पत्रकार से राजनेता बने हरिवंश नारायण के जीवन की ऐसी है कहानी, पढ़कर आपको भी मिलेगी ऊर्जा
Patna News in Hindi

पत्रकार से राजनेता बने हरिवंश नारायण के जीवन की ऐसी है कहानी, पढ़कर आपको भी मिलेगी ऊर्जा
राज्यसभा के उपसभापति पद के उम्मीदवार हरिवंश नारायण सिंह. (फोटो एएनआई)

पत्रकार (Journalist) से राजनेता बने जदयू (JDU) सांसद (MP) हरिवंश (Harivansh) को एनडीए ने दूसरी बार राज्यसभा (Rajya Sabha) के उपसभा पति का उम्मीदवार चुना है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 10, 2020, 3:29 PM IST
  • Share this:
नई दिल्ली. पत्रकार (Journalist) से राजनेता बने जदयू (JDU) सांसद (MP) हरिवंश (Harivansh) को एनडीए ने दोबारा राज्यसभा के उपसभापति पद का उम्मीदवार बनाया गया है. अगस्त 2018 में वह राज्यसभा (Rajya Sabha) के उपसभापति बने थे. अप्रैल 2020 में उनका कार्यकाल खत्म हो गया था. हरिवंश जब उपसभापति बने थे तो उनके बारे में विस्तार से बातें आई थीं. हालांकि वह बातें भी पानी में तैरते बर्फ के उस हिस्से की तरह थीं, जो बाहर से दिखाई देता है, लेकिन दो तिहाई हिस्सा अंदर रहता है.

हरिवंश को समग्रता में जानना, उनके व्यक्तित्व, कृतित्व, नेतृत्व क्षमता को जानना एक मुकम्मल किताब की तरह है. सिताबदियारा में उनका जन्म हुआ. सिताबदियारा यानी जेपी का गांव. एक ऐसा गांव समूह, जो दो राज्यों उत्तरप्रदेश और बिहार के तीन जिलों, भोजपुर, सारण, बलिया में फैला हुआ है. वहीं से मैट्रिक तक की पढ़ाई करने के बाद हरिवंश बनारस के यूपी कॉलेज से इंटर की पढ़ाई, उसके बाद कुछ दिनों के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय चले गये. बनारस में मन रम गया था, शहर भा गया था फिर स्नातक की पढ़ाई के लिए बनारस वापसी हुई.

बीएचयू से ली शिक्षा
बीएचयू से स्नातक और फिर वहीं से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर और पत्रकारिता में डिप्लोमा प्रशिक्षण उन्होंने लिया. उस समय टाइम्स आफ इंडिया समूह में ट्रेनिंग के लिए फार्म आता था. हरिवंश भी उसमें चयनित हुए. इंटरव्यू के लिए गये. मुंबई में ट्रेनिंग हुई और फिर वहीं टाइम्स समूह की मशहूर हिंदी पत्रिका धर्मयुग में नौकरी करने लगे. धर्मवीर भारती जैसे यशस्वी संपादक के नेतृत्व और मार्गदर्शन में पत्रकारिता की उन्होंने शुरुआत की. हरिवंश ग्रामीण परिवेश से थे. मध्यवर्गीय परिवार से, सरकारी नौकरी का एक दबाव और आकर्षण दोनों था, बैंक की नौकरी में सेलेक्शन हुआ. हैदराबाद और पटना में बैंक ऑफ इंडिया में अधिकारी रहे, लेकिन पत्रकारिता कर चुके हरिवंश का मन नौकरी में रमा नहीं. इस बीच रिजर्व बैंक में भी अधिकारी के लिए चयन हो गया, लेकिन पत्रकारिता उनके मन में रच बस चुकी थी. बेहतरीन नौकरी को और आगे के अवसर को भी छोड़कर फिर से पत्रकारिता में आ गये.
कोलकाता से प्रकाशित आनंद बाजार पत्रिका समूह की हिंदी पत्रिका रविवार से जुड़ गये. हिंदी के एक और यशस्वी संपादक और प्रखर पत्रकार एसपी सिंह के संपादकत्व में काम करने लगे. यहां उनको बड़ी जिम्मेदारी मिली. धर्मयुग में काम करते हुए कम उम्र में ही बड़े वैचारिक विषयों पर लेख लिखने लगे, जिसकी चहुंओर चर्चा होती रही.



