जानें क्या है दिल्ली स्कूलों का हैप्पीनेस कोर्स, कैसे बच्चों को बनाता है बेहतर

दिल्ली स्कूल में हैप्पीनेस क्लासेज में अमेरिका की फर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रंप

दिल्ली ks स्कूलों में करीब दो साल पहले लागू किये गए हैप्पीनेस कोर्स की चर्चा अब विदेशों में भी होने लगी है. खुद अमेरिका की फर्स्ट लेडी मेलानिया इसकी पढ़ाई को देखने के लिए दिल्ली के एक स्कूल में गईं. मूलतौर पर ये कोर्स पढ़ाई से ज्यादा गतिविधियों पर आधारित है जो बच्चे के व्यक्तित्व को सकारात्मक तौर पर बदलता है

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    दिल्ली के स्कूलों में वर्ष 2018 में हैप्पीनेस कोर्स शुरू किया गया था जिसे बहुत पसंद किया जा रहा है. रिपोर्ट हैं कि इसका सकारात्मक प्रभाव बच्चों पर देखा जा रहा है. हैप्पीनेस कोर्स के चर्चे अब तो विदेश में फैलने लगे हैं. यहां तक अमेरिका की फर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रंप खासतौर पर दिल्ली के एक स्कूल में ये क्लास देखने गईं. जानते हैं कि हैप्पीनेस कोर्स में क्या पढ़ाया जाता है और कैसी होती है इसकी क्लास.

    जब हैप्पीनेस कोर्स की तैयारी की जा रही थी तो इसके पाठ्यक्रम में ध्यान रखा गया कि ये व्यक्तिगत विकास के साथ दिमागी तौर पर स्पष्टता और एकाग्रता बनाने में मददगार हो. इस कोर्स में क्रिटिकल थिंकिंग और उत्सुकता, बेहतर संवाद के साथ तनाव दूर रखने और तमाम तरह के हालात से निपटने के बारे में जोर दिया गया.

    दिल्ली के स्कूलों में हैप्पीनेस कोर्स नर्सरी से लेकर आठवीं क्लास तक पढ़ाया जाता है. इसे इसी तरह तैयार भी किया गया है कि छोटे बच्चों से लेकर बड़े होते किशोरों के व्यक्तित्व को ऐसा बनाया जाए कि वो तनाव को दूर रख सकें और खुश रहें.

    मेलानिया ने हैप्पीनेस कोर्स की क्लास देखने के लिए दिल्ली के एक सरकारी स्कूल का दौरा किया. उन्होंने खुद देखा कि ये क्लास कैसे चलती है, इसमें क्या होता है. ये कोर्स अब दिल्ली सरकार की नई तरह की पढ़ाई का एक प्रतीक भी बन गया है. ये कोर्स दिल्ली सरकार ने जुलाई 2018 में लांच किया था.

    दिल्ली में हैप्पीनेस कोर्स की शुरुआत नर्सरी से क्लास आठ तक वर्ष 2018 में की गई थी


    क्या है दिल्ली स्कूलों का  हैप्पीनेस पाठ्यक्रम
    अगर आप वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2018 पर गौर करें तो पाएंगे कि भारत की रैंकिंग 155 देशों में 133वीं है. लिहाजा ये पाठ्यक्रम स्कूलों में बौद्धिकता, भाषा, साक्षरता, गणना और कला के साथ बेहतर शख्स होने के साथ छात्रों की खुशी पर ध्यान देता है. ये कोर्स मानता है कि हमारे भविष्य के नागरिक प्रबुद्ध, जागरूक, चेतनायुक्त, खुश और अपनी पहचान पर गर्व करने वाले होने चाहिए. इसका आधार ये भी है कि शिक्षा का उद्देश्य बहुत बड़ा है, जिसे समाज की रूढ़ियों और जड़ सोच से दूर रहना चाहिए.

    इस पाठ्यक्रम का आब्जेक्टिव आत्म जागरण, दिमागी स्पष्टता, तार्किक सोच और जिरह होनी चाहिए. वो आपस में बेहतर तरीके से बात करें और तनाव को हर हाल में दूर रखने में सक्षम हों.

    इस पूरे कोर्स का उद्देश्य बच्चों के व्यक्तित्व को बेहतर और आत्मविश्वास युक्त बनाने के साथ एक बेहतर नागरिक बनाना है


    इसे कैसे लागू किया गया
    इस कैरिकुलम को इस तरह तैयार किया गया है कि नर्सरी से कक्षा आठ तक के बच्चों को इससे परिचित कराया जा सके. इसमें ग्रुप वन में नर्सरी से क्लास 02 के बच्चे होते हैं. सप्ताह में दो बार 45 मिनट की क्लासेज होती हैं, जिसे किसी टीचर की देखरेख में कराया जाता है. इसमें दिमागी प्रखरता, फोकस की गतिविधियां और एक्सरसाइज कराई जाती हैं.

    बच्चे क्या करते हैं
    क्लास 1-2 के बच्चे इन कक्षाओं को रोज करते हैं, इसमें वो माइंडफुलनेस से जुड़ी एक्टिविटीज में हिस्सा लेते हैं और एक्सरसाइज करते हैं. इसमें वो संबंधित सवाल-जवाब के सेशन में हिस्सा लेते हैं.
    दूसरे ग्रुप में थर्ड क्लास से पांचवीं क्लास के बच्चे होते हैं. ग्रुप नंबर तीन में क्लास 6-8 के बच्चे होते हैं. पूरी एक्सरसाइज ऐसी होती है कि वो खुद को बेहतर तरीके से अभिव्यक्त करने के साथ बेहतर व्यवहार करें यानी उनके व्यवहार में बदलाव साफतौर पर नजर आए.

    इसमें मूल्यांकन के लिए कोई एग्जाम नहीं होता और ना ही कोई नंबर दिये जाते हैं. आकलन खुद ब खुद बच्चों में आ रहे बदलावों के जरिए हो जाता है


    इससे व्यक्तित्व पर क्या असर होता है
    इस तरह ये पूरा पाठ्यक्रम चार ग्रुप में बांटा गया है ताकि बच्चे ज्यादा प्रबुद्ध, एकाग्र, शिष्ट, तार्किक विचार प्रक्रिया और व्यवहार वाले बनें. इससे विचारों की मौलिक क्षमता बढ़ती है. इस पढ़ाई में आत्म चेतना, सुनने और वर्तमान में रहने की ओर प्रेरित करती है. नतीजे में वो खालीपन, निराशा, तनाव को दूर करने में सक्षम ही नहीं होते बल्कि अपनी बात कहीं अधिक असरदार तरीके से सामने रख सकते हैं. उनके पूरे व्यक्तित्व में एक संतुलन और आत्मविश्वास नजर आता है. वो जीवन में स्वच्छता, हाइजीन और स्वास्थ्य के प्रति कहीं अधिक जागरूक हो जाते हैं. उनका व्यक्तित्व सकारात्मक तरीके से विकसित होता है.

    क्या इसकी परीक्षा होती है
    नहीं, इसमें मूल्यांकन के लिए कोई एग्जाम नहीं होता और ना ही कोई नंबर दिये जाते हैं. आकलन खुद ब खुद बच्चों में आ रहे बदलावों के जरिए हो जाता है. इसमें हर बच्चे का विकास खास और बेहतर तरीके से होता है.

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