ब्लैक और वाइट फंगस की चपेट में क्यों आ रहे हैं लोग, डॉक्टर बता रहे कितनी खतरनाक हैं ये? जानें क्या करें, क्या ना करें?

हरियाणा में बढ़ रहे ब्लैक फंगस के मरीज.

हरियाणा में बढ़ रहे ब्लैक फंगस के मरीज.

दोनों ही बीमारियां ब्लैक फंगस और वाइट फंगस दोनों ही बीमारियां बेहद खतरनाक और जानलेवा बताई जा रही हैं. इन दोनों बीमारियों के लक्षण करीब-करीब समान हैं. लेकिन वाइट फंगस शरीर के दूसरे हिस्सों को भी ज्यादा प्रभावित करने वाला बताया जा रहा है. दिल्ली में अब तक 197 महाराष्ट्र में 1500 से ज्यादा मामले ब्लैक फंगस के रिकार्ड किये जा चुके हैं. वही वाइट फंगस के मामले अभी पटना में चार रिकॉर्ड किए गए हैं.

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नई दिल्ली. देश के कई राज्यों में जहां कोरोना (Corona) संक्रमण के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरीके से ध्वस्त कर दिया है. वहीं अब लगातार सामने आ रहे ब्लैक फंगस (Black Fungus) यानी म्यूकोर्मि‍कोसिस (Mucormycosis) बीमारी ने सरकार और प्रशासन को और चिंतित कर दिया है. ब्लैक फंगस के मामले महाराष्ट्र और दिल्ली के अलावा हरियाणा, बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात, उड़ीसा, राजस्थान और मध्य प्रदेश में तेजी से सामने आए हैं.  और अब वाइट फंगस के मामले भी पटना में चार रिकॉर्ड किए गए हैं.

यह बीमारी ज्यादातर उन मरीजों को चपेट में ले रही है जो कि कोविड-19 के इलाज के लिए अस्पतालों में भर्ती हैं. इसके पीछे एक बड़ी वजह लोगों के स्टेरॉयड (Steroids) या एंटीबायोटिक का सेवन ज्यादा करना भी है. इसकी बड़ी वजह उनका ब्लड शुगर लेवल का बढ़ना और इम्युनिटी का कमजोर पड़ना है.

दिल्ली में अब तक जहां 197 मामले ब्लैक फंगस के रिकॉर्ड किए जा चुके हैं. वहीं, महाराष्ट्र में 1500 से ज्यादा मामले अब तक ब्लैक फंगस के रिकार्ड किये जा चुके हैं. महाराष्ट्र में ब्लैक फंगस की वजह से कई लोगों की जान भी जा चुकी है. इस बीमारी के तेजी से हो रहे प्रसार के बाद अब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी वीरवार को इस बीमारी को महामारी (Epidemic) के अंतर्गत Notifiable Disease घोषित करने के लिए भी राज्यों को पत्र लिखा है.

इस बीच देखा जाए तो ब्लैक फंगस बीमारी को लेकर देश के डॉक्टरों में भी अलग-अलग राय है. लेकिर डॉक्टर्स इस बीमारी के तेजी से चपेट में आने के पीछे एकसुर में सबसे बड़ी वजह स्टेरॉयड का ज्यादा सेवन करना बता रहे हैं. साथ ही यह भी कह रहे हैं कि अगर सावधानी बरती जाए तो इसके संक्रमण से बचा जा सकता है. इसको लेकर ज्यादा पैनिक फैलाना भी सही नहीं है. इसका इलाज संभव है.
सर गंगा राम अस्पताल (Sir Ganga Ram Hospital) के ई एन टी विभाग के चेयरमैन डॉ अजय स्वरुप का कहना है कि कोविड-19 (COVID-19) का इलाज करा रहे मरीजों में ब्लैक फंगस के मामले सामने आ रहे हैं. यह उन मरीजों में ही ज्यादा देखने को मिल रहा है जिनको ज्यादा स्टेरॉयड दिया गया है. इसकी वजह से ब्लड शुगर लेवल ऊपर नीचे होने लगता है. जो कोविड पेशेंट पहले से डायबिटीज के मरीज होते हैं और ज्यादा स्टेरॉयड लेते आ रहे हैं, उनका ब्लड शुगर लेवल ऊपर नीचे होने लगता है. यह ब्लैक फंगस का होने का बड़ा कारक बन रहा है.

