प्रवर्तन निदेशालय के अपीलेट ट्रिब्यूनल में रिक्तियों पर SC सख्‍त, सरकार को नोटिस जारी

सुप्रीम कोर्ट का फाइल फोटो...

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Appellate Tribunal for Forfeited Property में भर्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका पर जवाब तलब हो गया है. शुक्रवार को जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस सुभाष रेड्डी और जस्टिस एमआर शाह की खंडपीठ ने याचिका पर संज्ञान लेते हुए भारत सरकार को नोटिस जारी कर 4 हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 29, 2021, 8:57 PM IST
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नई दिल्‍ली : काफी समय से चेयरमैन, मेंबर्स और अन्य स्टाफ की कमी से जूझ रहे धनशोधन निवारण अधिनियम अपीलेट ट्रिब्यूनल (Appellate Tribunal for Forfeited Property) में भर्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका पर जवाब तलब हो गया है. शुक्रवार को जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस सुभाष रेड्डी और जस्टिस एमआर शाह की खंडपीठ ने याचिका पर संज्ञान लेते हुए भारत सरकार को नोटिस जारी कर 4 हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है.

दरअसल, वकील व समाजसेवी अमित साहनी द्वारा दायर इस याचिका में कहा गया है कि न्याय में देरी का मतलब न्याय से वंचित रखना है और ईडी के अपीलेट ट्रिब्यूनल में अवैध धन, स्मगलिंग व मादक पदार्थों से संबंधित मामले, बेनामी संपत्ति और ब्लैक मनी जैसे बड़े महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामलों की सुनवाई होती है.

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वकील प्रीति सिंह के मार्फत दायर इस याचिका में कहा गया कि अगस्त 2019 में दिल्ली हाईकोर्ट से सेवानिवृत जस्टिस सुनील गौर को ट्रिब्यूनल का चेयरमैन बनाने की स्वीकृति के बारे में खबरें सामने आई थीं और उनका कार्यकाल तत्कालीन चेयरमैन जस्टिस मनमोहन सिंह के कार्यकाल की समाप्ति होने के बाद शुरू होना था, लेकिन बाद में उसकी अधिसूचना जारी नहीं की गई और सितम्बर 2019 से ट्रिब्यूनल के चेयरमैन का पद खाली है.
याचिका में कहा गया है कि ट्रिब्यूनल में चेयरमैन हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज होते हैं और उसके अतिरिक्त 4 मेंबर्स जोकि कानून, वित्तीय या प्रबंधन विशेषज्ञ होते हैं. आज की तारीख में ट्रिब्यूनल में केवल एक मेंबर है और इसलिए आमजन को न्याय मिलने में परेशानी हो रही है.

अधिवक्ता व समाजसेवी अमित साहनी द्वारा सूचना के अधिकार कानून के तहत एक अर्जी दायर की गई थी, जिसमें हैरान करने वाले तथ्य सामने आए कि चेयरमैन मेंबर्स के समेत कुल 23 पदों पर नियुक्तियां की जानी हैं और कई पद 2008 से खाली हैं और सरकार द्वारा इन्हें भरने के लिखे कोई विशेष प्रयास नहीं किए गए है. साहनी द्वारा ट्रिब्यूनल में पदों की नियुक्तियों को लेकर एक शिकायत भी की थी, जिसपर सरकार द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई.

याचिका में कहा गया कि ट्रिब्यूनल मूल रूप से हाईकोर्ट या अन्य कोर्ट्स के पूरक के रूप में काम करते हैं और उनका गठन जल्दी न्याय मुहैया करवाने के लिए किया गया है और पदों की नियुक्ति समय पर न होना प्रत्यक्ष रूप से न्याय प्रक्रिया में बाधा उत्पन करता है.



गौरतलब है कि पिछले साल नवंबर में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को ट्रिब्यूनल में भर्तियों को सुचारु रूप से करने के लिए राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल कमीशन स्थापित करने हेतु निर्देश दिए थे और यह भी आदेश दिया था कि जब तक राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल कमीशन नहीं हो जाता, तब तक संबंधित मंत्रालय में एक विशेष शाखा बनाई जाए जो ट्रिब्यूनलों की जरूरतों का ध्यान दे ताकि न्याय प्रक्रिया में देरी न हो.
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