दिल्ली हिंसा के बाद शाहीन बाग: किसी अनिष्ट की आशंका, जज्बा फिर भी बरकरार
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दिल्ली हिंसा के बाद शाहीन बाग: किसी अनिष्ट की आशंका, जज्बा फिर भी बरकरार
गली के बाहर बैठा एक बुजुर्ग (Photo: Afsar Ahmad)

दिल्ली के शाहीन बाग (Shaheen Bagh) इलाके में सीएए (CAA) को लेकर विरोध जारी है, हालांकि वहां की गलियों में लोग आम दिनों की तरह जिंदगी गुजार रहे हैं.

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नई दिल्ली. ये जानने की लालसा सबमें है कि महिलाओं (Women Protest) द्वारा किया गया इतिहास का सबसे लंबा शाहीन बाग आंदोलन (Shaheen Bagh Movement) दिल्ली हिंसा के बाद क्या बंद हो जाएगा या फिर यूं ही चलता रहेगा बिना रुके, बिना झुके, बिना दबाव में आए. मैं खुद इस सवाल के जवाब की तलाश में कल फिर शाहीन बाग इलाके में पहुंचा. मुख्य धरना (Dharna) स्थल पर जाने से पहले मैं यह जानना चाहता था कि क्या शाहीन बाग की गलियां शांत हैं, क्या वहां आम जिंदगी पर कोई असर पड़ा है. यह जानने के लिए मैं मेट्रो से शाहीन बाग धरना स्थल की ओर खुलने वाली गलियों की ओर बढ़ चला. नहर से लगी सड़क जो सीधे शाहीन बाग धरना स्थल वाली रोड पर खुलती है पर मुझे जिंदगी आम दिनों के मुताबिक लगी. दुकानें खुली थीं, लोग सड़कों पर आ जा रहे थे और कुछ बुजुर्ग गलियां के कोने में बैठे नजर आ रहे थे.

फोटो खींचने पर आपत्ति

ऐसा लगा कि सबकुछ सामान्य है. मैं एक गली के अंदर मुड़ गया जहां मैंने एक फूड कॉर्नर का फोटो लेना चाहा. मैंने जैसे ही उसका फोटो लिया वहां तुरंत आवाजें आने लगीं, मुझे उन्होंने इशारा कर बुलाया. उनके तेवरों में तल्खी थी. मैंने जवाब दिया मैं मीडिया से हूं, कुछ बातचीत और पहचान देखने के बाद वे आश्वस्त हुए. उनकी शिकायत थी कि कई बार मीडिया के लोग यहां आते हैं और उल्टी तस्वीर पेश करते हैं.



माइक पर रोक
बहरहाल में वहां से बढ़ा और सीधे धरनास्थल के पास पहुंचा. देखता हूं कि मुख्य पंडाल में महिलाएं बैठी हुई थीं कई लोग आ और जा रहे थे और माइक के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई थी.

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शाहीन बाग में धरने में बैठी महिलाएं (Photo: Afsar Ahmad)


माहौल में पसरी बेचैनी

वहां घूमने के दौरान लोगों में एक अजीब सी असहजता नजर आ रही थी. मुख्य धरना स्थल के पीछे तैनात मैंने एक वालंटियर से पूछा तो उसने पहले तो बात करने से इंकार कर दिया फिर कहा कि ऐसा कुछ नहीं है. मैंने पूछा कि आज कुछ संगठनों ने यहां आकर विरोध का ऐलान किया था. इस पर उसका कहना था कि वो यहां आएं उनका स्वागत है, हम उन्हें पानी पिलाएंगे और मिठाई खिलाएंगे.

भारी पुलिस सुरक्षा

हालांकि धरनास्थल के ठीक पीछे 100-100 मीटर की दूरी पर बैरीकेड लगे हुए थे और पुलिस पुरी तरह मुस्तैद नजर आई. इसके 100 मीटर दूर एक ओर बैरिकैड था जो रेड लाइट पर मौजूद था. वहां भी भारी सुरक्षा बल मौजूद था. लेकिन कुछ लोग लगातार उस उस ओर खड़े होकर निगरानी कर रहे थे.

