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आखिर दिल्ली में CM फेस देने से क्यों बच रही है बीजेपी?

Anil Rai | News18Hindi
Updated: January 3, 2020, 12:33 PM IST
आखिर दिल्ली में CM फेस देने से क्यों बच रही है बीजेपी?
पिछले कुछ दिनों में दिल्ली में BJP के जिन तीन नामों की सबसे ज्यादा चर्चा है, उनमें मनोज तिवारी सबसे ज्यादा चर्चित हैं.

दिल्ली विधानसभा चुनाव (Delhi Assembly Elecdtion) में BJP किस रणनीति के तहत काम करेगी, इसके बारे में समझने की एक कोशिश.

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  • Last Updated: January 3, 2020, 12:33 PM IST
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नई दिल्ली. दिल्ली विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है. चुनाव आयोग किसी भी दिन राज्य में चुनाव की तारीखों का ऐलान कर सकता है. लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने अब तक दिल्ली में मुख्यमंत्री के चेहरे का ऐलान नहीं किया है. सूत्रों की मानें तो बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व दिल्ली विधानसभा का चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के चेहरे पर लड़ने की तैयारी में हैं. यही वो कारण है कि पार्टी के प्रवक्ता और दिल्ली जे जुड़े नेता स्थानीय मुद्दों की बजाय CAA, NPA जैसे राष्ट्रीय मुद्दों को जोर शोर से उठा रहे हैं.

ये है CM फेस ना सामने लाने की असली वजह
बीजेपी के चुनावी इतिहास को देखें तो 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी के शपथ के बाद पार्टी ने जहां भी सीएम फेस पर चुनाव लड़े उसमें ज्यादातर में उसे हार का सामना करना पड़ा. 2014 में जहां महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड जैसे राज्यों में बिना सीएम का चेहरा सामने लाए बीजेपी चुनाव लड़ी वहां सत्ता में पहुंच गई. लेकिन जैसे ही दिल्ली में बीजेपी किरण बेदी जैसा दमदार चेहरा लेकर सामने आई तो सिर्फ 3 सीटों पर ही सीमट गई. गोवा और उत्तर पूर्व के राज्यों में जहां बीजेपी ने बिना किसी सीएम चेहरे के चुनाव लड़ा और जीत का झंडा फहरा दिया. हालांकि त्रिपुरा जैसे छोटे राज्य अपवाद के रूप में हैं जहां सीएम फेस के साथ बीजेपी चुनाव लड़ी और जीत गई. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में 2017 में हुए विधानसभा चुनाव बीजेपी ने बिना किसी मुख्यमंत्री के चेहरे के चुनाव लड़ा और उम्मीद से ज्यादा 325 सीटें जीत लीं.

बीजेपी के लिए सीएम फेस का दांव पड़ जाता है उल्टा

अगर 2014 के बाद के विधानसभा चुनाव के परिणामों पर नजर डालें, तो साफ दिखेगा कि मुख्यमंत्री का चेहरा सामने आने के बाद बीजेपी की चुनावी विसात जैसे अपने आप में उलझ जाती है. पहले दिल्ली, उसके बाद कर्नाटक, फिर राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, और उसके बाद महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड जैसे राज्य बीजेपी के हाथ से जाते रहे. हलांकि इस बीच गुजरात में बीजेपी सीएम के चेहरे के साथ भी चुनाव जीती लेकिन राजनीतिक जानकारों का कहना है कि गुजरात में प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के चेहरे के सामने और किसी चेहरे की चर्ची ही नहीं होती. इन चुनावों में कर्नाटक में जहां बीजेपी ने बाद में जोड़-तोड़ कर सत्ता में वापसी कर ली वहीं हरियाणा में नया सहयोगी तलाश कर सत्ता बचा ली. लेकिन बाकी राज्यों में सत्ता बीजेपी के हाथ से जाती रही. आंकड़े साफ गवाही दे रहे हैं कि बीजेपी जब भी सीएम फेस लेकर चुनाव मैदान में तो उसका फायदे से ज्यादा नुकसान होता है.

पार्टी का एक धड़ा अब भी चाहता है सीएम फेस
इन सबके बाद भी पार्टी के एक धड़ा चाहता है कि दिल्ली में सीएम फेस सामने करके चुनाव लड़ा जाए. इसमें हर धड़े का अपना तर्क है. मनोज तिवारी को सीएम फेस बनाने की मांग करने वालों का तर्क है कि मनोज तिवारी का चेहरा सामने आने से पुरबिया मतदाता बीजेपी के साथ आ जाएगा. जबकि हर्षवर्धन और विजय गोयल को सीएम फेस बनाने वाले पार्टी कैडर और दिल्ली के वोटरों का मुद्दा उठा रहे हैं. दूसरी ओर बीजेपी अध्यक्ष और केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह के 26 दिसम्बर के केजरवाल को प्रवेश वर्मा बहस की चुनौती के बाद प्रवेश वर्मा का नाम भी तेजी से चर्चा में आ गया है. हालंकि का बड़ा तबका बिना सीएम फेस के चुनाव लड़ना चहता है. इस धड़े का मानना है कि किसी एक चेहरे को सीएम फेस घोषित कर देने से पार्टी में गुटबाजी बढ़ जाती है. जिस धड़े का सीएम फेस घोषित नहीं होता वह उस उत्साह से चुनाव नहीं लड़ता जैसे लड़ना चाहिए. इस धड़े का दावा है कि अगर पार्टी सीएम के चेहरा सामने नहीं लाती तो पार्टी का हर कार्यकर्ता मजबूती से चुनाव लड़ेगा और पार्टी में गुटबाजी भी रोकी जा सकती है.

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First published: January 3, 2020, 12:33 PM IST
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