OPINION: भारतीय मुसलमानों को CAA से डरना नहीं चाहिए

सीएए के खिलाफ प्रदर्शन (प्रतीकात्मक तस्वीर)

नागरिकता कानून की हिमायत पहले कांग्रेस (Congress) नेता भी करते रहे हैं, यहां तक कि देश छोड़ कर जाने वाले वहां के अल्पसंख्यकों (Minorities) की सुरक्षा की गारंटी दी गई थी.

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नई दिल्ली. नागरिकता संशोधन कानून (Citizenship Amendment Act) जैसे महत्त्वपूर्ण निर्णय पर बहस के इच्छुक सही सोच वाले लोगों को इस कानून पर मचाए जा रहे हंगामे पर निश्चय ही आश्चर्य होगा. यह एक ऐसा कानून है जो अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों (Minorities) जैसे हिंदुओं, सिखों, पारसियों, ईसाइयों, बौद्धों और जैनों को नागरिकता देने की बात करता है. इन समुदाय के जो लोग जो 31 दिसंबर 2014 तक भारत आ चुके हैं, ऐसे लोगों को भारत गैरकानूनी प्रवासी नहीं मानेगा और अगर वे पिछले पांच सालों से भारत में रह रहे हैं तो उन्हें यहां की नागरिकता दी जाएगी.

ल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार को देखते हुए लाया गया CAA
घोषित रूप से इन इस्लामिक देशों में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार को देखते हुए यह कानून लाया गया है. इन देशों में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को इस बात से समझा जा सकता है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी जो 1951 में 23 प्रतिशत थी, 2011 में घटकर 3.7 प्रतिशत रह गई है. बांग्लादेश में यह 22 प्रतिशत से घटकर 7.8 पर आ गई है.

इन अल्पसंख्यकों के साथ बलात्कार, उत्पीड़न और इनके धर्म परिवर्तन कराए जाने की खबरें आती रही हैं. क्या भारत को यह जानते हुए भी इन सब बातों को नजरअंदाज कर देना चाहिए कि जब बंटवारे के दौरान ये लोग भारत छोड़कर पाकिस्तान गए थे तो वहां की सरकार ने उन्हें इन बातों से सुरक्षा की गारंटी दी थी? कई वजहों से उन्होंने पाकिस्तान जाना स्वीकार किया और इसका एक प्रमुख कारण था उनके पैतृक घरों का पाकिस्तान में होना.

पाकिस्तान ने वादे के मुताबिक नहीं दी अल्पसंख्यकों को सुरक्षा
उस समय पाकिस्तान ने वादा किया था कि अल्पसंख्यकों को पूरी सुरक्षा दी जाएगी. बंटवारे के बाद जो नेहरू-लियाकत समझौता हुआ था, उसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अल्पसंख्यक सुरक्षित रहें. लेकिन वहां इस वादे को लागू करने के लिए इसके लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए. उस समय के भारतीय नेता पाकिस्तान के कट्टरपंथी रास्ते पर जाने से वाकिफ थे. इन नेताओं में से अधिकांश जैसे महात्मा गांधी, डॉक्टर बीआर अंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आजाद और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने यह दलील दी थी कि अगर इन लोगों को वहां गरिमापूर्ण जिंदगी जीने में मुश्किल होती है, तो भारत उन्हें वापस ले लेगा.

पाकिस्तानी शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रस्ताव कांग्रेस ने किया पास
कांग्रेस कार्य समिति ने 25 नवंबर 1947 को अपनी बैठक में पाकिस्तानी शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रस्ताव पास किया और कहा, “सीमा पार करके पाकिस्तान से भारत आनेवाले गैर-मुस्लिमों को संरक्षण देने और उनकी जान एवं प्रतिष्ठा को बचाने के लिए कांग्रेस प्रतिबद्ध है.”

