GNCTD बिल पर बवाल: राज्यसभा में एनडीए का पलड़ा भारी, अब क्या करेगी दिल्ली सरकार?

 राशन की डोर स्टेप डिलीवरी योजना को लेकर दिल्ली कैबिनेट का बड़ा फैसला. (File)

राशन की डोर स्टेप डिलीवरी योजना को लेकर दिल्ली कैबिनेट का बड़ा फैसला. (File)

दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार और केंद्र सरकार अब जीएनसीटीडी (GNCTD) बिल को लेकर आमने सामने हैं. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र संशोधन विधेयक बीते सोमवार को लोकसभा में पेश होने के बाद से ही दोनों सरकारों के बीच टकराव की स्थिति बन रही है.

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  • Last Updated: March 24, 2021, 12:35 PM IST
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नई दिल्ली. दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार और केंद्र सरकार अब जीएनसीटीडी बिल को लेकर आमने सामने हैं. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र संशोधन विधेयक (जीएनसीटीडी) बीते सोमवार को लोकसभा में पेश होने के बाद से ही दोनों सरकारों के बीच टकराव की स्थिति बन रही है. फिलहाल राज्यसभा में संख्या बल के आधार पर जो स्थिति बन रही है, उसमें एनडीए यानी केन्द्र सरकार का पड़ला भारी दिख रहा है. अब तक बिल के पक्ष में-115 सदस्य हैं. इनमें से बीजेपी-95, जेडीयू-5, वाईएसआर कांग्रेस-6, एआईएडीएमके-8, असम गण परिषद-1 शामिल हैं.

मामले में केजरीवाल सरकार की ओर से बीते मंगलवार को कहा गया कि सोमवार को भी हमने विरोध किया था. सड़क से संसद तक हम लोग इसका विरोध कर रहे हैं. केन्द्र सरकार कह रही है कि एलजी मतलब सरकार. फिर सरकार का क्या मतलब है. चुनाव का क्या मतलब है. आप तो संविधान का ही गला घोट रहे हैं. राज्यसभा में नोटिस दिया गया कि ये बिल गैर संवैधानिक है. इसको रोका जाए, ये बिल पेश ही नहीं हो सकता. ये बिल लाया क्यों गया. दिल्ली में केजरीवाल सरकार काम कर रही है. आप 23 साल से चुनाव हार रहे हैं, जो सरकार 2 बार से 90 फीसद सीटें जीतकर आ रही हैं, आप उसको खत्म कर रहे हैं. संविधान, लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं. सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि लॉ एंड ऑर्डर, जमीन छोड़कर सारे अधिकार दिल्ली सरकार के साथ है.

एलजी को मजबूत करने वाला बिल

विधेयक में उपराज्यपाल की भूमिका को मजबूत करने की बात कही गई है और दिल्ली सरकार को कोई भी फैसला लेने से पहले उपराज्यपाल की मंजूरी लेनी होगी. जाहिर है कि संसद से पास होने और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद ये विधेयक कानून की शक्ल ले लेगा और दिल्ली के शासन-प्रशासन में उपराज्यपाल की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाएगी. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार आने के बाद से कई बार अधिकारों की जंग छिड़ चुकी है, जबकि 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बैंच और 2019 में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बैंच का फैसला आने के बाद लगा था कि ये मसला अब सुलझ गया है.
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