कोरोना महामारी के बाद ये होगी बड़ी चुनौती, सेनिटाइजेशन सेस लगा सकती है सरकार!
Delhi-Ncr News in Hindi

कोरोना महामारी के बाद ये होगी बड़ी चुनौती, सेनिटाइजेशन सेस लगा सकती है सरकार!
भारत में कोराना के बाद भी स्‍वास्‍थ्‍य क्षेत्र में सरकारों के लिए कई चुनौतियां हैं.

ऑल इंडिया इंस्‍टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के पूर्व महानिदेशक एमसी मिश्र कहते हैं कि अभी महामारी है तो स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की मांग ज्‍यादा है और सप्‍लाई कम है. इसके बावजूद हमारे सभी राज्‍यों में स्‍वास्‍थ्‍य का ढांचा बहुत कमजोर है.

  • Share this:
नई दिल्‍ली. कोरोना महामारी ने जहां भारत के सरकारी स्‍वास्‍थ्‍य ढांचे में एक क्रांति ला दी है वहीं बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं को लेकर एक चुनौती भी पेश कर दी है. आने वाले समय में इस महामारी का व्‍यापक असर भी देखने को मिलेगा. वैक्‍सीन आने के बाद कोरोना पर नियंत्रण एक अलग सवाल है लेकिन इसके बाद देश के चिकित्‍सा क्षेत्र के सामने कई बड़ी चुनौतियां मुंह खोले खड़ी हो गई हैं.

स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों की मानें तो कोरोना से उबरने के बाद भारत में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं, अस्पतालों, सुविधाओं और व्यवस्थाओं में एक बड़े बदलाव की जरूरत होगी. जिसके अभाव में पहले से ही कमजोर पूरा स्‍वास्‍थ्‍य ढांचा चरमरा जाएगा.

ऑल इंडिया इंस्‍टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के पूर्व महानिदेशक एमसी मिश्र कहते हैं कि अभी महामारी है तो स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की मांग ज्‍यादा है और सप्‍लाई कम है. इसके बावजूद हमारे सभी राज्‍यों में स्‍वास्‍थ्‍य का ढांचा बहुत कमजोर है. इसे मजबूत करने के लिए सरकारों को स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में काम करना होगा क्‍योंकि अभी तक स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं में न राज्‍य सरकारों ने ही और न ही केंद सरकार ने पैसा लगाया है. दशकों से बजट का डेढ़ फीसदी ही स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में दिया जा रहा है. इसको बढ़ाना पड़ेगा. डॉक्‍टर, पैरामेडिकल स्‍टाफ, नर्सेज, लैब, मशीनें उपकरण आदि को बढ़ाना होगा. हमारे पास जो भी साधन मौजूद हैं, उन्‍हें सही तरीके से चैनलाइज करना होगा.



कोराना महामारी से सबक लेकर चिकित्‍सा ढांचा बेहतर करने की चुनौती
मिश्र कहते हैं कि 400 अस्‍पताल और मेडिकल कॉलेज हैं जिनमें आधे प्राइवेट और आधे सरकारी हैं. ये अक्‍सर अंडर यूटिलाइज्‍ड रहते हैं. अब महामारी में तो इन्‍हें फिर भी इस्‍तेमाल कर रहे हैं. एक कॉलेज या अस्‍पताल में कम से कम हजार बैड होते हैं. इनमें 40 से50 फीसदी ही बेड ऑक्‍यूपेंसी रहती है जबकि स्‍कैन मशीन, एमआरआई जैसी सभी सुविधाएं उनके पास होती हैं. लेकिन वहां पेमेंट होती है तो पूरा इस्‍तेमाल नहीं हो पाता. केरल, कर्नाटक, राजस्थान, मुंबई आदि जगहों पर राज्‍य सरकारें कुछ स्‍कीम के तहत इन्‍हें इस्‍तेमाल कर रही हैं लेकिन इसे हर राज्‍य को करने की जरूरत है. सरकार निजी रूप से उपलब्‍ध संसाधनों का उपयोग करने की स्‍कीमें लेकर आए.

