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Delhi Violence: राजनेताओं का सामाजिक दायित्व भी तो है
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News18India
Updated: February 26, 2020, 7:00 PM IST
Delhi Violence: राजनेताओं का सामाजिक दायित्व भी तो है
दिल्ली के उत्तर-पूर्वी जिले में CAA के समर्थन और विरोध को लेकर फैला तनाव.

दिल्ली दंगों की आग बुझाने में अगर किसी की कारगर भूमिका हो सकती है, तो वह राजनेताओं के अलावा और किसी की हो नहीं सकती.

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  • Last Updated: February 26, 2020, 7:00 PM IST
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यह समय दिल्ली दंगों की जिम्मेदारी तय करने का नहीं है. एक-दूसरे पर आरोप अर्से से लग रहे हैं, लेकिन इस समय हालत हद से ज्यादा खराब है. आग लगी है. सबसे पहले उसे बुझाने की जरूरत है. सोचा यह जाना चाहिए कि फौरन क्या-क्या उपाय किए जाएं.

कौन क्या कर सकता है?
हर दंगा, कानून-व्यवस्था का ही मसला माना जाता है. लेकिन यह देश की राजधानी दिल्ली में दंगों का मामला है. उस दिल्ली का है, जहां हाल ही में चुनाव हुए हैं. जाहिर है कि दंगे से निपटने के उपाय ढूंढते समय राजनीतिक दलों को सामने रखना ही पड़ेगा. उधर, कानून-व्यवस्था के लिए भारतीय पुलिस जो करती आई है या कर पाती है, उसे सब जानते हैं. लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस की मजबूरियां भी किसी से छिपी नहीं हैं. तीसरा पक्ष सामाजिक संस्थाएं हैं. लेकिन जहां विशुद्ध सामाजिक सरोकारों से ही स्वयंसेवी संस्थाओं की दूरी बढ़ती जा रही हो, वहां राजव्यवस्था का विरोध और सांप्रदायिक दंगों जैसे मामलों में सामाजिक उपायों की बात करना फिजूल ही है. यानी दिल्ली दंगों की आग बुझाने में अगर किसी की कारगर भूमिका हो सकती है, तो वह राजनेताओं के अलावा और किसी की हो नहीं सकती.

क्या कर रहे हैं राजनीतिक दल



आमतौर पर कानून-व्यवस्था के मामले में सत्तारूढ़ दल की अपनी भूमिकाएं होती हैं और विपक्ष की अपनी. लेकिन सांप्रदायिक दंगों को कानून-व्यवस्था का मामला समझकर वैसी भूमिकाएं नहीं निभाई जा सकतीं. गौर से देखना पड़ेगा कि राजनीतिक दलों से क्या अपेक्षा की जाए. वैसी स्थिति में यह तो अपने आप उजागर हो जाएगा कि राजनीतिक दल आखिर कर क्या रहे हैं.

दिल्ली के समाज के सबसे नजदीक कौन है?
सभी मानेंगे कि जरूरत लोगों को समझाने की है. लोगों को समझाने के लिए उनके पास जाना पड़ता है. इस लिहाज से देखें तो इस समय दिल्ली के लोगों से सबसे ज्यादा नजदीक दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी है. हाल ही में चुनाव हुए हैं और चौतरफा जनमत से दिल्ली ने उसे चुना है. हालांकि ऐसा नहीं है कि कभी दिल्ली पर काबिज रही कांग्रेस और भाजपा की कोई हैसियत ही न बचती हो. लेकिन इस बात को कोई नहीं नकार सकता कि इस समय दिल्ली से संवाद के लिए अगर कोई सबसे ज्यादा प्रभावी राजनीतिक दल है तो वह आम आदमी पार्टी है और खासतौर पर उसके नेता अरविंद केजरीवाल हैं. उधर, विद्वान लोग सुझाव दे रहे हैं कि दिल्ली में फौरन ही शांति समितियां बनाई जानी चाहिए. लेकिन सवाल यह है कि इन समितियों के गठन का चुनौतीपूर्ण काम कौन करे. सो नया-नया जनादेश पाकर दिल्ली के मुख्यमंत्री बने केजरीवाल यह भूमिका आसानी से निभा सकते हैं.

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भाजपा और कांग्रेस क्यों नहीं?
क्योंकि भाजपा केंद्र की सरकार पर काबिज है. गृह मंत्रालय की जिम्मदारियों के नाते वह समस्या में एक प्रमुख पक्ष है. लिहाजा उसके पास पुलिस के जरिए अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहने के अलावा ज्यादा कुछ बचता नहीं है. उधर, दिल्ली में पूरी तौर पर अस्वीकार की जा चुकी कांग्रेस की बात को उतनी अहमियत मिलना मुश्किल है. हां, अगर दंगे यहीं नहीं रुके और ज्यादा फैल गए तो इन दोनों बड़े दलों को बाद में पछतावा रहेगा कि वक्त रहते उन्होंने अपनी ज्यादा भूमिका क्यों नहीं निभाई.

राजनीति के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी
राजनीतिक क्षेत्र निरपेक्ष नहीं होता. उसका काम वैधानिक और आर्थिक के अलावा सामाजिक भी उतना ही है. इसीलिए दिल्ली के मुख्यमंत्री से यह अपेक्षा उन पर ज्यादती नहीं कही जा सकती कि वे सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत दिल्ली में शांति बहाली के लिए अतिरिक्त भूमिका निभाएं. राजनीतिक नफे-नुकसान को छोड़कर सामुदायिक भाईचारे की मुहिम पर निकल पड़ें. उन्हें यह समझना चाहिए कि हाल फिलहाल वे दिल्ली वालों की पसंद के व्यक्ति हैं. और उनकी छवि फिलहाल किसी धर्म विशेष के पक्ष की नहीं है.

सोचना पुलिस को भी पड़ेगा
पुलिस को अदालत से जिस तरह की डांट खानी पड़ी है, उसके बाद उसे अपने व्यावसायिक कौशल के बारे में सोचना पड़ेगा. वैसे देश में पूरे पुलिस प्रशिक्षण की ही हालत बहुत पतली है. दंगे और खासतौर पर सांप्रदायिक दंगों से निपटने के लिए भारतीय पुलिस को विशेष प्रकार का प्रशिक्षण तो बिल्कुल भी उपलब्ध नहीं है. अपराधशास्त्र के अध्यापन में पुलिस के लिए सामुदायिक भागीदारी के पाठ तो हैं, लेकिन इसे व्यवहार में लाया जाता कभी नहीं दिखता. वैसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस की राजनीतिक मजबूरियां भी उसे ज्यादा कुछ करने नहीं देतीं. फिर भी अदालत ने अगर पुलिस को ज्यादा प्रोफेशनल यानी व्यावसायिक तरीके से काम करने की समझाइश दी है, तो बड़ा अच्छा मौका है कि सरकारी तौर पर पुलिस के कौशल विकास का काम शुरू किया जाए. हालांकि दिल्ली दंगों के मौजूदा हालात ऐसे हैं कि यह काम रातोंरात नहीं हो सकता. दंगे जैसी आपात स्थिति में लोकप्रिय राजनीतिकों से ही उम्मीद लगाई जानी चाहिए.

 

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First published: February 26, 2020, 7:00 PM IST
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