Opinion: आंदोलन को हाई जैक होने से बचाएं छात्र, हिंसक हो कर भटक जाता है विरोध प्रदर्शन
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Opinion: आंदोलन को हाई जैक होने से बचाएं छात्र, हिंसक हो कर भटक जाता है विरोध प्रदर्शन
फ्रेंड्स कॉलोनी, मथुरा रोड पर प्रदर्शन के दौरान जली हुई बस और कार

छात्रों और विरोध करने वालों को समझना होगा, पुलिस को भी संयम से लेना होगा काम, 1925 में बने जामिया मिलिया इस्लामिया का एक लंबा इतिहास रहा है

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  • Last Updated: December 17, 2019, 10:58 AM IST
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नई दिल्ली. नागरिकता संशोधन कानून (Citizenship Act) के खिलाफ जामिया मिल्लिया इस्लामिया (Jamia University) और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (Aligarh Muslim University) में हिंसा का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. सुप्रीम कोर्ट की सीनियर वकील इंदिरा जयसिंह ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. उनकी अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को तैयार तो हो गया है, लेकिन उसने सुनवाई से पहले हिंसा रोकने की शर्त लगा दी है. इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) मंगलवार को सुनवाई करेगा.

दरअसल, सीनियर वकील इंदिरा जयसिंह ने चीफ जस्टिस बोबडे की बेंच को मामले का स्वत: संज्ञान लेने का आग्रह किया था. उन्होंने चीफ जस्टिस की बेंच से कहा कि यह मानव अधिकार हनन का गंभीर मामला है. इस पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस शरद अरविंद बोबडे ने जामिया हिंसा मामले पर नाराजगी जाहिर की और साफ कहा कि हिंसा रुकने पर ही सुनावई होगी.
चीफ जस्टिस शरद अरविंद बोबडे ने कहा, "वे विद्यार्थी हैं, इसका अर्थ यह नहीं है कि वे कानून एवं व्यवस्था अपने हाथ में ले सकते हैं, इस पर सब कुछ शांत होने पर फैसला लेना होगा. इस समय ऐसा माहौल नहीं है, जब हम कुछ तय कर सकें, बवाल रुकने दीजिए."


शांतिपूर्वक विरोध नागरिकों का संवैधानिक अधिकार 
सुप्रीम कोर्ट की यह नाराजगी एकदम जायज है. हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्वक विरोध नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है. इस अधिकार को इस्तेमाल करने से कोई रोकता भी नहीं है. किसी भी विरोध प्रदर्शन का हिंसक हो जाना उसके मूल उद्देश्य से भटकने का परिचायक है. जामिया मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ लगता है. यह सवाल उठना लाज़िमी है कि कई दिनों तक शांति पूर्वक चलने वाला आंदोलन अचानक हिंसक कैसे हो गया? इसे असामाजिक तत्वों ने हाइजैक कर लिया या फिर किसी साज़िश के तहत इसे मक़सद से भटकाने की कोशिश हुई है. छात्रों की तरफ से हिंसा और उसके जवाब में पुलिस कार्रवाई दोनों ही सवालों के घेरे में हैं.
जामिया के छात्र आंदोलन को लेकर शुरू से ही आशंका व्यक्त की जा रही थी कि कहीं यह हाईजैक न हो जाए. ऐसा ही हुआ भी. विरोध प्रदर्शन संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाकर नागरिकता कानून में बदलाव करने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ था. लेकिन प्रदर्शनकारियों ने ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाह हु अकबर’ के नारे और प्रदर्शन स्थल पर नमाज़ पढ़ने की तस्वीरें सामने आते ही अहसास हो गया था कि आंदोलन कट्टरपंथियों के हाथों में जा रहा है. सवाल उठा था कि जब हिंदू-मुस्लिम सभी छात्र आंदोलन कर रहे हैं तो फिर इसे सांप्रादायिक रंग देने की क्या ज़रूरत है? ऐसी भी आशंका थी कि शरारती तत्व भीड़ में घुसकर आंदोलन को हिंसक रूप दे सकते हैं.