इससे कोविड-19 पेशेंट की ज्यादा स्टेरॉयड सेवन से इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है. वह ब्लैक फंगस जैसी बीमारी से लड़ने में सक्षम नहीं रह पाते हैं और वह उसकी चपेट में आ जाते हैं. इसके अलावा कोविड मरीजों को दी जाने वाली ऑक्सीजन को लेकर बरती जाने वाली असावधानी भी बड़ा कारक बन रही है.

ऑक्सीजन के लिए जो सिलेंडर पाइप और मास्क आदि यूज किए जाते हैं, उन सभी के लिए डिस्टलरी वाटर यानी साफ पानी बेहद जरूरी होता है. इसमें बरती जा रही लापरवाही भी इस बीमारी के लिए बड़ा कारक बन रही हैं.



डॉ अजय स्वरुप बताते हैं कि इससे बचने के लिए लोगों को कोविड के माइल्ड सिस्टम होने के बाद तुरंत स्टेरॉयड शुरू करना भी ठीक नहीं है. इसको शुरुआती समय के दौरान से लेने की जरूरत नहीं है. डॉ स्वरुप बताते हैं कि ब्लैक फंगस जैसी बीमारी की चपेट में कोविड मरीज 2 से 3 सप्ताह के बाद ही आते हैं. इस सभी के पीछे दूसरी बीमारियों के लिए लिए जा रहे स्टेरॉयड और इस दौरान इलाज में प्रयोग किए जा रहे स्टेरॉयड की वजह से ऐसा हो रहा है.

डॉक्टर स्वरूप बताते हैं कि इस को महामारी घोषित करने से यह स्पष्ट हो सकेगा कि कितनी संख्या में ब्लैक फंगस के मरीज रिकॉर्ड किए जा रहे हैं. इससे उन सभी का रिकॉर्ड राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकृत हो सकेगा और इससे जुड़ी हुई दवाइयां और दूसरी सभी चीजों का उत्पादन व सप्लाई भी सुनिश्चित हो सकेंगी.

Black Fungus पर लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज (Lady Hardinge Medical College) के प्रोफेसर ऑफ मेडिसन और विभागाध्यक्ष एक्सीडेंट एंड इमरजेंसी डॉक्टर अनुपम प्रकाश बताते हैं कि इस बीमारी से घबराने की जरूरत नहीं है. ब्लैक फंगस उसी तरीके से है, जैसे बैड में फफूंदी लग जाती है. इसलिए इस बीमारी से ज्यादा घबराने की और ना ही ज्यादा पैनिक फैलाने की जरूरत है. इसका इलाज संभव है.

डॉक्टर अनुपम बताते हैं कि वातावरण में भी हमेशा ही फफूंदी होती है. इसलिए इससे ज्यादा घबराना नहीं चाहिए. उन्होंने बताया कि यह बीमारी उन सभी पेशेंट को ज्यादा पकड़ रही है जिनको कैंसर, डायबिटीज, जोड़ों में दर्द, गठिया जैसी बीमारियों में पहले से ही स्टेरॉयड दिया जा रहा है. और अब उनको कोविड इलाज में देना पड़ रहा है. इसकी वजह से उनकी बीमारी से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है.

