चिराग पासवान ने बीजेपी के साथ क्यों नहीं लड़ा बिहार विधानसभा चुनाव? आज किया खुलासा...

चिराग पासवान ने बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी के साथ गठबंधन क्यों नहीं किया। इसका खुलासा किया है.

चिराग पासवास ने बिहार चुनाव होने के बाद 8 महीने बाद बताई वजह कि उन्हाेंने बीजेपी और राजग के साथ क्यों गठबंधन नहीं किया. अगर मैं जेडीयू, बीजेपी से मिलकर चुनाव लड़ता तो मुझे सिद्दांतों से समझौता करना पड़ता और नीतीश कुमार के समाने नतमस्तक होना पड़ता.

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    नई दिल्ली. लोक जनशक्ति पार्टी में बिखराव के बाद अकेले पड़ चुके चिराग पासवान ने आज दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके दावा किया है कि उनका समूह ही असली लोजपा है, जिसकी स्थापना चिराग के पिता रामविलास पासवान ने की थी. हालांकि इस बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने लोकसभा में लोक जनशक्ति पार्टी के संसदीय दल के नेता के रूप में पशुपति कुमार पारस को मान्यता दे दी है. और चिराग पासवान से बगावत कर पशुपति कुमार पारस को अपना नेता मानने वाले पांचों सांसदों को बर्खास्त कर दिया है. स्पीकर ओम बिरला के इस फैसले पर चिराग पासवान ने विरोध जताया है. चिराग का कहना है कि ये उनके संगठन के नियमों के खिलाफ है. उन्होंने अपने पार्टी के संविधान और उसके नियमों की दुहाई भी दी है.

    कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने पिता समान बताने वाले चिराग पासवान ने बिहार चुनाव में राजग के साथ गठबंधन क्यों नहीं किया था. इस पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलासा करते हुए चिराग पासवान ने कहा, "कुछ मुद्दों को लेकर हम एनडीए गठबंधन के साथ बिहार मे आगे नहीं बढ़ सके. जब पापा थे तो कुछ लोगों के द्वारा एलजेपी को तोड़ने का प्रयास हुआ. पापा जब अस्पताल में थे, मुझसे कहा और चाचा से कहा कि मीडिया में क्यों खबर आती हैं कि पार्टी टूट रही है. अगर मैं जेडीयू, बीजेपी से मिलकर चुनाव लड़ता तो मुझे सिद्दांतों से समझौता करना पड़ता और नीतीश कुमार के समाने नतमस्तक होना पड़ता. ना मैं झुका और ना समझौता किया.





    हमने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया 

    चिराग पासवान ने बिहार चुनाव के ठीक पहले हुए घटनाक्रम के बारे में कहा कि "कुछ समय से मेरी तबियत ठीक नहीं चल रही थी. जो घटनाचक्र घटा वो मेरे लिये भी कठिन हो रहा था. सबने देखा 8 अक्टूबर को मेरे पिता जी का निधन हुआ. उसके बात तुरंत चुनाव मे उतरने का निर्णय हुआ, मेरे लिये कठिन समय था. वो एक महीना 35 दिन का समय, वैसे सोचने का समय ही नहीं मिल पाया. चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) को बड़ी जीत मिली. 25 लाख वोट एलजेपी को मिला और जनता का बड़ा समर्थन मिला. हमने सिद्धांतो से समझौता नहीं किया." बता दें कि राजग से गठबंधन न करने और नीतिश कुमार के खिलाफ होने का नतीजा उनके लिये सुखद नहीं रहा. बिहार विधानसभा चुनाव में लोजपा को महज एक सीट से संतोष करना पड़ा था.

    मेरे पीठ पीछे चल रही थी साजिश

    चिराग ने आगे कहा, "कुछ लोग संघर्ष के रास्ते पर चलने पर तैयार नहीं थे, उसमे मेरे चाचा ने चुनाव-प्रचार में कोई भूमिका नहीं निभाई. वीणा जी का बेटा खुद दूसरे पार्टी से चुनाव लड़ रहा था. जब चुनाव समाप्त हुए और मुझे कुछ समय चाहिये था और उसके बाद कोरोना प्रोटोकॉल लगा और फिर मुझे टाइफाइड हो गया. जब मैं बीमार था और मेरे पीठ पीछे षडयंत्र रचा गया इसका मुझे दुख है. मैंने चाचा से संपर्क भी करने की कोशिश की. संवादहीनता नहीं होनी चाहिए. फिर होली के दिन मैंने उनको पत्र लिखा. उस पत्र मे यही लिखा कुछ भी है तो बात तो कीजिए आप. मैं चाचा के घर भी गया, वहां भी कोशिश की. मम्मी भी चाचा से संपर्क साधने का 15 दिन से प्रयास कर रही हैं."

    बिहार की राजनीति को क़रीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर मानते हैं कि इस बंटवारे की एक वजह बागी पक्ष की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं हैं. वह कहते हैं, “राम विलास पासवान ने जिस तरह राष्ट्रीय स्तर पर एक चर्चित दलित नेता की छवि अख़्तियार की थी, उसे देखकर लगता था कि अब उनके दल में उन जैसा दूसरा नेता नहीं होगा. और जब तक उनके हाथ में शक्ति रही तब तक उनके परिवार में किसी की उनसे ऊंची आवाज़ में बहस करने की मजाल नहीं थी. रामविलास जी भी पूरी मुस्तैदी से परिवार के सभी सदस्यों का ख्याल रखते थे. पशुपति पारस को विधायक से सांसद तक रामविलास जी ही पहुंचाए हैं. इसके चलते उन पर अक्सर एक आरोप लगता था कि एलजेपी एक परिवार की पार्टी है."

    मणिकांत ठाकुर आगे कहते हैं, "रामविलास जी इस बात से कभी हिचकिचाते नहीं थे. बल्कि वे खुलकर इसका बचाव करते थे. लेकिन उनके जाने के बाद से जिस तरह पार्टी की बागडोर और चुनावी फैसले लेने की ज़िम्मेदारी चिराग़ पासवान के कंधों पर आई, जिस तरह से फैसले लिए गए, उससे परिवार में असंतोष के भाव पनपने शुरू हुए हैं. अब इन लोगों ने ये देखा कि ये (चिराग़ पासवान) जो चाहेंगे वह करेंगे. रामविलास जी के भाई रामचंद्र पासवान के बेटे प्रिंस राज की महत्वाकांक्षाएं चिराग़ पासवान जैसी ही हैं. ऐसे में पशुपति कुमार पारस से लेकर प्रिंस राज समेत अन्य लोगों, जो कि रामविलास जी के पीछे चलने के लिए राज़ी थे, को चिराग़ पासवान के पीछे चलना मंजूर नहीं है.”

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