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रविवार की रात दिल्ली पुलिस के हेडक्वार्टर पर इकट्ठा हुए छात्र (File Photo)


मकसद से भटकता विरोध प्रदर्शन
दरअसल छात्रों का यह विरोध प्रदर्शन केंद्र सरकार के खिलाफ था और है. छात्रों को इसे इसी रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए थी. लेकिन जब इसमें धार्मिक नारे लगने लगे तो यह मकसद से भटकता दिखा. हालांकि धार्मिक नारे लगाने वाले छात्र नहीं बल्कि जामिया के आसपास के स्थानीय लोग थे.
प्रदर्शन में स्थानीय लोग और जामिया के छात्र ऐसे घुल मिल गए कि पहचानना मुश्किल हो रहा था कि कौन जामिया का छात्र है और कौन यूनिवर्सिटी के बाहर का व्यक्ति है. हो सकता है कि इसी स्थिति का फायदा उठा कर कुछ शरारती तत्वों ने पुलिस पर पथराव और आगज़नी को अंजाम दिया हो. ऐसे तत्वों को पहचान कर रोकने की ज़िम्मेदारी आंदोलन की अगुवाई करने वालों की होती है. ज़ाहिर है कि उन्होंने यह ज़िम्मेदारी नहीं निभाई.


रविवार को जामिया में या उसके आसपास वही हुआ, जिसकी आशंका पहले से थी. बसें जलाई गईं. किसने जलाईं? इसे लेकर विवाद है. पुलिस कहती है कि आंदोलनरत छात्रों ने ही बसें फूंकीं. घटना स्थल से आए वीडियो में पुलिस की वर्दी में कुछ लोग बसें जलाने से पहले बस के अंदर और बाहर पेट्रोल छिंड़कते नजर आ रहे है. ये लोग कौन हैं? पुलिस और सुरक्षा बलों की मौजूदगी में ये ऐसा क्यों कर रहे हैं? सुरक्षा बलों ने इन्हें रोका क्यों नहीं? ये सब जांच का विषय है. आंदोलन के नाम पर हिंसा को किसी भी तरह से जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचाना किसी भी तरह तर्क संगत नहीं कहा जा सकता. इसका किसी भी तरह समर्थन नहीं किया जा सकता.

इन हिंसक घटनाओं के जवाब में दिल्ली पुलिस ने जामिया में जो कुछ किया, उसे शर्मनाक और बेहद शर्मनाक के अलावा कुछ और नहीं कहा जा सकता. यूनिवर्सिटी प्रशासन की इजाज़त के बगैर पुलिस ने जामिया में घुसकर छात्रों जिस तरह दौड़ा-दौड़ा कर मारा, वो अभूतपूर्व है. आरोप है कि लाइब्रेरी में छात्रों को घेर कर मारा गया. छात्र बाहर न निकल सकें, इसके लिए दरवाजे बंद करके उनके आगे भारी भरकम मेज़ें उल्टी करके लगा दी गईं. लाइब्रेरी में पढ़ रहे छात्रों को हिंसा करने के आरोप में हिरासत में लिया गया. लाइब्रेरी में पुलिसिया बर्बरता की सामने आईं वीडियो रोंगटे खड़े कर रही हैं.

दिल्‍ली के जामिया इलाके में नागरिकता कानून के विरोध में हुए प्रदर्शन के बाद बसों में आग लगा दी गई. (फोटो- पीटीआई)


जामिया उपकुलपति प्रोफ़ेसर नजमा अख़्तर पुलिस कार्रवाई से बेहद खफा हैं. नजमा अख़्तर ने वीडियो बयान जारी करके कहा है, "मेरे छात्रों साथ हुई बर्बरता की तस्वीरें देखकर मैं बहुत दुखी हूं. पुलिस का कैंपस में बिना इजाज़त आना और लाइब्रेरी में घुसकर बेगुनाह बच्चों को मारना अस्वीकार्य है. मैं बच्चों से कहना चाहता हूं कि आप इस मुश्किल घड़ी में अकेले नहीं हैं. मैं आपके साथ हूं. पूरी यूनिवर्सिटी आपके साथ खड़ी है."
प्रोफ़ेसर नजमा ने कहा, ''मैं इस मामले को जहां तक ले जा सकती हूं, ले जाऊंगी. आप लोग कभी भी अकेले नहीं हैं और घबराइए मत. हम सभी एक साथ हैं और ग़लत ख़बर पर विश्वास मत कीजए."