इसके होने के ज्यादा मामले डायबिटीज पेशेंट में देखे जा रहे हैं क्योंकि उनको पहले से ही स्टेरॉयड दिया जा रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि कोविड के 90% मरीज ठीक हो जाते हैं. लेकिन 10 फीसदी मरीज ही अस्पतालों में एडमिट होते हैं. उनमें बीमारी से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है. उसकी वजह से उनको दिए जाने वाले स्टेरॉयड का असर दूसरी बीमारियों की वजह से ब्लैक फंगस जैसी बीमारी के रूप में भी देखने को मिल रहा है.

लेकिन डॉक्टर अनुपम यह भी बताते हैं कि कोविड के जो पेशेंट हैं और गंभीर रूप से अस्पताल में भर्ती हैं जो कि वेंटीलेटर या ऑक्सीजन पर हैं, उनको स्टेरॉयड देना भी जरूरी है. लेकिन यह जरूरी है कि 7 से 10 दिन का अस्पताल के कंट्रोल में इसको दिया जाता है तो यह ज्यादा खतरनाक नहीं होता है. वहीं, 1 दिन बुखार आने के बाद ही इसको लगातार शुरू कर देना ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है.

इलाज के लिये मल्टी स्पेशलिटी टीम का होना बहुत जरूरी 

जाने-माने यूरोलॉजिस्ट और गोयल हास्पिटल के सीएमडी डॉ. अनिल गोयल का कहना है कि ब्लैक फंगस टिशू को डेड कर देता है. इसको ऑक्सीजन करना बेहद जरूरी होता है. यह बीमारी बेहद ही खतरनाक और जानलेवा है. अगर लंग्स में पहुंचती है तो निमोनिया बनाती है. यह बीमारी आंख के माध्यम से दिमाग में घुसती है जिसके चलते मल्टी स्पेशलिटी टीम का इलाज करने के लिए होना बहुत जरूरी है. इसकी वजह से यह इलाज बेहद ही महंगा हो जाता है क्योंकि मरीज को बचाने के लिए सबसे पहले डायग्नोसिस करना जरूरी होता है.

65 किलो वजन वाले मरीज को ठीक करने को लगाने होते हैं करीब 200 से 250 इंजेक्शन

इसलिए इसका इलाज भी बहुत महंगा हो जाता है. एक 65 किलो के वजन वाले मरीज को ठीक करने के लिए कम से कम 200 से 250 इंजेक्शन लगाने होते हैं. वहीं, अभी इसके लिए पर्याप्त मात्रा में दवा और इंजेक्शन आदि भी नहीं है. डॉक्टर गोयल बताते हैं कि यह बीमारी ज्यादातर कोरोना संक्रमण से ठीक होने वाले उन मरीजों में 2 से 3 सप्ताह के बाद देखने को मिलती है जिनकाे अनियंत्रित ब्लड शुगर लेवल और ऑक्सीजन की समस्या रहती है.

वाइट फंगस भी ब्लैक फंगस की तरह ही खतरनाक 

डॉ गोयल का कहना है कि वाइट फंगस (White Fungus) भी ब्लैक फंगस की तरह ही खतरनाक है. इसका ज्यादा असर फेफड़ों और मस्तिष्क पर ही पड़ता है. इसका संक्रमण केवल एक अंग पर नहीं बल्कि फेफड़ों और ब्रेन से लेकर हर अंग पर पड़ता है. इसका असर शरीर के नाखून, स्किन, ब्रेन, किडनी, मुंह के साथ फेफड़ों को भी संक्रमित कर सकता है. लंग्स पर असर पड़ने के कारण इसके लक्षण कोरोना से लगभग समान होते हैं. वहीं, इसके भी ज्यादा चपेट में आने की वजह इम्यूनिटी का कमजोर होना और दूसरी बीमारियों जैसे कैंसर, डायबिटीज में स्टेरॉयड आदि लगातार लेते रहना ही है.

