दिल्ली हिंसा में घिरे मुस्लिम नौजवान की बुजुर्ग सिख ने ऐसे बचाई जान, सब कर रहे तारीफ

दिल्ली में हिंसा की घटनाओं के बीच कुछ कहानियां वाकई प्रेरणा देने वाली साबित हो रही हैं (प्रतीकात्मक तस्वीर)

ज़ियाउद्दीन के दोस्त ने बताया कि जब उसकी बातचीत हुई तो उसने कहा कि जब मौत मेरे सामने थी, तो मुझे बचाने वाले सरदारजी और दूसरे लोग ताउम्र एक फरिश्ते के रूप में याद रहेंगे

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    नई दिल्ली. 25 फरवरी की शाम उत्तर-पूर्वी दिल्ली (North-East Delhi) के भजनपुरा (Bhajanpura) की एक गली में ज़ियाउद्दीन (Ziauddin) जान बचाने के लिए इधर से उधर भाग रहा था. उसके पीछे कुछ लड़कों की भीड़ (Mob) लगी हुई थी. तभी दौड़ते-दौड़ते गली में एक जगह ज़ियाउद्दीन गिर पड़ता है तो उन्मादी भीड़ उस पर टूट पड़ती है और उसे डंडों से पीटना शुरू कर देती है. गली ज्यादा चौड़ी नहीं है. देखते ही देखते हो-हल्ला शुरू हो जाता है. तभी गली में रहने वाले कुछ लोग बाहर निकल आते हैं.

    बुजुर्ग सरदार जिंदर सिंह सिद्धू ने जब घर से बाहर निकलकर यह नज़ारा देखा तो पिट रहे युवक को फौरन बचाने की कोशिशों में जुट गए. उन्हें ऐसा करता देख गली के ही दो-चार अन्य लोग उनका साथ देने आ जाते हैं. इत्तेफाक से उस गली में लगे एक सीसीटीवी (CCTV) कैमरे में यह सारा कुछ कैद हो रहा था, जिसकी मदद से इंसानियत को जिंदा रखने वाली तस्वीरें आम लोगों तक पहुंच जाती हैं.

    भजनपुरा की इस गली के ही रहने वाले लोग सुनील, विकास, जैन साहब और सोनू जिंदर सिंह सिद्धू के साथ मिलकर ज़ियाउद्दीन को भीड़ से बचा लेते हैं. धकियाते हुए भीड़ को भगा देते हैं. सरदार जिंदर के घर में ज़ियाउद्दीन को ले जाया जाता है. शाम 6 बजे का वक्त था तो तब तक कुछ अंधेरा सा हो जाता है. ज़ियाउद्दीन को चाय-पानी और कुछ खाने को देकर सामान्य किया जाता है. फिर उससे उसका पता पूछा जाता है.

    भीड़ में घिरे युवक के सिर पर पगड़ी बांधकर बचाई जान

    इसी दौरान सरदार जिंदर को एक तरकीब सूझी तो उन्होंने तुरंत ही अपनी पगड़ी ज़ियाउद्दीन के सिर पर बांधकर उसे सरदार बनाना चाहा, ताकि उसकी पहचान छिपाकर उसे उसके घर या मोहल्ले तक पहुंचाया जा सके. लेकिन उन्होंने देखा कि उसकी तो मूंछ ही नहीं है. बिना मूंछ के तो यह सरदार लगेगा ही नहीं. फिर सरदार जिंदर पगड़ी को कुछ इस तरह से बांधते हैं कि ज़ियाउद्दीन की दाढ़ी, पगड़ी के अंदर दब जाती है. उसके ऊपर से ज़िया को हेलमेट पहना दिया जाता है. फिर दो लोग रात के अंधेरे में बाइक पर बीच में ज़िया को बैठाकर तीमारपुर की ओर उसके मोहल्ले में छोड़ आते हैं.

    इस बारे में जब न्यूज़ 18 हिंदी ने ज़ियाउद्दीन से बात करनी चाही तो त्रिलोकपुरी में रहने वाले उनके दोस्त वसीम ने ज़िया से बात कर बताया कि उस घटना से डर के चलते वो किसी के सामने नहीं आना चाह रहा है. लेकिन ज़िया ने इतना जरूर कहा कि जब मौत मेरे सामने थी, तो मुझे बचाने वाले सरदारजी और दूसरे लोग ताउम्र एक फरिश्ते के रूप में याद रहेंगे.

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