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किसान क्यों नहीं छोड़ रहे पराली जलाना? और कितने सालों तक दिल्ली-NCR में घुटेगा दम?

किसान क्यों नहीं छोड़ रहे पराली जलाना? और कितने सालों तक दिल्ली-NCR में घुटेगा दम?

केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट की तमाम कोशिशों के बावजूद भी प्रदूषण के स्तर में क्यों कोई कमी नहीं आ रही है?

केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट की तमाम कोशिशों के बावजूद भी प्रदूषण के स्तर में क्यों कोई कमी नहीं आ रही है?

Air Pollution in Delhi-NCR: केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की तमाम कोशिशों के बावजूद भी प्रदूषण के स्तर (Pollution Level) में कोई कमी नहीं आ रही है. बीते कई सालों से कोर्ट की सख्ती का भी कोई असर अब नहीं दिखता. पड़ोसी राज्यों में अंधाधुंध पराली जलाए जाने से देश की राजधानी गैस चैंबर में तब्दील हो चुकी है. पराली की लपटों और प्रदूषण की वजह से स्कूल, कॉलेज और दफ्तरों को बंद करने की नौबत आखिरकार हर साल क्यों आ जाती है?

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नई दिल्ली. दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) के लोगों को पिछले कुछ सालों से कई मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ रही हैं. घर से निकलते ही परेशानियों से सामना शुरू हो जाता है. इस मौसम में डेंगू-मलेरिया और चिकनगुनिया से तो लोग परेशान रहते ही हैं ऊपर से कोरोना और अब प्रदूषण (Pollution) ने भी अब रुलाना शुरू कर दिया है. केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की तमाम कोशिशों के बावजूद भी प्रदूषण के स्तर (Pollution Level) में कोई कमी नहीं आ रही है. बीते कई सालों से कोर्ट की सख्ती का भी कोई असर अब नहीं दिखता. पड़ोसी राज्यों में अंधाधुंध पराली जलाए जाने से देश की राजधानी गैस चैंबर में तब्दील हो चुकी है. पराली की लपटों और प्रदूषण की वजह से स्कूल, कॉलेज और दफ्तरों को बंद करने की नौबत आखिरकार हर साल क्यों आ जाती है? ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कितने सालों तक प्रदूषण से दिल्ली-एनसीआर वाले और त्रस्त रहेंगे?

दिल्ली के बाबा खड़ग सिंह मार्ग पर रह रहे एक वरिष्ठ अधिकारी का परिवार पिछले कुछ दिनों से काफी परेशान चल रहा है. परिवार की परेशानी का कारण है दिल्ली का प्रदूषण. अधिकारी का परिवार दो साल पहले ही बाबा खड़ग सिंह मार्ग पर शिफ्ट हुआ है. बड़े ही दुखी मन से दंपत्ति न्यूज-18 हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, सोचा था कि 4-5 साल बच्चे की पढ़ाई को लेकर दिल्ली में ही रहें, बुजुर्ग माता-पिता को भी ठंड के मौसम में अपने साथ ही रखें. पर, अब लगता है कि दिल्ली रहने लायक जगह नहीं बची है. नौकरी ऐसी है कि छोड़ कर कर जा भी नहीं सकते.

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पड़ोसी राज्यों में अंधाधुंध पराली जलाए जाने से देश की राजधानी गैस चैंबर में तब्दील हो चुकी है.

दिल्ली-एनसीआर को कब मिलेगा प्रदूषण से निजात?
ये अकेले ऐसे अधिकारी नहीं है, जिन्हें दिल्ली में काम करने का मजा प्रदूषण ने फीका कर दिया है. इनके जैसे कई ऐसे अधिकारी हैं, जो दिल्ली को रहने लायक जगह नहीं मानते पर फिर भी दिल्ली में रहे हैं. इनमें से कुछ अधिकारियों ने तो परिवार के सेहत की चिंता को लेकर या तो दिल्ली छोड़ दिया है या फिर बचने के लिए घर पर कुछ ठोस उपाय कर लिया है. क्योंकि उनके पास पैसा और पावर है. पर आम लोगों के लिए कोई फिक्रमंद नहीं है.

