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दिल्ली विधानसभा चुनाव: 32% से कभी कम नहीं हुआ BJP का वोट शेयर, लेकिन इतने से नहीं मिलती सत्ता!

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: January 10, 2020, 6:20 PM IST
दिल्ली विधानसभा चुनाव: 32% से कभी कम नहीं हुआ BJP का वोट शेयर, लेकिन इतने से नहीं मिलती सत्ता!
क्या दिल्ली बीजेपी का सियासी वनवास खत्म करवा पाएंगे मोदी-शाह?

बाबरी विध्वंस की घटना के बाद दिल्ली में हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करने में बीजेपी रही थी कामयाब, 1993 से 1998 तक रहा शासन, पार्टी ने बदले थे तीन सीएम

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  • Last Updated: January 10, 2020, 6:20 PM IST
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नई दिल्ली. दिल्ली में सत्ता कांग्रेस (Congress) की रही हो या आम आदमी पार्टी (AAP) की यहां पर बीजेपी (BJP) के वोटबैंक में ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं हुआ है. पिछले सात विधानसभा चुनावों में इसका वोट 32 फीसदी से नीचे नहीं गिरा है. यहां तक कि जब 'आप' ने 70 में से 67 सीटें जीत ली थीं तब भी भाजपा का वोटबैंक उसके साथ खड़ा रहा. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इसकी कुछ वजहें भी हैं. लेकिन पार्टी सिर्फ अपने कोर वोटरों के भरोसे सत्ता तक नहीं पहुंच पाती. इसलिए इस बार भी अगर वो कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के वोटबैंक में सेंध नहीं लगा पाएगी तो उसके लिए 'दिल्ली दूर' ही रह जाएगी.

सिर्फ एक बार मिली बीजेपी को सत्ता

>>दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी का अपना वोट भले ही न टूटा हो, लेकिन उसे सत्ता का स्वाद सिर्फ एक बार मिला है. 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद बीजेपी ने हिंदूवाद की लहर पर सवार होकर 1993 में रिकॉर्ड 49 सीटों पर विजय हासिल की. एक भी सीट पर उसके प्रत्याशी की जमानत नहीं जब्त हुई. तब उसे अब तक का सबसे ज्यादा 42.82 फीसदी वोट हासिल हुए थे.

>>इसी कार्यकाल में मदनलाल खुराना (2 साल, 86 दिन), साहिब सिंह वर्मा (2 साल, 228 दिन) और सुषमा स्वराज (52 दिन) को थोड़े-थोड़े समय के लिए मुख्यमंत्री बनाया गया.

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दिल्ली में ये है बीजेपी की सियासी ताकत


दिल्ली चुनाव: अब बदल गए हैं खेल के नियम

>>वरिष्ठ पत्रकार आलोक भदौरिया कहते हैं कि बीजेपी एक कैडर बेस पार्टी है. उसकी सोशल इंजीनियरिंग से उसका अपना कोर वोटबैंक कायम है. क्योंकि उसके साथ आरएसएस और उससे जुड़े कई संगठन हैं. उत्तर भारत इसका बेस रहा है उसमें भी दिल्ली में उसका ज्यादा आधार रहा है.>>हालांकि अब खेल के नियम बदल गए हैं. कहीं युवा सड़क पर है तो कहीं सत्ताधारी पार्टी उससे उसका काम पूछ रही है. अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पहले से घिरी हुई है. इसलिए वो दिल्ली में बीजेपी अपना कोर वोटबैंक बचाने की लड़ाई लड़ रही है और सिर्फ उसके कोर वोटर उसे कभी सत्ता तक नहीं पहुंचा पाते. इस बार उसके पास दिल्ली में कोई चेहरा भी नहीं है.

दिल्ली में क्यों मजबूत है बीजेपी 

>>राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं कि भारतीय जन संघ (BJS) 1951 से ही दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ता रहा है. उसकी सीटें भी आती रहीं हैं. इसलिए उसका आधार मजबूत रहा है. 1983 से 2008 तक दिल्ली में बीजेपी और कांग्रेस दो प्रमुख पार्टियां रही हैं.

2013 का चुनाव और तीसरी ताकत

>>किदवई कहते हैं कि यहां तीसरी ताकत की एंट्री 2013 में हुई. जब 2012 के अन्ना आंदोलन के बाद यहां आम आदमी पार्टी (आप) का उदय हुआ और अरविंद केजरीवाल सीएम बने. 'आप' की तरफ कांग्रेस का वोटबैंक शिफ्ट हो गया. यह ट्रेंड 2015 में और मजबूत हो गया.

'आप' ने कांग्रेस ही नहीं बीजेपी के वोटबैंक में लगाई सेंध

>>ऐसा नहीं है कि उसने बीजेपी के वोटबैंक में सेंध नहीं लगाई. 1980 में बीजेपी की स्थापना के बाद दिल्ली चुनाव में वोट प्रतिशत और सीट के लिहाज से उसका सबसे खराब प्रदर्शन 2015 में ही रहा है. जाहिर है कि कहीं न कहीं केजरीवाल ने उन हिंदू वोटरों में भी सेंध लगा ली है जो बीजेपी का पारंपरिक वोटर हुआ करता था.

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क्या दिल्ली में मोदी और शाह के नाम पर चुनाव लड़ेगी बीजेपी (फाइल फोटो)


>>किदवई कहते हैं कि इस बार भी तमाम वीडियो ऐसी आ रही हैं जिसमें लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी को वोट देने वाले कह रहे हैं कि वो विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल को वोट देने का विचार कर रहे हैं. केजरीवाल बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य की बात कर रहे हैं. आप एनआरसी, सीएए जैसे मुद्दे ला रहे हैं. केजरीवाल को बीजेपी 370 पर नहीं घेर सकती क्योंकि वो इसे हटाने का सबसे पहले समर्थन करने वालों में शामिल हैं. इन सबके बावजूद कोई भी पार्टी बीजेपी को कम आंकने की गलती न करे.

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First published: January 10, 2020, 4:36 PM IST
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