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Opinion: कोरोना के अंधेरे के बीच दिख रही राष्ट्र शक्ति की जगमगाहट
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Updated: April 7, 2020, 8:40 PM IST
Opinion: कोरोना के अंधेरे के बीच दिख रही राष्ट्र शक्ति की जगमगाहट
कोरोना से छिड़े युद्ध में जी जान से जुटे युवाओं और स्वास्थ्य कर्मियों की लगनशीलता देखने को मिल रही है. (फाइल फोटो)

कोरोना संकट के बीच साल 2020 में राष्ट्र के शक्ति की जगमगाहट दिख रही है. इस दौरान देश की एकजुटता में हर किसी को भागीदार बनना है.

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कोरोना से छिड़े युद्ध में जी जान से जुटे युवाओं और स्वास्थ्य कर्मियों की लगनशीलता और कर्मठता के संबंध में उत्साहजनक जानकारी लगातार मुझे मिल रही है. ऐसे में 1962 तथा 1965 में युद्ध के समय उभरी देश की एकजुटता की याद आना स्वभाविक है. मैं उस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय का शोध छात्र था, रेलवे स्टेशन पर सैनिकों को ले जानेवाली गाड़ियों पर उनके उत्साहवर्धन के लिए चाय, नाश्ता, भोजन की जो व्यवस्था की गई थी, उसका हिस्सा था. उस सब में कितना उत्साह था, आत्मीयता थी, हर गाड़ी के आगमन पर और जाते समय जिस जोश से 'भारत माता की जय' का नारा लगता था, उसमें सबकुछ भला दिया जाता था. केवल राष्ट्र और उसके प्रति समर्पण की तैयारी ही मन- मष्तिष्क में जीवन्त रहती थी.

जनसभा में बजी तालियां और लगे नारे
1965 की विजय के बाद जब प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री इलाहाबाद में जन सभा को संबोधित करने आये तो सारा शहर और पूरा विश्वविद्यालय वहां उपस्थित था. सभी आपस में यही कह रहे थे कि इतनी विशाल सभा इस शहर में पहले कभी नहीं देखी या सुनी गई. कितने बार तालियां बजी, नारे लगे, गिन पाना असंभव था.

अपने भाषण में जब शास्त्री जी ने एक यह वाक्य बोला, “कभी कभी छोटा आदमी भी बड़े काम कर जाता है” तो तालियां बजीं, हर एक ने अपने पास वाले की और मुड़कर देखा. जैसे हर कोई उस से भी उस वाक्य का अर्थ पूछ रहा हो, तालियों की जिस गड़गड़ाहट को थमना था, वह एकदम तेजी से फिर उभरी और लोग अपने अपने स्थान पर उछल रहे थे, नाच रहे थे, एक-दूसरे के गले मिल रहे थे – हर एक ने उस वाक्य का अपना-अपना अर्थ निकाल लिया था!



सबकी समझ एक ही थी. आप भी समझ गए होंगे. यह वह समय था जब देश में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की उपस्थिती युवाओं को सतत प्रेरणा देती रहती थी. यह कल्पना कर पाना भी असंभव था कि कोई भी भारत का नागरिक ‘भारत माता की जय’ बोलने पर भी ऐतराज कर सकता है!



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एक कार्यक्रम में पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री. (फाइल फोटो)


नेताओं के त्याग, तपस्या और सादगी की होती थी चर्चा
उन दिनों विश्वविद्यालयों में नेताओं के त्याग, तपस्या तथा सादगी की चर्चा होती रहती थी. घोटालों की और उनमें नेताओं की संलिप्तता पर चर्चा नहीं होती थी, क्योंकि जनप्रतिनिधियों में अपवाद छोड़कर आंख की शर्म विद्यमान थी, जनता उनका आदर करती थी. सांसद निधि नहीं थे, सांसद अपना वेतन स्वयं नहीं बढ़ाते थे, उन्हें पेंशन भी नहीं मिलती थी. वे जन-सेवा का उत्तरदायित्व भूले नहीं थे.