जामिया और एएमयू में छात्र आंदोलन हिंसक होने का है पुराना रिकॉर्ड
दरअसल जामिया और एएमयू में छात्र आंदोलन हिंसक होने का पुराना रिकॉर्ड हैं. लगभग हर दूसरे तीसरे साल छात्रों के हिंसक आंदोलन की वजह से दोनों विश्विद्यालय हफ्तों बंद करने पड़ते है. लेकिन ऐसी बर्बर पुलिस कार्रवाई पहली बार हुई है. 90 के दशक में सलमान रुश्दी की किताब ‘सैटेनिक वर्सेज़’ के खिलाफ भी जामिया में हिंसक आंदोलन हुआ था. तब के कुलपति मुशीरुल हसन के एक बयान के खिलाफ छात्रों ने जबर्दस्त गुस्सा दिखाते हुए आंदोलन किया था. तब भी छात्रों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पे हुई थीं. नतीजे में कई महीने यूनिवर्सटी बंद रही थी.

यूनिवर्सिटी कैंपस के अंदर ही शांतिपूर्वक आंदोलन करते छात्र
पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए यूनिवर्सिटी प्रशासन को उचित क़दम उठाने चाहिए थे. बेहतर होता कि छात्र यूनिवर्सिटी कैंपस के अंदर ही शांतिपूर्वक आंदोलन करते. न उन्हें बाहर आने दिया जाता और न ही बाहरी लोगों को अंदर जाने दिया जाता. लेकिन समस्या यह भी है कि शांतिपूर्वक आंदोलनों की आवाज़ सत्ता के कानों तक पहुंचती ही नहीं. पिछले महीने ही जेएनयू के छात्र फीस बढ़ाने के खिलाफ हफ्तों तक शांतिपूर्वक आंदोलन करते रहे. मीडिया में सुर्खिया तब बनी जब छात्र सड़कों पर उतरे.

गौरतलब है कि 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को यूनिवर्सिटी का दर्जा दिए जाने के बाद तत्कालीन मुस्लिम नेतृत्व विशेषकर आंदोलन की अगुवाई कर रहे अली बंधुओं को यह एहसास था, कि एएमयू अब पूरी तरह अंग्रेजों के कंट्रोल में चला जाएगा और यहां से स्वतंत्रता संग्राम के मतवालों को भी आवाज़ उठाने की अनुमति नहीं होगी, इसलिए उन्होंने जमीयत उलमा-ए-हिंद के सहयोग से अलीगढ़ में ही जामिया मिल्लिया इस्लामिया की बुनियाद रखी.

सत्ता के दमन के खिलाफ आवाज़ उठाती रहीं हैं अलीगढ़ और जामिया संस्था
साल 1925 में यह संस्था दिल्ली के करोल बाग इलाके में लाई गई और फिर 1936 में दिल्ली के ही ओखला इलाके में इसका अपना परिसर बनकर तैयार हुआ. अंग्रेज़ों के जमाने से ही अलीगढ़ और जामिया दोनों ही सत्ता के दमन के खिलाफ आवाज़ उठाती रहीं हैं. जब-जब सरकारों ने जनहित के खिलाफ फैसले लिए दोनों ही विश्वविद्यालयों ने उनके खिलाफ आवाज़ बुलंद की है. नागरिक संशोधन विधेयक देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर हमला मना जा रहा है. दुनिया भर में इसे भारतीय संविधान के बराबरी के मौलिक अधिकार और अंतर-राष्ट्रीय मानवाधिकारों के खिलाफ माना जा रहा है. ऐसे में जामिया में भी इसके खिलाफ आक्रोश फूटा.

आंदोलन हिंसक तब हुआ जब यूनिवर्सिटी के कैंपस से बाहर सड़कों पर आया. पुलिस का बल पूर्वक प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर आने से रोकना भी तर्क संगत नहीं है. जामिया, अलीगढ़, लखनऊ समेत देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी ख़बरे आ रहीं है कि पुलिस छात्रों को प्रदर्शन के लिए कैंपस से बाहर नहीं आने दे रही. इसी वजह से छात्रों और पुलिस के बीच संघर्ष हो रहा है. आंदोलन को हिंसक बनाने के पीछे यही सबसे बड़ी वजह है. वजह जो भी हो किसी भी आंदोलन को हिंसक बनाने की इजाज़त नहीं दी जा सकती. हिंसा को किसी भी तरक स्वीकर नहीं किया जा सकता.

बहरहाल सुप्रीम कोर्ट इस सब पहलुओं पर भी ग़ौर करेगा. इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका इस लिए और भी अहम हो जाती है क्योंकि उसे इस क़ानून के खिलाफ लगभग एक दर्ज़न याचिकाओं पर भी सुनवाई करनी है.

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