स्‍वास्‍थ्‍य को बनाएं मुद्दा, सरकारों से मांगे बेहतर चिकित्‍सा और सेवाएं

जीडीपी का 18 फीसदी अमेरिकी सरकार स्‍वास्‍थ्‍य पर खर्च करती है. यूरोपियन देशों में 10-12 फीसदी खर्च होता है. लैटिन अ‍मेरिकी और यहां तक कि बांग्‍लादेश भी स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं पर जीडीपी का ज्‍यादा हिस्‍सा खर्च करते हैं. भारत में न तो सरकारें ही चिकित्‍सा सेवाओं पर खर्च करना चाहती हैं और न ही लोग स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं पर खर्च के लिए तैयार हैं. यहां पर लोग स्‍वास्‍थ्‍य को मुद्दा नहीं बनाते. ये भी तय है कि कोरोना को लेकर जितना सरकारें सक्रिय हैं और सरकारी अस्‍पतालों में दिन रात काम हो रहा है , वहीं अगर कोरोना नियंत्रण के बाद लोग बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की मांग नहीं करेंगे तो सरकारें इस महामारी के बाद भी चिकित्‍सा क्षेत्र को भूल जाएंगी. लोगों को चुनावों में स्‍वास्‍थ्‍य को मुद्दा बनाना होगा. उन्‍हें अपनी भी जिम्‍मेदारी भी निभानी होगी. अच्‍छी स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं मांगनी होंगी. हालांकि केंद्र की तरफ से प्रधानमंत्री स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा योजना में मशीनों का अपग्रेडेशन हुआ है लेकिन उनकी मॉनिटरिंग भी करनी चाहिए.

स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं के साथ सरकारी अस्‍पतालों में भीड़ नियंत्रण बड़ा चैलेंज  

Corona, Coronavirus, Ministry of Health, Maharashtra, Gujarat, Delhi
अस्‍पतालों में लगने वाली भीड़ सबसे बड़ी चुनौती होगी.


वरिष्‍ठ स्‍वास्‍थ्‍य पत्रकार निशि भाट कहती हैं कोरोना के बाद निश्चित ही बड़े बदलाव होने जरूरी हैं. इस संक्रामक रोग से उबर भले ही जाएं लेकिन इसकी संभावनाओं को कभी खत्‍म नहीं किया जा सकता. वहीं भारत में सुपरबग है, यहां अस्‍पतालों में भी इन्‍फैक्‍शन है. लोग अस्‍पतालों से भी बीमारी लेकर आते हैं. ऐसे में पहले से इतनी समस्‍याओं के बीच कोरोना के संक्रमण से बचाव करते हुए सरकारी अस्‍पतालों में भीड़ नियंत्रण एक बड़ी चुनौती होगी. अभी तक सरकारी अस्‍पतालों में एक ही बेड पर तीन-चार लोगों को एक साथ भर्ती कर लिया जाता था लेकिन कोरोना के बाद पैदा होने वाले हालातों में पुराने ढर्रे पर भीड़ को इलाज दे पाना संभव नहीं होगा. गांव से लेकर शहर तक सरकारी अस्‍पतालों पर बहुत ध्‍यान देना होगा.

निजी अस्‍पताल मनी मेकिंग पॉलिसी के बजाय सरकार के साथ मिलकर करें काम

वहीं निजी अस्‍पतालों पर निशि कहती हैं कि इन अस्‍पतालों में अभी भी सेनिटाइजेशन से लेकर डिस्‍टेंसिंग, सुविधाओं का स्‍तर अच्‍छा है लेकिन कोई भी व्‍यक्ति 25 लाख रुपये लेकर इन अस्‍पतालों में इलाज लेने नहीं चला जाएगा. इन्‍हें भी सिर्फ मनीमेकिंग को छोड़कर सरकारों के साथ अपने संसाधनों का इस्‍तेमाल करते हुए स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं देने के लिए आगे आना होगा. कोरोना के बाद निजी अस्‍पतालों की भी जिम्‍मेदारी बढ़ेगी.

स्‍वास्‍थ्‍य बजट बढ़ाने के अलावा सेनिटाइजेशन सेस लगाने पर हो सकता है विचार

जहां तक बजट की बात है तो केंद्र सरकार को इसमें सालाना बजट बढ़ाने के साथ ही राज्‍य सरकारों को विशेष रूप से इसे प्राथमिक जिम्‍मेदारी में शामिल करना होगा. स्‍वास्‍थ्‍य राज्‍यों का विषय है ऐसे में बजट के अनुरूप व्‍यवस्‍थाओं पर फोकस करना होगा. संभावना जताई जा रही है कि कोरोना के बाद सेनिटाइजेशन पर बड़ा काम होगा. अस्‍पतालों के सेनिटाइजेशन पर बड़ा खर्च भी आएगा. साथ ही कोरोना को देखते हुए सरकारी अस्‍पतालों के इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर में भी बदलाव करना होगा. लिहाजा संभावना जताई जा रही है कि सरकार सेनिटाइजेशन सेस लगाने जैसे विकल्‍पों पर भी विचार कर सकती है.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज

corona virus btn
corona virus btn
Loading