2019 के लिए दलित राजनीति के क्या हैं मायने?
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2019 के लिए दलित राजनीति के क्या हैं मायने?
समाज में सबसे कमजोर माने जाने वाले दलितों की बड़ी सियासी ताकत है, इसके पीछे इनका संख्या बल है

समाज में सबसे कमजोर माने जाने वाले दलितों की बड़ी सियासी ताकत है, इसके पीछे इनका संख्या बल है

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 2, 2018, 10:14 AM IST
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एससी/एसटी एक्ट पर 20 मार्च को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दलित राजनीति में उबाल है. आंदोलन के बाद पैदा हुए हालात ने सत्तारूढ़ दल की परेशानी बढ़ा दी है.  दलितों का हितैषी बनने के लिए सभी दलों में होड़ लगी हुई है. ऐसी होड़ कि कहीं ये वोट बैंक हाथ से छूट न जाए.

समाज में सबसे कमजोर माने जाने वाले इस वर्ग की बड़ी सियासी ताकत है. वह ताकत है इनकी संख्या की वजह से. हालांकि, दलित हमेशा महज सत्ता के लिए सीढ़ी की तरह इस्तेमाल होता रहा है. इस एक्ट के बहाने 2 अप्रैल को हुए देशव्यापी आंदोलन के बाद यह माना रहा है कि 2019 के सियासी संग्राम में दलित बड़ा मुद्दा होंगे. सियासत में दलितों का हथियार पहले से अधिक पैना होगा.

दलित वोट बैंक किसके साथ होगा इसकी सबसे ज्यादा कसमसाहट बीजेपी के दलित नेताओं में है. बेचैनी उन लोगों में भी है, जो अपने आपको अब तक दलितों का सबसे बड़ा खैरख्वाह मानते आए हैं. चिंता आरएसएस को भी है और बीजेपी को भी. कांग्रेस यह सपना देखने लगी है कि वर्षों पहले उसका कोर वोटर रहा दलित उसकी ओर लौट आए. मायावती तो अपने आपको दलित वोटों का स्वाभाविक हकदार मानकर चल रही हैं. मतलब हर दल दलितों के मुद्दों को उठाकर फायदा लेने की फिराक में है.



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राजनीति में क्यों इतने महत्वपूर्ण हैं दलित

2011 की जनगणना के मुताबिक देश में 16.63 फीसदी अनुसूचित जाति और 8.6 फीसदी अनुसूचित जनजाति हैं. 150 से ज्यादा संसदीय सीटों पर एससी/एसटी का प्रभाव माना जाता है. सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 46,859 गांव ऐसे हैं जहां दलितों की आबादी 50 फीसदी से ज्यादा है. 75,624 गांवों में उनकी आबादी 40 फीसदी से अधिक है. देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा की 84 सीटें एससी के लिए जबकि 47 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं. इसलिए सबकी नजर दलित वोट बैंक पर लगी हुई है.

इसी वोटबैंक के भरोसे मायावती चार बार यूपी की सीएम बन चुकी हैं. रामबिलास पासवान, उदित राज, रामदास अठावले जैसे दलित नेता उभरे हैं. चंद्रशेखर आजाद और जिग्नेश मेवाणी जैसे नए दलित क्षत्रप भी इसी संख्या की बदौलत पैदा हुए हैं.

आरएसएस, बीजेपी और दलितों से जुड़े मसले

दलितों का एक बड़ा धड़ा आरोप लगा रहा है कि इस वर्ग के उत्पीड़न के लिए आरएसएस जिम्मेदार है. लेकिन, संघ ने अपने एक बयान में स्पष्ट किया है कि 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का न्यायालय के इस निर्णय से कोई संबंध नहीं है.'

संघ ने कहा है कि "जाति के आधार पर किसी भी भेदभाव अथवा अत्याचार का संघ सदा से विरोध करता है. इस प्रकार के अत्याचारों को रोकने के लिए बनाये गए कानूनों का कठोरता से पालन होना चाहिए. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए इस निर्णय से असहमति प्रकट करते हुए केंद्र सरकार ने जो पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्णय किया है, वह सर्वथा उचित है"

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तो क्या है सिर्फ प्रतीकात्मक है!

कुछ माह पहले ही स्वयंसेवकों ने तेलंगाणा प्रांत में दलितों के मान-सम्मान के लिए एक मुहिम चलाई थी. जिसके फलस्वरुप यहां के 200 गावों में एक श्मशान, मंदिर में सबको प्रवेश एवं होटल में सभी के लिए समान गिलास रखना संभव हुआ है. राजस्थान में भी संघ ने एक कुंआ, एक श्मशान तथा मंदिर प्रवेश को लेकर काम किया है.

पिछले माह मेरठ में हुए आरएसएस के राष्ट्रोदय में संघ ने छुआछूत मिटाने पर जोर दिया. जातीय भेद मिटाने का आह्रवान किया था. 2014 में पीएम नरेंद्र मोदी की छवि और आरएसएस की कसरत की वजह से दलितों का वोट भी बीजेपी को मिला था.