मौलाना आजाद ने यह भांप लिया था कि हिंदुओं कि लिए पाकिस्तान में रहना मुश्किल होगा और इसलिए उन्होंने यह भविष्यवाणी की थी कि हिंदू या तो वहां से भाग जाएंगे या भगा दिए जाएंगे. महात्मा गांधी ने कहा था कि हिंदू और सिख जो वहां (पाकिस्तान में) नहीं रहना चाहते, निस्संदेह उन्हें भारत में वापस आने का अधिकार है. इसी संदर्भ में भारत सरकार उन्हें नागरिकता, रोजगार और आरामदायक जिंदगी जीने की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए बाध्य है.

नेहरू ने कहा था- पाकिस्तान के हिंदू और सिख भारत आने के लिए स्वतंत्र हैं
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर जवाहरलाल नेहरु को भी चिंता थी. उन्होंने कहा, “मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि वे हमारे अपने हैं और हमारे रहेंगे. उनकी भलाई हमारी प्राथमिकता है. मैं उन्हें आश्वस्त करना चाहता हूं कि पाकिस्तान के हिंदू और सिख भारत आने के लिए स्वतंत्र हैं. वे जब भी भारत आना चाहेंगे, हम उनको स्वीकार करेंगे.”

मनमोहन ने कहा था- बांग्लादेश के उत्पीड़ित हिंदुओं की नागरिकता देने की बात
हाल के दिनों में डॉक्टर मनमोहन सिंह सहित कई कांग्रेसी नेता यह कह चुके हैं कि बांग्लादेश के उत्पीड़ित हिंदुओं की मुश्किलें दूर करने के लिए उन्हें नागरिकता दी जानी चाहिए. डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कहा था, “बांग्लादेश जैसे देशों में अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न हुआ है. यह हमारा नैतिक दायित्व है कि अगर परिस्थितियां लोगों को हमारे देश में शरण लेने को बाध्य करती हैं, तो भाग्य के मारे ऐसे लोगों को नागरिकता देने में हमें उदारता बरतनी चाहिए.”

असम प्रदेश कांग्रेस समिति (एपीसीसी) की कार्यकारी समिति की 2015 में हुई बैठक में एपीसीसी अध्यक्ष अंजन दत्ता ने कहा, “हम बंगाली हिंदू, बौद्ध, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को नागरिकता देने के अनसुलझे मुद्दे को उठाएंगे. ये ऐसे लोग हैं जिनके साथ भारत के बंटवारे के बाद अमानवीय व्यवहार हुआ है. ये लोग अविभाविजत भारत के नारिक हैं और धर्म के आधार पर उत्पीड़ित किए जाने के बाद अपनी जान बचाने के लिए उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा. एपीसीसी ने केंद्र से आग्रह किया कि ऐतिहासिक वास्तविकता और मानवीय पक्षों को देखते हुए ऐसे सभी लोगों को नारिकता दी जाए.”

हिंदुओं की दुर्दशा को लेकर जोगेंद्रनाथ मंडल ने दिया था पाकिस्तान के मंत्रालय से इस्तीफा
जो लोग यह कहते हैं कि पाकिस्तान में स्थिति उतनी खराब नहीं है जितनी कि बताई जा रही है, तो उन्हें जोगेंद्रनाथ मंडल के बारे में जानना चाहिए जो कि पाकिस्तान के संस्थापकों में से एक थे और पाकिस्तान के श्रम और कानून मंत्री बने थे. वह एक दलित नेता थे और उन्होंने मुसलमानों के साथ हमदर्दी दिखाई थी. हिंदुओं की दुर्दशा और उनके साथ हो रहे विभेद को देखकर वे बहुत ही दुखी हुए और उन्होंने मंत्रालय से इस्तीफा दे दिया और बाद में पश्चिम बंगाल में बस गए.