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शाहीन बाग में तैनात पुलिसकर्मी (Photo: Afsar Ahmad)


मीडिया से नाराजगी

इसी बीच में तिरंगा सजाए एक शख्स की ओर मुड़ा जहां कई लोग उससे तिरंगा प्रदर्शन के लिए लेने आ रहे थे. मैंने जैसे ही उसका फोटो लिया उसने पूछा कि आप कौन हो और ये फोटो क्यों लेना चाहते हो, मैंने फिर अपना परिचय दिया और फिर उसका फोटो ले सका. हालांकि उसकी भी वही शिकायत थी कि मीडिया के कई लोग यहां आकर नेगेटिव स्टोरी जानबूझकर करते हैं.

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धरना स्थल पर तिरंगा लिए युवक (Photo: Afsar Ahmad)


ऐसा मेरे साथ एक नहीं कई बार हुआ. धरना स्थल पर मीडिया को लेकर एक अजीब तरह की नाराजगी भी दिखी. प्रदर्शनकारियों का कहना था कि मीडिया लगातार हमें प्रोपेगंडा कर निशाना बनाता है. मैं बता दूं कि इससे पहले जब में दिल्ली दंगों से पहले यहां आया था तो यहां इतना तनाव और मीडिया को लेकर इतनी आशंका नहीं थी. हालिया हालातों ने उन्हें काफी सशंकित किया है.

क्या बना हुआ है जोश

मैं जानने के लिए उत्सुक था कि क्या प्रदर्शनकारियों में वही जोश व जज्बा बरकरार है या फिर समय के साथ वो भी मंद हो गया. मैं यह देखकर कर थोड़ा अचरज में था कि बदलते माहौल में भी शाहीन बाग का जोश कम नहीं नजर आ रहा था.

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शाहीन बाग का एक दृश्य (Photo: Afsar Ahmad)


जारी है लंगर

धरनास्थल से कुछ आगे जाने पर मैंने देखा कि कुछ महिलाएं वहां मौजूद लोगों के खाने की व्यवस्था में जुटी थीं. इनमें कुछ बुर्के वाली महिलाएं भी मौजूद थी. लोगों के लिए लंगर अनवरत जारी था. कुछ ही दूरी पर एक ओर लंगर चल रहा था.

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लंगर तैयार करने में जुटी महिलाएं (Photo: Afsar Ahmad)


कहां से आता है पैसा

सबके मन में एक ही सवाल है कि इसके लिए पैसा कहां से आता है. मैंने भी उस इलाके में घूमकर इसका जवाब टटोलने की कोशिश की. दरअसल अलग-अलग मुहल्ले के लोग कुछ-कुछ पैसा जुटाकर उनका सामान खरीदकर यहां पहुंचा रहे हैं, जिससे यहां लंगर चल रहा है.

सफाई है समस्या पर वालंटियर हैं मुस्तैद

धरनास्थल पर हर रोज कई हजार लोगों के आने-जाने के कारण यहां यहां कूड़े कचरे की समस्या बनी हुई है जिससे निपटने के लिए यहां कुछ लड़के वालंटियर के तौर पर लगे नजर आए. मैंने उनमें से एक से पूछा कि धरनास्थल की सफाई कैसे रह पाती है तो काशिफ ने कहा कि लोग खुद ही यहां आकर श्रमदान करते हैं. कई फेसबुक से जुड़े लोग यहां आकर सफाई करते हैं. आने वालों में कोई छात्र, कोई काम करने वाला और कोई मौलाना भी हो सकता है. हम पूरी कोशिश करते हैं सफाई बनी रहे.

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धरनास्थल के पास सफाई करते कुछ वालंटियर्स (Photo: Afsar Ahmad)


विरोध प्रदर्शन तस्वीरों में

यहां एक नई चीज देखने को मिली. कालिंदी कुज की ओर बढ़ने पर तस्वीरों की एक प्रदर्शनी देखने को मिली. जिसका शीर्षक है...सबा याद रखा जाएगा... इसमें सीएए के विरोध प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली में खींचे गए कई चर्चित तस्वीरों को प्रदर्शनी में रखी गई है.

