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... जब देर रात दिल्ली की सड़कों पर निकलती थीं सुषमा स्वराज

दिल्ली की सीएम बनते ही सुषमा स्वराज ने राजधानी में हो रहे अपराधों के सफाए के लिए कमर कस ली. (फाइल फोटो)

दिल्ली की सीएम बनते ही सुषमा स्वराज ने राजधानी में हो रहे अपराधों के सफाए के लिए कमर कस ली. (फाइल फोटो)

दिल्ली की सीएम बनते ही सुषमा स्वराज ने राजधानी में हो रहे अपराधों के सफाए के लिए कमर कस ली थी. इसके लिए उन्होंने खुद सड़कों पर उतरने का निर्णय लिया और इसके बाद सुषमा ने खुद शुरू की पुलिस के साथ गश्त.

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    सुषमा स्वराज ने जब दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री के तौर पर कमान संभाली तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या कानून व्यवस्‍था थी. लेकिन उन्होंने इसके सामने हार नहीं मानी और खुद पुलिस महकमे के साथ वह इस व्यवस्‍था को दुरुस्त करने में जुट गईं. हाल यह रहा कि सुषमा ने पुलिस जिप्सी में ही बैठकर कई बार रात में सड़कों पर गश्त भी की. उनका पहला लक्ष्य था कि राजधानी में महिलाओं की सुरक्षा से कोई खिलवाड़ न हो. वह इसमें सफल भी रहीं. उनके मुख्यमंत्री के तौर पर रहे कार्यकाल के दौरान दिल्ली में हो रहे अपराधों में रिकॉर्ड कमी देखी गई.

    पुलिस के साथ गश्त
    दिल्ली की सीएम बनते ही सुषमा स्वराज ने राजधानी में हो रहे अपराधों के सफाये के लिए कमर कस ली. इसके लिए उन्होंने खुद सड़कों पर उतरने का निर्णय लिया और इसके बाद सुषमा ने खुद शुरू की पुलिस के साथ गश्त. देर रात सड़कों पर महिलाओं की सुरक्षा में कोई चूक ना हो इसलिए कई बार सुषमा को पुलिस जिप्सी में गश्त करते भी देखा गया. इस दौरान जगह जगह पर गाड़ी रोककर लोगों से पूछताछ करना और अकेली दिख रही महिलाओं को उनके घर तक पहुंचाना ये नजारा दिल्ली की सड़कों पर आम हो गया था. लोग भी बेखौफ थे कि एक ऐसी मुख्यमंत्री मिली हैं जो खुद लोगों की सुरक्षा में लगी हैं.

    प्याज ने छीनी गद्दी
    सुषमा के इन सभी प्रयासों के बाद भी जब विधानसभा चुनाव हुए तो दिल्ली की जनता ने उन्हें नकार दिया. कारण था प्याज के आसमान छूते भाव. इस दौरान प्याज के भावों में रिकॉर्ड तेजी आई. महंगाई बढ़ने से नाराज हुई जनता ने सुषमा स्वराज की जगह पर शीला दीक्षित को चुना. लेकिन सुषमा कभी भी दिल्ली की राजनीति से दूर नहीं दिखीं. लालकृष्‍ण आडवाणी, मदनलाल खुराना और अरुण जेटली के साथ उनका भी दखल हमेशा दिल्ली के चुनावों में बना रहा.

    ऐसे बनी थीं दिल्ली की सीएम
    1993 में बीजेपी पहली बार दिल्ली में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई और मदनलाल खुराना को सीएम बनाया गया. लेकिन 2 साल और 86 दिन के बाद 1996 में उनकी जगह साहब सिंह वर्मा को मुख्यमंत्री पद की कमान सौंप दी गई. लेकिन बचे हुए कार्यकाल को वह भी पूरा नहीं कर सके और फिर सुषमा को दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनाया गया.

    शीला दीक्षित बनाम सुषमा स्वराज
    अमर उजाला की एक रिपोर्ट के अनुसार 1998 में दिल्ली विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस ने शीला दीक्षित पर भरोसा दिखाया. इस दौरान शीला ने राजधानी में कांग्रेस की जड़ें जमाने का काम किया. बीजेपी की तरफ से सुषमा स्वराज ही मैदान में थीं. वो चुनाव सुषमा स्वराज बनाम शीला दीक्षित बन कर रह गया. इस दौरान शीला दीक्षित का जादू दिल्लीवासियों पर चल गया और बीजेपी यह चुनाव हार गई.

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