रविवार से जुड़े तो बिहार-झारखंड में की रिपोर्टिंग
रविवार से जुड़े तो बिहार और झारखंड तब संयुक्त प्रदेश ही था के कई इलाकों में रिपोर्टिंग करने का अवसर भी मिला. उस समय बिहार और झारखंड के चप्पे-चप्पे से हरिवंश का परिचय हो चुका था. रविवार में काम करते हुए ही रांची से प्रकाशित अखबार प्रभात खबर से प्रस्ताव गया. तब प्रभात खबर न सिर्फ मरणासन्न या बंदप्राय अखबार था बल्कि उस पर एक खास पार्टी के अखबार होने का ठप्पा भी था.

सरकारी कार्यालयों में और अधिकारियों के बीच भेजे जाने भर प्रति छपती थी. रिपोर्टिंग करते हुए, झारखंड के इलाके में घूमते हुए, आदिवासियों के बीच काम करते हुए हरिवंश को उस इलाके से लगाव हो चुका था. आत्मीय रिश्ता बन चुका था, उन्होंने चुनौती स्वीकार की. प्रभात खबर से जुड़ गये. तब कई वरिष्ठ पत्रकारों ने उनको सलाह दी कि अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार रहे हो.

प्रभात खबर को दिलाया नया मुकाम
प्रभात खबर का मर्सियागान हो चुका था कि यह अखबार छह माह भी नहीं चल सकता. हरिवंश जुड़े, संघर्ष और सृजन के बीज समानांतर रूप से बोने शुरू किये. अखबार के कायापलट की कहानी शुरू हुई. जिस अखबार का मर्सियागान हो चुका था, वह पूर्वी भारत का स्वर बन गया. क्षेत्रीय पत्रकारिता करते हुए प्रभात खबर की धमक राष्ट्रीय पत्रकारिता में सुनाई पड़ने लगी. बीच में जब चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने तो हरिवंश प्रधानमंत्री कार्यालय में, चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व तक संयुक्त सचिव के पद पर रहे. फिर वापस अखबार में आए. करीब 28 साल तक एक ही अखबार से जुड़े रहें. अखबार का विस्तार हुआ. बिहार, झारखंड, बंगाल के दस जगहों से प्रकाशित होने लगा. अखबार में नौकरी के आखिरी दिनों में जदयू की ओर से राज्यसभा सांसद बनने का प्रस्ताव आया. राज्यसभा सांसद बने और फिर अगस्त 2018 में उच्च सदन के उपसभापति.

यह संक्षेप में उनका सफरनामा हुआ. लेकिन क्या एक बारगी से ऐसा हुआ कि हरिवंश को राजनीति में जाने का मौका मिला या राजनीति के प्रति वे आकर्षित हो गये? जो उनके पत्रकारी जीवन को नहीं जानते या उनके लेखन से परिचित नहीं हैं वह ऐसा मानते हैं या कहते हैं. लेकिन जो उनकी पत्रकारिता और लेखन से परिचित हैं, उन्हें मालूम है कि राजनीति, राजनीतिक चेतना और राजनीतिक समझ, उन्हें अपने गांव से ही मिली है. जेपी के ग्रामीण और पड़ोसी होने की वजह से स्कूली जीवन से ही हरिवंश बड़े से बड़े नेताओं को देखत और सुनते रहे हैं.