विपक्ष ने अफवाह फैलाया कि CAA मुसलमानों के खिलाफ है
इस तरह ऐतिहासिक संदर्भ और संविधान निर्माताओं ने जो वादे किए थे उसको देखते हुए सीएए पूर्णतया जायज है. जब गृहमंत्री अमित शाह ने संसद के दोनों सदनों में यह विधेयक पेश किया था तो इन बातों पर काफी विस्तार से चर्चा हुई थी. इसके बाद इस पर विवाद नहीं होना चाहिए था पर संसद में विफल रहने वाला विपक्ष संसद के बाहर सीएए के विरोध को हवा दी और इसके खिलाफ यह अफवाह फैलाया कि यह कानून मुसलमानों के खिलाफ है. तथ्यों को नजरंदाज करते हुए इन दलीलों को आगे बढ़ाया गया.

भारतीय मुसलमान काफी आगे बढ़े हैं
भारतीय मुसलमानों के पास इसको लेकर किसी शिकायत का कोई कारण नहीं है. इससे मुसलमानों के किसी अन्य रास्ते से भारतीय नागरिकता लेने पर पाबंदी नहीं लगती है. पिछले पांच सालों में लगभग 600 मुसलमानों को भारतीय नागरिकता दी गई है. इस तरह का संदेह रखने वाले मुसलमानों को कभी भी स्वतंत्र भारत में उत्पीड़ित नहीं किया गया है. उलटे इन्हें इस्लामिक देशों के उन उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों के प्रति हमदर्दी होनी चाहिए. इन अल्पसंख्यकों के साथ जो हुआ उसके उलट, भारतीय मुसलमान काफी आगे बढ़े हैं. उनकी जनसंख्या जो 1951 में 9.8 प्रतिशत थी, जो बढ़कर 2011 में 14.3 प्रतिशत हो गई.

कुछ लोग दलील देते हैं कि यह अधिनियम मुसलमानों से भेदभाव करता है, कैसे? कोई यह नहीं कह सकता कि इस्लामिक देशों में मुसलमानों को धर्म के आधार पर सताया जाता है. कोई यह तर्क दे सकता है कि अन्य अल्पसंख्यकों की ही तरह मुसलमानों को भी नागरिकता देने का प्रावधान क्यों नहीं किया गया है. उस स्थिति में यह भी कहा जाएगा कि पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए सभी मुसलमानों को नागरिकता दी जाए? पर ऐसा करना संभव नहीं है. इसका मतलब होगा पाकिस्तान और बांग्लादेश से आनेवाले नागरिकों को बिना किसी वास्तविक कारण के नागरिकता देना.

भारतीय मुसलमानों को यह समझना चाहिए कि...
जिन लोगों ने बंटवारे के समय पाकिस्तान के साथ अपने भाग्य को जोड़ लिया उन्हें पाकिस्तान और बांग्लादेश को आर्थिक और राजनीतिक रूप से एक बेहतर देश बनाने के लिए संघर्ष करना चाहिए. उन्हें अपने-अपने देशों में सच्चे अर्थों में एक उदार लोकतंत्र के लिए लड़ाई लड़नी चाहिए न कि इस्लामिक राज्य पर उनका भला करने का भरोसा करना चाहिए. भारतीय मुसलमानों को यह समझना चाहिए कि वे एक विशेष श्रेणी के हैं और उन्हें दुनिया में भारतीय होने की वजह से इज्जत मिलती है. अपनी स्थिति सुधारने के बजाय कट्टरपंथी बनने और दुनिया भर के मुसलमानों के सुर में सुर मिलाने की कोशिश करने से उनकी छवि खराब होगी.

CAA न तो हिंदू-समर्थक है और न ही मुसलमान विरोधी
सीएए न तो हिंदू-समर्थक है और न ही मुसलमान विरोधी क्योंकि यह अन्य उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों की भी बात करता है. यह श्रीलंका, म्यांमार, नेपाल और दुनिया के अन्य हिस्सों के हिंदुओं की बात नहीं करता. इसकी वास्तविकता को समझने के लिए बंटवारे की ऐतिहासिकता को भुलाया नहीं जा सकता.