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शाहीन बाग में विरोध के तस्वीरों की पर्दशनी (Photo : Afsar Ahmad)


सड़क के दूसरी ओर मौजूद लाइब्रेरी

आंदोलन की शुरूआत में एक छोटी सी लाइब्रेरी यहां देखी जा सकती थी, जो न सिर्फ अपनी जगह बदल चुकी है बल्कि बड़ी भी हो चुकी है. यहां आते जाते लोगे और कुछ किताबों के शौकीन लोगों को भी देखा जा सकता है.

शाम ढलते ही बढ़ने लगी भीड़

शाम होते-होते यहां प्रदर्शन करने आने वाली महिलाओं की संख्या काफी बढ़ गई. महिलाएं शाहीन बाग सड़क की ओर खुलने वाली कई गलियों से आती हुई देखी जा सकती थीं. आने वाली महिलाओं में युवा और बुजुर्ग दोनों ही शामिल देखी जा सकती थीं.

कैसे चला ये आंदोलन इतना लंबा

ये सवाल सभी के मन में है कि शाहीन बाग आंदोलन इतना लंबा कैसे चला. इसकी स्वाभाविक वजह है कि माइनॉरिटी में सीएए को लेकर नाराजगी तो है ही साथ ही यह धरना स्थल माइनॉरिटी एरिया से सटा हुआ ही है जिसके कारण भारी संख्या में महिलाओं के लिए यहां पहुंचना संभव हो पाता है.

नजरें जहां रूक जाती हैं

यहां तिरंगा उठाए एक छह साल की एक नन्ही लड़की अस्बा फातिमा मिली जिसके दादा शरीफ रोज यहां उसे लेकर आते हैं. मैंने उनसे हालिया माहौल पर पूछा तो उनका कहना था कि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत की बड़ी जरूरत है.

हनुमान भक्त भी मौजूद

ऐसा ही एक नजारा दिखा जब पंजाब के मानसा से आए नछत्तर सिंह और क्रिश्चन एलेग्जेंडर वहां साथ-साथ घूमते दिखे. एलेग्जेंडर से हमने वहां आने की वजह पूछी तो उनका कहना था कि जब से आंदोलन शुरू हुआ तब से वे यहां पर हैं और जब तक सरकार सीएए वापस नहीं लेती यहीं रहेंगे. उन्होंने कहा कि वो आंदोलन से नहीं हटेंगे चाहे फिर जो हो. उन्होंने एक प्लेकार्ड टांग रखा था जिस पर लिखा था— हनुमान भक्त.

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धरनास्थल पर हनुमान भक्त भी शामिल हुए (Photo: Afsar Ahmad)


यहां के लोगों ने नहीं की हिंसा

वहीं पास में ही मुझे एक साहब बैठे हुए मिले. पूछने पर बताया कि वो वहीं रहते हैं और रोज यहां आते हैं. हालांकि तनाव की बात उन्होंने नकार दी. उन्होंने कहा कि इस अदालत के बाद ऊपर वाले की भी अदालत है हमें उस पर भरोसा है. दिल्ली हिंसा पर उन्होंने कहा कि न यहां के लोगों ने न तो हिंसा की और न ही वो इसका समर्थन करते हैं.

गूंजे सीएए से आजादी के नारे

आजकल सीएए के विरोध में आजादी के नारे शाहीन बाग में शाम होते वो गूंजने लगे. वहां जुटी महिलाओं के बीच कुछ सामाजिक कार्यकर्ता भी पहुंचे और पूरा माहौल जोश से भर गया.

अंधेरा बढ़ने लगा था मैं वापस शाहीन बाग मेट्रो स्टेशन के लिए एक गली की ओर चला और लोगों की भीड़ में कहीं गुम होते हुए स्टेशन के करीब एक गली से बाहर निकला. अजान शुरू हो चुकी थी और थोड़ी ही दूर पर कुछ बच्चे क्रिकेट खेलने में मशगूल थे. मैं आगे बढ़ा और मेट्रो की एक ट्रेन से अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गया.
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