बदला वक्त और इस तरह हो गए आपस के संबंध
वक्त बदला, एक वाक्य में उसे यूं कहा जा सकता है कि 'जनता और जन-प्रतिनिधियों' के बीच का ‘पारस्परिक सम्मान, आदर, और विश्वास’ का संबंध लगभग नगण्य हो गया. यह भारत जैसे देश में अस्वीकार्य होना चाहिए. अब इसमें बदलाव का समय उपस्थित हुआ है. देश को सकारात्मक सहयोग, पारस्परिकता और संवेदनात्मक संबंधों की प्रगाढ़ता की और बढ़ना होगा. दूसरा विकल्प नहीं है.

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विश्वविद्यालयों में नेताओं के त्याग, तपस्या तथा सादगी की चर्चा होती रहती थी.


आम लोगों से दूर हो गये हैं राजनेता
राष्ट्रपति से लेकर सांसदों तक के वेतन में 30% की कटौती एक अत्यंत विचारपूर्ण और सामयिक कदम है. इसमें मुझे सबसे महत्वपूर्ण तो सांसद निधि का दो साल तक रोका जाना लगता है. मैं देश के उनलोगों में हूं जो मानते हैं कि यह प्रावधान अस्वीकार्य परिस्थितियों में किया गया था, इस प्रावधान का कोई नैतिक औचित्य न था, न है. मुझे उन राज नेताओं पर तरस आता है जो वेतन कटौती और सांसद निधि संबंधी निर्णय का विरोध कर रहे हैं. वे सामान्य जन से इतनें दूर चले गए हैं कि विपक्ष में रहकर भी उस दूरी को बढ़ाते ही जा रहे हैं.

कोरोना संकट से इन बातों पर दिलाया ध्यान
कोरोना संकट ने राष्ट्र को आवश्यक परिवर्तन की आवश्यकता की और फिर से ध्यान दिलाया है. इस वायरस का आक्रमण 1962, 1965 और 1971 के युद्धों से अधिक विकट और भयानक है. जिस एकजुटता की आवश्यकता इस समय है उसका कोई दूसरा उदाहरण संभव नहीं है. जिस ढंग से सारे देश ने 22 मार्च 2020 को एक दिन के लॉक डाउन में भागीदारी की वह राष्ट्रीय समझ का अद्भूत उदाहरण बनी.

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इस वायरस का आक्रमण 1962, 1965 और 1971 के युद्धों से अधिक विकट और भयानक है.


दिखा देश की जनता का नेतृत्व पर विश्वास
इससे यह भी सुनिश्चित हुआ कि देश को राष्ट्रीय नेतृत्व पर पूर्ण विश्वास है. तीन सप्ताह के लॉकडाउन के लिए जिस विचारपूर्ण ढंग से राष्ट्रीय सरकार ने पहले एक दिन का राष्ट्र-प्रशिक्षण किया वह भी गहन चिंतन और संवेदना का ही परिणाम था. जिस ढंग से प्रधान मंत्री की अपील पर देश नें थाली, घंटी बजाई और 5 अप्रैल को एकजुट होकर दीप जलाए, वह विश्व के अनेक देशों के लिए अनुकरणीय बन गया.

देश के युवा पूरी उन सब लोगों को राहत पहुंचाने में लग गए हैं जिन्हें मदद की आवश्यकता है और ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है. इनकी कठिनाइयां और बढ़ सकती है और अधिक जन सहयोग की आवश्यकता होगी, जोश और उत्साह बनाये रखनें में भी हर नागरिक को दूसरे की मदद करनी होगी. अनेक कारणों से कुछ कमियां और भूले भी उजागर हुई हैं. अपवाद तो होते ही हैं, मगर उनका पूर्वानुमान लगाकर आवश्यक तैयारी ही उनसे पार पाने का विकल्प बनता है.

हर व्यक्ति को होना है भागीदार
कोरोना से जिस जिस ढंग से भारत निबट रहा है, उसकी भूरी-भूरी प्रशंसा पूरे विश्व में हो रही है. यह वह समय है जब हर व्यक्ति को प्रधान मंत्री के साथ खड़ा होना है और देश की एकजुटता में भागीदार बनना है. जो भी व्यक्ति इस समय एक अन्य व्यक्ति या परिवार की सहायता कर रहा है, बहुत बड़ा काम कर रहा है. उसे केवल यह याद रखना है कि कुछ अवसरों पर छोटा आदमी भी बड़े काम कर सकता है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

 

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First published: April 7, 2020, 8:07 PM IST
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