नागरिकता दिए जाने के दो उदाहरण हैं- युगांडा के हिंदुओं को और श्रीलंका के तमिलों को. अगस्त 1972 में युगांडा के नेता इदी अमीन ने दक्षिण भारतीय अल्पसंख्यकों को निष्कासित किए जाने का आदेश दिया था. हालांकि, इदी अमीन ने कहा था कि ऐसा देशी युगांडाई लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया था क्योंकि धनी अल्पसंख्यक इनका शोषण कर रहे थे. पर उसके निकट समर्थकों का कहना था कि उसको सपने में अल्लाह ने उन्हें देश से निकाल देने और ब्रिटिश से बदला लेने को कहा क्योंकि उसने तंजानिया पर हमले में उसका साथ नहीं दिया था. वहां के हिंदू अल्पसंख्यकों में अधिकांश गुजराती थे और इन पर काफी अत्याचार हुआ- शारीरिक और यौन हिंसा से इन्हें गुजरना पड़ा. जो भारत आए उन्हें इस्लामिक राज्य में अल्पसंख्यक होने के नाते उत्पीड़ित होने के कारण भारत की नागरिकता दी गई.

तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और श्रीलंकाई प्रधानमंत्री सिरिमाओ भंडारनायके के बीच 1964 में श्रीलंका के तमिल लोगों को नागरिकता दिए जाने को लेकर एक समझौता हुआ. इस समझौते के अनुसार श्रीलंका को 3 लाख तमिलों को नागरिकता देनी थी और 5.25 लाख तमिलों के भाग्य के बारे में विचार बाद में होना था. इसका आधार यह था कि तमिल भारतीय मूल के थे और श्रीलंका में उनको बसाए जाने से वहां की सिंहली जनता नाराज थी.

यह स्पष्ट कर दिया गया है कि सीएए अलग है...
अब हम चर्चा करेंगे उस डर की जिसकी चर्चा कुछ मुसलमान नेता करते हैं. जब एनआरसी लागू किया जाएगा तो सीएए का प्रयोग हिंदुओं को नागरिकता देने के लिए किया जाएगा और जो मुसलमान अपनी नागरिकता नहीं सिद्ध कर पाएंगे उन्हें देश से निकाल दिया जाएगा. यह स्पष्ट कर दिया गया है कि सीएए अलग है और इसका प्रयोग एनआरसी में किसी को बचाने के लिए नहीं होगा जिसका अभी तक कोई आता-पता नहीं है. कोई सरकार अपने ऐसे नागरिकों की नागरिकता लेने का कदम नहीं उठा सकती जिन्होंने इस देश के साथ अपने भाग्य को जोड़ा. अगर किसी के पास दस्तावेज नहीं होता है तो इस समस्या से भी निपटा जाएगा.

पर इसके आधार पर घुसपैठिए को देश में रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती. ऐसे लोग हमारे संसाधनों पर बोझ हैं और कई अर्थों में सुरक्षा के लिए खतरा भी. कोई भी देश तब तक आगे नहीं बढ़ सकता जब तक उसको यह पता नहीं हो कि उसके यहां कौन रह रहा है. यह दोहराने की जरूरत नहीं है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों जगह नागरिकता कार्ड है. जो अफवाह फैला रहे हैं वे या तो साजिश कर रहे हैं या फिर भारत को अस्थिर करने के बड़े शाजिश में शामिल हैं. हम अमेरिका में इमिग्रेशन में लाइन में खड़ा रह सकते हैं और अमेरिका में दाखिल होने के लिए कपड़ा उतारने के लिए तैयार हैं पर हर भारतीय को मजबूत बनाने के लिए कृतसंकल्प भारत सरकार से सहयोग नहीं करेंगे.

(सुदेश वर्मा बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और मीडिया रिलेशंस के इंचार्ज हैं. वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “नरेंद्र मोदी: द गेम चेंजर” के लिए चर्चित हैं)

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