लग रही हैं जिनतक उनकी पहुंच इस उम्र में नहीं होनी चाहिए थी. बदलती हुए इस दुनिया की भी एक मर्यादा है, उसका एक अनुशासन है. लेकिन सबसे बड़ा संकट हमारे सामने यही है कि अभी इस ऑनलाइन मर्यादा और अनुशासन से अधिकतर भारतीय परिवार अनजान है. इसके शिक्षक इस माध्यम के लिए अप्रशिक्षित हैं. हमारी तकनीक इतनी समृद्ध नहीं कि बच्चों की इस उच्छृंखलता पर अंकुश लगा सकें.

अंकुश भी लग जाए, पर...

और यह सच है कि देर-सबेर तकनीकों के जरिए हम भले अंकुश लगाना सीख जाएं, हमारे शिक्षक अपने बच्चों को नियंत्रित भी करने लग जाएं. लेकिन ऑनलाइन माध्यमों की वह सीमा हम कैसे तोड़ें जो किसी शख्स में इनसानियत पैदा करने में बौना है. मानवीय गुण विकसित करने में नाकाम है.

आगाह करना होगा

जाहिर है, बच्चों को सामाजिक जीवन और ऑनलाइन माध्यम के बीच तालमेल करना सिखाने के लिए हमें खुद ट्रेंड होने की जरूरत है. हमें वह गुर फिलहाल सीखना होगा जिससे हम बच्चों को ऑनलाइन की खूबियों और खामियों के बारे में आगाह कर सकें. हमें अपने भीतर वे गुण पैदा करने होंगे जिनसे बच्चों को सामाजिक उपस्थिति के महत्व का पता चले, ऑनलाइन खूबियों को वह समझ सकें और साथ ही सीख सकें जीने की कला.

(डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं)
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