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घरों की छत पर जुटती है आसमान में होने वाली अनोखी रेस को देखने के लिए हजारों की भीड़
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Updated: January 1, 2020, 5:00 PM IST
घरों की छत पर जुटती है आसमान में होने वाली अनोखी रेस को देखने के लिए हजारों की भीड़
दिल्ली की एक छत से उड़ते हुए कबूतर.

रेस आसमान (Sky) में हो रही होती है और प्रशंसक (Supporter) ज़मीन और छतों पर से चिल्ला-चिल्लाकर हौंसला अफजाई करते हैं. खिलाड़ी (players) भी आसमान का सीना चीरते हुए कई-कई किमी दूर तक जा रहे हैं.

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  • Last Updated: January 1, 2020, 5:00 PM IST
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नई दिल्ली. दिसम्बर (December) में यह अनोखी रेस देश ही नहीं पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान (Pakistan) में भी शुरू हो गई है. सर्दियों का मौसम इसलिए चुना जाता है कि रेस (Race) में हिस्सा लेने वालों को मौसम के चलते किसी तरह की कोई परेशानी न हो. रेस आसमान (Sky) में हो रही होती है और प्रशंसक ज़मीन और छतों के ऊपर से चिल्ला-चिल्लाकर हौंसला अफजाई करते हैं. खिलाड़ी भी आसमान का सीना चीरते हुए कई-कई किमी दूर तक जाते हैं. एक ग्रुप में 100 से 150 तक खिलाड़ी मतलब कबूतर (Pigeon) होते हैं. जिसके कबूतर रेस जीतते हैं, उसे इनाम से भी नवाज़ा जाता है. जानकारों की मानें तो इस वक्त देश के करीब एक दर्जन शहरों में कबूतरों की रेस का आयोजन किया जा रहा है.

देश में यहां हो रही है कबूतरों की रेस

कबूतरबाजी के उस्ताद दिनेश चौधरी बताते हैं, “कबूतरबाजी और कबूतरों की रेस का शौक आगरा और दिल्ली में बहुत है. हालांकि देश के एक दर्जन से अधिक शहरों में यह शौक पूरा किया जा रहा है. आज पुरानी दिल्ली की हर तीसरी छत से कबूतरबाजी होती है. एक छत पर कम से कम 100 से 150 कबूतर होते हैं. पंजाब के पानीपत, मलेरकोटला सहित दूसरे शहर हैदराबाद, अजमेर, लखनऊ, कानपुर, वाराणसी और दूसरे शहरों में भी कबूतरबाजी हो रही है. यहां तक की चेन्नई में भी कबूतरबाजी का शौक पहुंच गया है. यहां भी कबूतरों की रेस का आयोजन किया जाता है.”

कितने महंगे तक होते हैं कबूतर



350 कबूतरबाजों के खलीफा दिल्ली निवासी मुहम्मद शफीक बताते हैं, “कुछ नस्ल जैसे पटेते, मुल्तानी, लाल बंद घाघरा, हवा वेलिया, काली खाल, निसाबरे, मद्रासी का 5 से 10 हजार रुपये में एक जोड़ा मिल जाता है. लेकिन मुल्तानी कबूतर पाकिस्तान की नस्ल है.



ये बहुत ही कम मिलती है. लेकिन जब मिलती है तो 40 और 60 हजार रुपये की रकम भी छोटी पड़ जाती है. इसकी आंखे अनार के दाने जैसी चमकदार लाल होती हैं. रेसर के रूप में पहचान रखने वाली हूमर नस्ल का एक जोड़ा मिल जाए तो 50 हजार रुपये में नहीं तो शौकीन लोग एक-एक लाख रुपये खर्च करने को भी तैयार रहते हैं. देश में ये देखने को भी कम ही मिलती है. ये नस्ल विदेशों में भी पसंद की जाती है.”

निसाबरे और हूमर कबूतर रेस में होते हैं इस्तेमाल

आगरा के कबूतरबाज दानिश बताते हैं कि हूमर नस्ल देश ही नहीं विदेशों में भी कबूतरों की रेस में इस्तेमाल की जाती हैं. इस नस्ल के कबूतर अब बहुत ही कम बचे हैं. वहीं निसाबरे अपने देश में भी खूब पाए जाते हैं और कबूतरों की दौड़ प्रतियोगिता में इनका खूब इस्तेमाल किया जाता है.

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First published: January 1, 2020, 4:16 PM IST
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स्रोत: जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी, U.S. (www.jhu.edu)
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