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...तो जनता को नहीं डालनी पड़ती इतनी RTI
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ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: October 12, 2017, 6:01 PM IST
...तो जनता को नहीं डालनी पड़ती इतनी RTI
किसी भी विभाग में नहीं हो रहा आरटीआई एक्ट का पालन

किसी विभाग के पास जो भी सूचना है उसे स्कैन करवाकर ऑनलाइन करने का आरटीआई एक्ट 2005 की धारा 4 में प्रावधान है.

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  • Last Updated: October 12, 2017, 6:01 PM IST
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सूचना अधिकार अधिनियम से आम आदमी सशक्त हुआ है, लेकिन इससे नेता और नौकरशाह काफी परेशान हैं. नौकरशाह कह रहे हैं कि आरटीआई के सवालों में वह उलझे रहते हैं. इससे काम प्रभावित हो रहा है. जबकि यदि वे यदि इस एक्ट के सिर्फ एक प्रावधान को अपने विभाग में लागू कर दें तो जनता को बात-बात पर आरटीआई डालने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा.

सुप्रीम कोर्ट के वकील पद्मश्री ब्रह्मदत्त कहते हैं कि ‘किसी विभाग के पास जो भी सूचना है उसे स्कैन करवाकर ऑनलाइन करने का आरटीआई एक्ट 2005 की धारा 4 में प्रावधान है. लेकिन कोई भी विभाग ऐसा नहीं कर रहा. अगर विभाग प्रमुख या उसका मंत्री सारी सूचनाएं ऑनलाइन करवा दे तो लोग आरटीआई क्यों डालेंगे?’

आरटीआई को लेकर काम करने वाले एडवोकेट ब्रह्मदत्त ने बताया कि उन्होंने सूचना आयोग हरियाणा की फुल बेंच के पास 31 विभागों के सूचना अधिकारियों के खिलाफ धारा 4 पर बरती जाने वाली लापरवाही को लेकर शिकायत लगाई थी. सुनवाई में उनसे मांगा कि आपने अपने विभाग की वेबसाइट पर जो भी सूचनाएं दी हैं उसकी जानकारी दीजिए.

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जानकारी मिली, लेकिन जब उसकी पड़ताल की गई तो पता चला कि 40-45 फीसदी जानकारी ही ऑनलाइन की गई हैं, बाकी छिपा ली गई है. इसके लिए केंद्रीय सूचना आयुक्त को भी पत्र लिखा है. वह जानकारी छिपा ली जाती है, जिससे किसी के फंसने का डर हो. खुलासे का डर हो.

सूचना अधिकार कार्यकर्ता रविंद्र चावला कहते हैं कि ‘विभागों की वेबसाइट पर आधी अधूरी सूचनाएं डाली गईं हैं. इसलिए लोग आरटीआई डाल रहे हैं. इससे न सिर्फ जनता का पैसा बर्बाद हो रहा है बल्कि संबंधित अधिकारी, कर्मचारी जवाब देने में परेशान रहते हैं. अधिकारी सारी सूचनाएं पब्लिक डोमेन में डाल दें फिर देखें कि आरटीआई का प्रेशर कम होता है या नहीं. ऐसा करने से यह होगा कि जिसे जो सूचना चाहिए वह उस विभाग की वेबसाइट से निकलवा लेगा. इससे सूचना लेने में आरटीआई जितना वक्त नहीं लगेगा.’

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आरटीआई कार्यकर्ता अभय जैन कहते हैं कि ‘हर विभाग में आईटी के लिए बजट आता है. उसके तहत उसे पुराना रिकॉर्ड भी स्कैन करवाकर ऑनलाइन करना चाहिए. अगर कोई व्यक्ति किसी अधिकारी के वेतन के बारे में सूचना चाहता है तो उसे आरटीआई लगाने की जरूरत क्यों पड़े.

‘जब हर विभाग के लेन-देन का ऑडिट होता है तो फिर यह जानकारी ऑनलाइन क्यों नहीं डाली जाती.सभी कर्मचारियों, अधिकारियों के सर्टिफिकेट और उनकी संपत्ति की जानकारी वेबसाइट पर क्यों नहीं अपलोड की जाती. पीएम या सीएम रक्षा और विदेश मामलों को छोड़कर अपने अन्य सारे फैसले क्यों नहीं ऑनलाइन करते’.

Right to Information            Right to Information act

जैन कहते हैं कि ‘चुनाव लड़ते वक्त जैसे नेता अपनी संपत्ति और पढ़ाई-लिखाई का ब्योरा चुनाव आयोग को देते हैं उसी तरह नौकरशाहों का रिकॉर्ड और रिपोर्ट कार्ड भी ऑनलाइन किया जाना चाहिए. फिर आरटीआई डालने का झंझट ही खत्म हो जाएगा.’

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First published: October 12, 2017, 6:01 PM IST
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