जाने-माने यूरोलॉजिस्ट और गोयल हास्पिटल (Goyal Hospital) के सीएमडी डॉ. अनिल गोयल का कहना है कि ब्लैक फंगस टिशू को डेड कर देता है. इसको ऑक्सीजन करना बेहद जरूरी होता है. यह बीमारी बेहद ही खतरनाक और जानलेवा है. अगर लंग्स में पहुंचती है तो निमोनिया बनाती है. यह बीमारी आंख के माध्यम से दिमाग में घुसती है जिसके चलते मल्टी स्पेशलिटी टीम का इलाज करने के लिए होना बहुत जरूरी है. इसकी वजह से यह इलाज बेहद ही महंगा हो जाता है क्योंकि मरीज को बचाने के लिए सबसे पहले डायग्नोसिस करना जरूरी होता है.

इसलिए इसका इलाज भी बहुत महंगा हो जाता है. एक 65 किलो के वजन वाले मरीज को ठीक करने के लिए कम से कम 200 से 250 इंजेक्शन लगाने होते हैं. वहीं, अभी इसके लिए पर्याप्त मात्रा में दवा और इंजेक्शन आदि भी नहीं है. डॉक्टर गोयल बताते हैं कि यह बीमारी ज्यादातर कोरोना संक्रमण से ठीक होने वाले उन मरीजों में 2 से 3 सप्ताह के बाद देखने को मिलती है जिनकाे अनियंत्रित ब्लड शुगर लेवल और ऑक्सीजन की समस्या रहती है.

AIIMS ने भी जारी किये दिशा-निर्देश

नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) ने ब्लैक फंगस मरीजों के संक्रमण को देखते हुए कुछ दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं जिससे कि इस संक्रमण की पहचान की जा सकती है. मरीजों को क्या कदम उठाने हो इसके बारे में भी बताया है.

ब्लैक फंगस संक्रमण के ये होते ह‍ैं खास लक्षण

-नाक से काला द्रव्य या खून की पपड़ी निकलना.

-नाक का बंद होना.

-सिर दर्द या आंखों में दर्द.

-आंखों के आसपास सूजन आना, धुंधला दिखना, आंखें लाल होना, आंखों की रोशनी जाना, आंखें खोलने और बंद करने में परेशानी महसूस करना.

-चेहरा सुन्न हो जाना, चेहरे में झुर्झुरी महसूस करना.

-मुंह खोलने या किसी चीज को चबाने में परेशानी होना आदि‌.

-इसके अलावा यह भी बताया है कि अपने चेहरे का निरीक्षण करते रहें. और देखते रहे कि चेहरे पर कोई सूजन खासकर नाक, आंख या गाल पर तो नहीं है या फिर किसी हिस्से को छूने पर दर्द हो रहा हो.

-इसके अतिरिक्त दांत गिर रहे हो या मुंह के अंदर सूजन या काला भाग दिखे तो इस पर सतर्क रहें.

ब्लैक फंगस होने के डर की स्थिति पर क्या करें 

-ब्लैक फंगस की जांच के बाद कुछ भी शक हो तो तुरंत आंख, नाक, गला यानी ईएनटी डॉक्टर से संपर्क करें.

-डॉक्टर की सलाह के मुताबिक ही उपचार करवाएं.

-ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखने का पूरा प्रयास किया जाए.

-किसी अन्य गंभीर बीमारी से ग्रसित हो तो उनकी दवाई का लगातार सेवन करते रहे.

-अपने आप किसी भी तरह की दवा का सेवन ना करें.

-डॉक्टर सलाह दें तो एमआरआई या सीटी स्कैन करवाएं

बताया जाता है कि ऐसे कोरोना मरीज जिनका शुगर कंट्रोल नहीं रहता है. वहीं, कैंसर का इलाज चल रहा है, अन्य किसी रोग के लिए स्टेरॉयड या एंटीबायोटिक दवा का ज्यादा मात्रा में सेवन कर रहे हों या फिर ऑक्सीजन सपोर्ट पर हो तो उन्हें ब्लैक फंगस होने का खतरा ज्यादा रहता है.

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