जेपी के गांव सिताबदियारा में हुआ जन्म
सिताबदियारा में तब जेपी राजनीतिक प्रशिक्षण शिविर लगवाते थे, उसे देखते रहे. बनारस आये तो कृष्णनाथ जैसे समाजवादी चिंतक, विचारक से निजी और आत्मीय रिश्ता बना. कृष्णनाथ तब समाजवादी राजनीति की एक अहम धुरी थे. इमरजेंसी के दिनों में बीएचयू में परचा बांटने, बुकलेट निकालने, चिट्ठियां पहुंचाने का काम किया. छात्र जीवन में ही हॉस्टल का चुनाव भी लड़ गये और फिर पत्रकारिता में आये तो उनके लेखन और पत्रकारिता का अधिकांश हिस्सा राजनीति को ही समर्पित रहा. संसदीय या सत्ता की राजनीति नहीं बल्कि पत्रकारिता के माध्यम से वह जनता की राजनीतिक चेतना के विकास की कोशिश करते रहे. राजनीति और समाज के बीच पत्रकारिता को सेतु बनाते रहे. झारखंड निर्माण का राजनीतिक आंदोलन चल रहा था, उस आंदोलन में अखबार को औजार हथियार की तरह बनाया. प्रधान संपादक रहते हुए लोगों को लोकतंत्र से जुड़ने, वोट जरूर देने, जनप्रतिनिधियों से सवाल करने के प्रति जागरूक करने के लिए झारखंड के सुदूर और नक्सल प्रभावित इलाके में निरंतर यात्रा करते रहे.

दो चार लोग भी होते तो उनके बीच भी संबोधन करते. गला बैठ जाता, गले में चुना लगाकर.
इन प्रसंगों का संक्षेप में उल्लेख इसलिए कि हरिवंश में अलहदा किस्म की राजनीतिक चेतना उनके छात्र जीवन से ही रही, जिसका नये सिरे से विस्तार पत्रकारिता में आने के बाद हुआ और फिर जब वह सांसद बने या उपसभापति भी तो वह चेतना एक सुव्यवस्थित और सरोकारी रूप में बार- बार दिखा.

राजनीति में आने के बाद भी किये बड़े काम
सांसद बनने के बाद उनके कुछ कामों को कम लोग जानते हैं. आमतौर पर एमपी लैड फंड को लेकर सांसद दबाव में रहते हैं या उन पर दबाव होता है. हरिवंश ने सांसद बनने के बाद ही तय किया कि उन्हें क्या करना है? बिहार में नदियों के अध्ययन के लिए आर्यभट्ट विश्वविद्यालय में उनके प्रयास से रिवर रिसर्च सेंटर की स्थापना हुई. बिहार में नदियां वरदान और अभिशाप दोनों है, लेकिन अध्ययन का कोई समुचित केंद्र नहीं था. आईआईटी, पटना के साथ मिलकर अर्थक्वेक इंजीनियरिंग का केंद्र खोलने और सेंटर फार इंडेंजर्ड लैंग्वेज खोलने में सहयोग.

कुल मिलाकर कहें तो बिहार में सेंटर आफ एक्सेलेंस बनाने में उनकी रुचि रही, उसी में उन्होंने अपने एमपीलैड फंड का उपयोग किया. और जब बतौर सांसद आदर्श ग्राम चयन की बात सामने आई तो हरिवंश ने तय किया कि वह किसी ऐसे गांव का चयन करेंगे,जिसका ऐतिहासिक महत्व तो हो ही, जो किसी भी तरह से परिचित गांव ना हो. उन्होंने आरक्षित संसदीय क्षेत्र सासराम के अंतर्गत करहगर प्रखंड में आनेवाले गांव बहुआरा का चयन किया. भवानी दयाल संन्यासी का गांव. भवानी दयाल गांधी के अनुयायी थे, एक समय में प्रखर लेखक, पत्रकार और मशहूर हिंदीसेवी. गांधी के साथ उन्होंने और उनके पिता जयराम सिंह ने दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष किया, सत्याग्रह में भूमिका निभायी. गांधी ने इसकी चर्चा अपनी आत्मकथा में भी की है.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज