लाइव टीवी

जब महार रेजीमेंट ने पेशवा सेना को हराया...पढ़िए भीमा-कोरेगांव युद्ध की पूरी कहानी!
Maharashtra-Assam News in Hindi

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: January 1, 2020, 10:48 AM IST
जब महार रेजीमेंट ने पेशवा सेना को हराया...पढ़िए भीमा-कोरेगांव युद्ध की पूरी कहानी!
भीमा-कोरेगांव की कहानी 202 साल पहले 1818 में हुए एक युद्ध से जुड़ी है.

प्रोफेसर रतन लाल कहते हैं कि पुणे के पास भीमा नदी के तट पर उस दिन जो हुआ था, उसका सिर्फ राजनीतिक और रणनीतिक महत्व नहीं है. उस दिन उस मैदान में सिर्फ अंग्रेज और पेशवा नहीं लड़ रहे थे. वहां जातिवाद के खिलाफ भी एक महासंग्राम हुआ था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 1, 2020, 10:48 AM IST
  • Share this:
नई दिल्ली. यह कहानी है 202 साल पहले 1 जनवरी, 1818 को हुए एक युद्ध की. जब मराठा सेना महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में अंग्रेजों से हार गई थी. दावा किया जाता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी को महार रेजीमेंट के सैनिकों की बहादुरी की वजह से यह जीत हासिल हुई थी. ऐसे में यह जगह पेशवाओं पर महारों यानी अनुसूचित जातियों की जीत के एक स्मारक के तौर पर स्थापित हो गई. इसीलिए दलित समुदाय के लोग भीमा कोरेगांव में हर साल बड़ी संख्या में जुटकर उन सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने पेशवा की सेना के खिलाफ लड़ते हुए अपने प्राण गंवाए थे.

वहां जातिवाद के खिलाफ भी एक महासंग्राम हुआ था: रतनलाल 

दलित चिंतक और दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर रतन लाल कहते हैं कि पुणे के पास भीमा नदी के तट पर उस दिन जो हुआ था, उसका सिर्फ राजनीतिक और रणनीतिक महत्व नहीं है. उस दिन उस मैदान में सिर्फ अंग्रेज और पेशवा नहीं लड़ रहे थे. वहां जातिवाद के खिलाफ भी एक महासंग्राम हुआ था. इस लड़ाई में अछूत मानी जाने वाले महार ​जाति के सैनिकों ने जातिवादी पेशवाई को हमेशा के लिए नेस्तनाबूद कर दिया. भारतीय समाज को लोकतांत्रिक और मानवीय बनाने में इस युद्ध ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

भीमा-कोरेगांव युद्द की कहानी


 

प्रो. रतनलाल के मुताबिक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया की 500 सैनिकों की एक छोटी कंपनी ने, जिसमें ज्यादातर सैनिक महार (दलित) थे, पेशवा शासक बाजीराव द्वितीय की 28,000 हजार की सेना को महज 12 घंटे चले युद्ध में पराजित कर दिया था. कोरेगांव के मैदान में जिन महार सैनिकों ने लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की, उनके सम्मान में सन 1822 ई. में भीमा नदी के किनारे काले पत्थरों के रणस्तंभ का निर्माण किया गया, जिन पर उनके नाम खुदे हैं. इस घटना को देश भर के दलित अपने इतिहास का एक वीरतापूर्ण प्रकरण मानते हैं. बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी यहां पहुंचकर शहीदों को श्रद्धांजलि दी थी.

1 जनवरी 2018 को क्या हुआ? एक जनवरी, 2018 को पुणे से करीब 40 किलोमीटर दूर भीमा-कोरेगांव में अनुसूचित जाति समुदाय के लोगों का एक कार्यक्रम आयोजित हुआ था, जिसका कुछ दक्षिणपंथी संगठनों ने विरोध किया. इसके बाद हिंसा भड़क गई थी. भीमा-कोरेगांव महाराष्ट्र के पुणे जिले में है.

Bhima Koregaon Anniversary, भीमा कोरेगांव की बरसी, bhima koregaon, 1 january 2020, bhima koregaon images, भीमा कोरेगांव, koregaon bhima, कोरेगांव भीमा का युद्ध, bhima koregaon history, bhima koregaon news, महाराष्ट्र, दलित, ईस्ट इंडिया कंपनी, maharashtra, dalit, east india company, Battle of Koregaon
मराठाओं पर दलितों की जीत का प्रतीक है भीमा-कोरेगांव (फाइल फोटो)


दलितों के लिए महत्व!  

इस लड़ाई को अनुसूचित जातियों के इतिहास में एक खास जगह मिल गई. अनुसूचित जाति के लोग इस लड़ाई में अपनी जीत मानते हैं. उनके मुताबिक इस लड़ाई में अनुसूचित जातियों के खिलाफ अत्याचार करने वाले पेशवा की हार हुई थी.

अनुसूचित जाति के चिंतक और मेरठ यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सतीश प्रकाश के मुताबिक 'भीमा-कोरेगांव की लड़ाई में अंग्रेजों की ओर से लड़ने वाले ज्यादातर सैनिक महाराष्ट्र की अनुसूचित जाति (महार जाति) से ताल्लुक रखते थे. महार शिवाजी के समय से ही मराठा सेना का हिस्सा रहे थे, लेकिन बाजीराव द्वितीय ने अपनी ब्राह्मणवादी सोच की वजह से उनको सेना में भर्ती करने से इनकार कर दिया था.'

इस जीत की वजह से ही हर साल जब 1 जनवरी को दुनिया भर में नए साल का जश्न मनाया जाता है उस वक्त अनुसूचित जाति समुदाय के लोग भीमा-कोरेगांव में जमा होते है. वो यहां 'विजय स्तंभ' के सामने अपना सम्मान प्रकट करते हैं. ये विजय स्तंभ ईस्ट इंडिया कंपनी ने उस युद्ध में शामिल होने वाले लोगों की याद में बनाया था.

डॉ. सतीश प्रकाश के मुताबिक, 'भीमा-कोरेगांव अनुसूचित जातियों के सामाजिक आंदोलन के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उन्हें पता चलता है कि वो भी कभी योद्धा थे. क्योंकि उनकी इस पहचान को लगभग मिटा दिया गया है. अनुसूचित जातियों का मूवमेंट इस वक्त दो तरह से चल रहा है. पहले वो जिसमें यह माना जाता है कि कुछ ऊंची जातियां उनके कष्टों का कारण हैं.

दूसरा वो जिसे अनुसूचित जाति का युवा फॉलो कर रहा है. जिसमें वो भीमा कोरेगांव जैसे अपने शौर्य के प्रतीकों के साथ आगे बढ़ रहे हैं. जिसमें वो चमार रेजीमेंट को बहाल करने की मांग करते हैं. जिसमें वो पारंपरिक शैली से इतर आक्रामक और अपने गौरवशाली इतिहास के सहारे अपनी लाइन को बड़ी करने में जुटे हुए हैं.'

ये भी पढ़ें:  देखते भारत के किसानों को बर्बाद कर देता है ये पाकिस्तानी दुश्मन!

भाजपा ही नहीं सपा-बसपा के लिए भी चुनौती हैं ‘लखनऊ’ की ये मुस्कुराती प्रियंका गांधी! 

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए maharashtra से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: January 1, 2020, 10:36 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर