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शहीद का दर्जा पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे CRPF-BSF के रिटायर्ड जवान

News18Hindi
Updated: February 14, 2020, 11:12 AM IST
शहीद का दर्जा पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे CRPF-BSF के रिटायर्ड जवान
पुलवामा हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान हुए थे शहीद (फाइल फोटो)

सेना (Army) के शहीद जवान (Martyr Jawan) के परिवार को मिलने वाले मुआवजे और दूसरी सुविधाओं जैसे लाभ भी पैरामिलिट्री फोर्स (Paramilitary force) के जवान के परिवार को नहीं मिलते हैं.

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  • Last Updated: February 14, 2020, 11:12 AM IST
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नई दिल्ली. कश्मीर (Kashmir) के कुपवाड़ा (Kupwada) में शहीद (Martyr) होने वाले सेना के जवान और सुकमा (Sukma) में वीरगति को प्राप्त होने वाले जवान की शाहदत का दर्जा अलग-अलग है. सीआरपीएफ (CRPF), बीएसएफ (BSF) हो या फिर दूसरी पैरामिलिट्री फोर्स (Paramilitary force) का जवान अगर किसी आतंकी हमले में वीरगति को प्राप्त होता है तो उसे सेना के जवान की तरह से शहीद का दर्जा नहीं दिया जाता है. इतना ही नहीं सेना के शहीद जवान के परिवार को मिलने वाले मुआवजे और दूसरी सुविधाओं जैसे लाभ भी पैरामिलिट्री फोर्स के जवान के परिवार को नहीं मिलते हैं. आज जब पुलवामा हमले की बरसी है तो एक बार फिर इसे लेकर चर्चाएं हो रही हैं.

शहीद के बारे में क्या कहते रहे हैं सरकार के मंत्री

गौरतलब है कि 14 मार्च, 2019 को लोकसभा में एक जवाब में गृह राज्यमंत्री किरेन रिजिजू ने ये साफ किया था कि किसी कार्रवाई या अभियान में मारे गए केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और असम राइफल्स के कर्मिकों के संदर्भ में शहीद शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता है. इतना ही नहीं न्यूज18 हिंदी से बात करते हुए गृह राज्य मंत्री रहे हंसराज गंगाराम अहीर ने तो बडे ही अचरज के साथ कहा था, “ये तो हो ही नहीं सकता कि हम उन्हें शहीद न मानें.

हम तो अपने भाषणों में भी उन्हें शहीद कहते हैं. अगर कागजों में उन्हें शहीद नहीं माना जा रहा है तो मैं इस मामले को दिखवाता हूं. इस संबंध में हम कोशिश नहीं पूरे प्रयास करेंगे कि उन्हें भी शहीद का दर्जा मिले.” उनके इस बयान को भी आज दो साल से भी अधिक वक्त बीत चुका है.

प्रतीकात्मक फोटो.


शहीद का दर्जा पाने को यह सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहे हैं लड़ाई

नेशनल कोआर्डिनेशन ऑफ एक्स पैरामिलट्री पर्सनल वेलफेयर एसोसिएशन के चेयरमेन और आईजी सीआरपीएफ रिटायर्ड वीपीएस पनवर का कहना है,  “शहीद का दर्जा दिए जाने के मुद्दे पर हमने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की हुई है. हम शाहदत के दोहरे मापदण्ड की लड़ाई लड़ रहे हैं. इस पर केन्द्र सरकार ने हलफनामा देते हुए कहा है कि हम शहीद का दर्जा कैसे दे सकते हैं क्योंकि हमारे पास शहीद के दर्जे की कोई परिभाषा ही नहीं है.”सीमा सुरक्षा बल में कमांडेट रहे सेवानिवृत लईक सिद्दीकी कहते हैं कि, “सेना के जवानों को शहीद का दर्जा ही नहीं डयूटी के दौरान सामान्य मौत होने पर भी बहुत सारी सुविधाएं मिलती हैं. लेकिन बीएसएफ, सीआरपीएफ सहित दूसरी फोर्स के जवानों को आतंकवादियों और नक्सलियों से मुठभेड़ में वीरगति मिलने के बाद भी न तो शहीद का दर्जा मिलता है और न ही उसके परिवार को कोई अतिरिक्त सुविधा.”

वाइस ऑफ मर्टियर्स संस्था के अध्यक्ष विजय कुमार सांगवान का कहना है कि, “हम पैरामिलट्री फोर्स के जवानों को भी शहीद का दर्जा दिए जाने की आवाज उठा रहे है. देश की रक्षा के लिए लड़ने वाले दो लोगों के बीच इस तरह का भेदभाव अच्छा नहीं है. दुश्मन से लड़ते हुए अपनी जान देने वाले सभी जवानों की जिंदगी उनके परिवार वालों के लिए बराबर का दर्जा रखती है.”

फाइल फोटो.


क्या कहते हैं वीरगति को प्राप्त जवान के पिता

दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़ में 2010 को मुठभेड़ में मारे गए निर्वेश कुमार के पिता प्रीतम सिंह का कहना है कि, “सेना दुश्मन से बार्डर पर लड़ती है और पैरामिलिट्री फोर्स का जवान देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए देश के अंदर ही मौजूद दुश्मनों से लड़ता है. लेकिन सरकार इस पर दोहरी नीति अपनाती है. सवाल सुविधाओं का नहीं है. दोनों की ही शाहदत को बराबर का दर्जा मिलना चाहिए. मैं इस लड़ाई को उस वक्त तक लड़ता रहूंगा जब तब मेरे बेटे ही नहीं दूसरे जवानों को भी उनका हक नहीं मिल जाता है.”
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First published: February 14, 2020, 9:09 AM IST
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