इस आंदोलन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को आंबेडकर के बहाने विपक्ष को आड़े हाथों लिया. उन्होंने कहा, "केंद्र सरकार आंबेडकर के दिखाए रास्ते पर आगे बढ़ रही है."

योगी आदित्यनाथ, नाथ संप्रदाय और दलित

दलित नेता भगवा ब्रिगेड से आने वाले मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को दलितों का विरोधी बताते हैं. जबकि गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार टीपी शाही ऐसा नहीं मानते.

उनके मुताबिक "योगी की दलितों में अच्छी छवि है. गोरखनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी कमलनाथ दलित चेहरा हैं. योगी के बाद सारा कामकाज वही संभालते हैं. गोरखनाथ पीठ की परंपरा के अनुसार योगी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में व्यापक जनजागरण का अभियान चलाया. सहभोज के माध्यम से छुआछूत (अस्पृश्यता) की भेदभावकारी रूढ़ियों पर जमकर प्रहार किया."

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शाही बताते हैं, "योगी आदित्‍यनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ ने दक्षिण भारत के मंदिरों में दलितों के प्रवेश को लेकर संघर्ष किया. जून 1993 में पटना के महावीर मंदिर में दलित संत सूर्यवंशी दास का अभिषेक कर पुजारी नियुक्‍त किया. इस पर विवाद भी हुआ लेकिन वे अड़े रहे. इसके बाद बनारस के डोम राजा ने उन्‍हें अपने घर खाने का चैलेंज दिया तो उन्‍होंने उनके घर पर जाकर संतों के साथ खाना खाया. योगी आदित्‍यनाथ का दलितों के प्रति लगाव रहा है और वे उनके लिए काम करते रहे हैं."

इन सबके बावजूद बहराइच (यूपी) से भाजपा सांसद साध्वी सावित्री बाई फुले पार्टी से नाराज हैं. वह कहती हैं "आरक्षण को लेकर जो संविधान में व्यवस्था है, सरकार उसे लागू करे, जिससे बहुजन समाज आगे बढ़े और गरीबी दूर हो."

साध्वी के मुताबिक "आरक्षित वर्ग के पद नहीं भरे जा रहे. अनुसूचित जाति के बच्चों की स्कूलों में स्थिति दयनीय है. उनका न तो एडमिशन लिया जा रहा है और न ही उन्हें छात्रवृत्ति ही मिल रही है. इसकी वजह से दलितों और पिछड़ों की मुश्किलें बढ़ रही हैं. हमारी सरकार ने संविधान को लागू नहीं किया. जबकि मैं संविधान लागू करने की मांग को लगातार संसद में उठाते आई हूं. मैंने इसीलिए अब मैदान में आने का फैसला किया है."

मायावती और उनकी दलित राजनीति

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती मानती हैं कि दलित वोटों पर सिर्फ उनका हक है. बसपा का मानना है कि वह अपने काम की वजह से इस दबे-कुचले वर्ग में राजनीतिक उत्कर्ष का प्रतीक हैं. इसीलिए उनकी एक आवाज पर दलित गोलबंद हो जाते हैं. गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उप चुनाव में मायावती के समर्थन से भाजपा पर सपा की जीत के बाद यह बात और पुख्ता होती है. मायावती ने शायद महसूस कर लिया है कि उनके पास मौजूद दलित वोट बैंक से वह बीजेपी के विजयरथ को रोक सकती हैं.

यूपी में तो दलित वोटों की बदौलत बसपा चार बार सत्ता में रही है. लेकिन उससे बाहर मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, राजस्थान, बिहार, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और कर्नाटक में भी उसे न सिर्फ वोट मिले हैं बल्कि उसने विधानसभा में सीट पक्की करने में भी कामयाबी पाई है. यूपी से बाहर बसपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 1 से लेकर 11 विधायकों तक रहा है.

दिल्ली जैसे राज्य जहां 16.75 फीसदी दलित हैं, वहां बसपा ने 2008 में 14.05 फीसदी तक वोट हासिल किया था, जबकि उसके वरिष्ठ नेताओं ने यहां उत्तर प्रदेश जैसी मेहनत नहीं की थी. बाद में दलित वोट कभी कांग्रेस तो कभी आम आदमी पार्टी के पास शिफ्ट होता रहा. सबसे ज्यादा दलित आबादी वाले राज्य पंजाब में जब 1992 में उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था तो उसे 9 सीटों के साथ 16.32 फीसदी वोट मिले थे. पार्टी के संस्थापक कांशीराम पंजाब के ही रहने वाले थे.

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बसपा प्रमुख मायावती पर 'बहनजी: द राइज एंड फॉल ऑफ मायावती' नामक किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस कहते हैं "बीजेपी अपने आपको चाहे जितना दलित हितैषी बताए, आंबेडकर की बात करे लेकिन रोहित वेमुला, ऊना कांड और उसके नेताओं के विवादित बयानों को नहीं भूला जा सकता. इस आंदोलन के बाद पैदा हुए नए सियासी हालात को देखकर यही लगता है कि बीजेपी को दलितों से नुकसान हो सकता है. इसका फायदा यूपी में बसपा-सपा और शेष राज्यों में बीजेपी विरोधी गठबंधन को होने वाला है."

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