बीमारियों से कब तक लड़ते रहेंगे लोग?
बता दें कि प्रदूषण की वजह से लोगों को सांस की बीमारी, आंख से पानी निकलना, दिल का दौरा और फेफेड़े की बीमारी हो सकती है. प्रदूषण के स्तर को कम करने के बजाय केंद्र और दिल्ली सरकार पिछले एक-दो सालों से एक-दूसरे पर आरोप मढ़ने में लगे हुए हैं. नेशनल ग्रीन ट्रब्यूनल(एनजीटी), केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) की केंद्र और दिल्ली सरकार की फटकार का भी कोई असर नहीं दिख रहा है.

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प्रदूषण की वजह से लोगों को सांस की बीमारी, आंख से पानी निकलना, दिल का दौरा और फेफेड़े की बीमारी हो सकती है.

बाहरी वाहनों का बोझ कब कम होगा?
कुछ साल पहले ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे के चालू होने पर केंद्र सरकार ने कहा था कि इस एक्सप्रेसवे के चालू होने के बाद दिल्ली में 40 प्रतिशत बाहरी वाहनों का बोझ कम जाएगा, जिससे प्रदूषण में भारी गिरावट आएगी. लेकिन, सालों बीत जाने के बाद भी आज दिल्ली-एनसीआर में पिछले साल वाली ही स्थिति पैदा हो जाती है. केंद्र सरकार की तरफ से बड़े-बड़े दावे जो किए गए थे वह दावे टांय-टांय फिस्स साबित हुए हैं.

क्या कहती है यह रिपोर्ट
पर्यावरण पर काम करने वाली कई संस्थाओं और अनुसंधानकर्ताओं का भी मानना है कि ताप विद्युत संयंत्रों से उत्सर्जन में कटौती और घरों में ठोस ईंधन के इस्तेमाल से वायु प्रदूषण में और कमी लाई जा सकती है. कुछ साल पहले ही अमेरिका की लुसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी (एलएसयू) की रिपोर्ट में ऐसे 13 तरीकों के बारे में बताया गया है जिन्हें अमल में लाकर भारत में वायु प्रदूषण की समस्या को 40% तक घटाया जा सकता है. इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इन तरीकों को अगर इस्तेमाल में लाया जाए तो दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत के पीएम 2.5 स्तर को 50 से 60 फीसदी तक कम किया जा सकता है.

प्रदूषण के विभिन्न कारणों से कब तक निपटा जाएगा?
इस रिपोर्ट में प्रदूषण के विभिन्न कारणों से निपटने के लिए बनी नीतियों का विश्लेषण किया गया है जिसमें थर्मल पावर प्लांट (चालू, निर्माणाधीन और नए पावर प्लांट), मैन्यूफैक्चरिंग उद्योग, ईंट भट्ठी, घरों में इस्तेमाल होने वाले ठोस ईंधन, परिवहन, पराली को जलाना, कचरा जलाना, भवन-निर्माण और डीजल जनरेटर का इस्तेमाल जैसी बातें शामिल हैं.

AIR POLLUTION

दिल्ली में प्रदूषण को लेकर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच कोई तालमेल नहीं है.

क्यों तालमेल नहीं बनता है?
इन संस्थाओं का साफ कहना है कि दिल्ली में प्रदूषण को लेकर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच कोई तालमेल नहीं है. समस्या की जड़ तक कोई भी जाने से बचता है. हरियाली की कीमत पर पूरे दिल्ली में कंस्ट्रक्शन, औद्योगिकीकरण और मेट्रो का निर्माण थम नहीं रहा है.

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बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया कि प्रदुषण नियंत्रण के मामले में नौकरशाही का रवैया बेपरवाही वाला है. ब्यूरोक्रेसी कुछ करना नहीं चाहती है और न तो कोई फैसला लेना चाहती है. सब कुछ कोर्ट पर छोड़ना चाहती है. सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि पराली को लेकर किसान को दोष नहीं दे सकते.

Tags: Air Pollution AQI Level, Central government, Central pollution control board, Delhi-NCR Pollution, NGT, Pollution, Supreme Court

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