Rajasthan Crisis: 'राज्यपाल रबर स्टांप नहीं, संवैधानिक सलाह लेने का पूरा हक'
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Rajasthan Crisis: 'राज्यपाल रबर स्टांप नहीं, संवैधानिक सलाह लेने का पूरा हक'
राजस्थान के सियासी संकट में राज्यपाल की एंट्री हो चुकी है.

राजनीतिक पत्रकार राम नारायण श्रीवास्तव का मानना है कि राजस्थान में संवैधानिक नहीं बल्कि राजनीतिक संकट है. अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) अपनी पार्टी की आंतरिक कलह को बीजेपी (BJP), राज्यपाल और केंद्र सरकार पर मढ़ देना चाहते हैं.

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दिल्ली. राजस्थान (Rajasthan) में चल रहे कांग्रेस पार्टी के अंदरूनी कलह में राज्यपाल (Governor) की भी एंट्री हो चुकी है. कांग्रेस राज्यपाल पर जल्द से जल्द विधानसभा का सत्र बुलाने का दबाव बना रही है. वहीं राज्यपाल इसको लेकर कानूनी सलाह ले रहे हैं. इस देरी के कारण कांग्रेस राज्यपाल की भूमिका पर सवाल भी खड़ी कर रही है लेकिन इस लड़ाई में संवैधानिक जानकार राज्यपाल के पक्ष में दिख रहे हैं. दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव और संवैधानिक विशेषज्ञ उमेश सहगल का  कहना है कि राज्यपाल रबर स्टांप नहीं होता और उसके पास किसी भी मसले पर स्पष्टीकरण मांगने और संवैधानिक सलाह लेने का हक है. वे कहते हैं कि राज्यपाल विधानसभा का सत्र बुलाने का कारण जान सकता है और इसके मंजूरी के लिए एक आवश्यक समय भी ले सकता हैं.

उमेश सहगल का कहना है कि महामारी के समय में राज्यपाल यह भी पूछ सकते हैं कि किस तरह से सोशल डिस्टेंसिंग सहित अन्य नियमों का पालन किया जा रहा है. वहीं वरिष्ठ वकील डीके गर्ग का कहना है की राजस्थान मामले में राज्यपाल कलराज मिश्र का कदम एकदम सही है. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत विधानसभा का सत्र बुलाना चाहते हैं लेकिन अभी लगभग 20 विधायकों के सदस्यता का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में है और इसके लिए 4 अगस्त की तारीख दी गई है. ऐसे में अगर वे कोई फैसला करते हैं तो यह सुप्रीम कोर्ट के काम में दखल भी माना जा सकता है. गर्ग का मानना है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत चाहते हैं कि वह एक बार विधानसभा में अपना बहुमत दिखा दे ताकि उन्हें भविष्य में कुछ दिनों के लिए राहत मिल जाए.
संविधानिक जानकारों की राय राज्यपाल कलराज मिश्र के पक्ष में

राजनीतिक पत्रकार राम नारायण श्रीवास्तव का मानना है कि राजस्थान में संवैधानिक नहीं बल्कि राजनीतिक संकट है. अशोक गहलोत अपनी पार्टी की आंतरिक कलह को बीजेपी, राज्यपाल और केंद्र सरकार पर मढ़ देना चाहते हैं. वे मानते हैं कि इसलिए राज्यपाल पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है. स्थिति सामान्य नहीं होने और कुछ मामले कोर्ट में होने के कारण राज्यपाल पूरे मसले पर सोच विचार के लिए समय ले सकता हैं.
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क्या है राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति
राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता हैं और वह मंत्री परिषद की सलाह पर काम करता हैं. लेकिन संविधान राज्यपाल को प्रभाव और शक्तियां दोनों देता है.अनुच्छेद 166(2) के अनुसार यदि कोई प्रश्न उठता है कि राज्यपाल की शक्ति विवेकाधीन है या नहीं तो उसी का निर्णय अंतिम माना जाता है. अनुच्छेद 166(3) के अनुसार राज्यपाल इन शक्तियों का प्रयोग उन नियमों के निर्माण के लिए कर सकता हैं जिनसे राज्यकार्यों का सुगमता पूर्वक संचालन हो सके. साथ ही वह मंत्रियों के कार्य विभाजन भी कर सकता है. अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राज्यपाल अपनी विवेक शक्ति का प्रयोग कर राज्य विधायिका द्वारा पारित बिल को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रख सकते हैं.अनुच्छेद 356 के अधीन राज्यपाल राष्ट्रपति को राज्य के प्रशासन को अधिग्रहित करने के लिए निमंत्रण दे सकता है यदि यह संविधान के प्रावधानों के अनुरूप नहीं चल सकता है. दरअसल, राज्यपाल की विशेष विवेकाधीन शक्ति काफी अहम है जिसके अंतर्गत राज्यपाल मंत्रिपरिषद से सलाह तो ले सकता है लेकिन इसे मानने के लिए वह बाध्य नहीं है और ना ही उसे सलाह लेने की जरूरत.
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