पश्चिम बंगाल में इतना सन्नाटा क्यों?
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पश्चिम बंगाल में इतना सन्नाटा क्यों?
पश्चिम बंगाल में क्‍यों शांत हैं ममता बनर्जी.

मोदी के खिलाफ हर कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे की रैली के निमंत्रण पर भी साफ-साफ कुछ नहीं बोलीं. जबकि राज ठाकरे ममता के बुलाने पर खुद मुम्बई से कोलकता पहुंचे थे.

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  • Last Updated: August 1, 2019, 12:33 PM IST
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पिछले कई दिनों से पश्चिम बंगाल से कोई बड़ी राजनीतिक खबर नहीं आ रही है. यहां तक कि तीन तलाक बिल पास होने के बाद भी दीदी ने कोई बड़ा बयान नहीं दिया तो क्या बंगाल में राजनीतिक शांति आ गई है या ये शांति तूफान से पहले की खामोशी है. पश्चिम बंगाल में 2021 में विधानसभा चुनाव होने हैं लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले शुरु हुई राजनैतिक सरगर्मी को बीजेपी शांत नहीं होने देना चाहती. पार्टी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के साथ-साथ सदस्यता अभियान के बहाने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवराज चौहान भी आजकल पश्चिम बंगाल में कैप कर रहे हैं.

इतनी शांत क्यों हैं ममता बनर्जी
मोदी के खिलाफ हर कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे की रैली के निमंत्रण पर भी साफ-साफ कुछ नहीं बोलीं. जबकि राज ठाकरे ममता के बुलाने पर खुद मुम्बई से कोलकता पहुंचे थे. रैली का मुद्दा भी ममता बनर्जी का पसंदीदा विषय बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग का है. रैली के लिए सीधे हां करने की बजाय ममता ने यहां सरकारी कार्यक्रमों का हवाला देते हुए जबाब देने के लिए समय मांग लिया. साफ है ममता फिलहाल सीधे-सीधे कुछ बोलने से बच रही है.

ममता ने बदला राजनीति का तरीका



ममता बनर्जी को जानने वाले इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि ममता जवाब देने में इतना वक्त नहीं लगातीं. ममता की राजनीति शुरू से आक्रामक रही है. क्या ममता अब राजनीतिक बिसात पर मोहरे चलने से पहले किसी की सलाह ले रही हैं. इसका जवाब तलाशना मुश्किल नहीं है क्योंकि लोकसभा चुनाव में अपना किला ध्‍वस्त होता देखा ममता ने अपना राजनीतिक अंदाज बदल दिया है. जय श्रीराम के नारे पर नाराज होने वाली ममता भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा में मुख्य अतिथि बनीं और वो भी अपनी मुस्लिम सांसद नुसरत जहां के साथ.



ये है ममता के शांत होने की असली वजह
ममता बनर्जी के करीबी लोगों का दावा है कि जबसे प्रशांत किशोर ममता के सलाहकार के रुप में आए हैं तब से उन्होंने ममता को बीजेपी के ट्रैप से दूर रहने की सलाह दी है. इसमें पहली सलाह हर विवादित मुद्दे पर बयान देने से पहले उसका फायदा और नुकसान का आकलन करने की है. साथ ही ममता को हर मुद्दे पर अपने मोर्चा संभालने की बजाय पार्टी के और नेताओं को आगे करने की है. यही वो सबसे बड़ा कारण है जिसके कारण ममता फिलहाल शांत नजर आ रही हैं. तीन तलाक बिल के मुद्दे पर भी ममता की बजाय उनकी पार्टी के दूसरे नेता मीडिया के सामने आए.

मैदान में दोनों पार्टी आमने-सामने
भले ही ममता शांत हों लेकिन मैदान पर मुकाबला जारी है. बीजेपी के सदस्यता अभियान के मकाबले टीएमसी ने  “दीदी के बोलो ” अभियान चला रखा है. पार्टी नेताओं का दावा है कि अभियान शुरु होने के दो दिन के भीतर 2 लाख से ज्यादा लोगों को फोन आया है. इस अभियान के तहत पार्टी के नेता 100 दिनों में 10 हजार गांवों में रात गुजारेगें. जबकि बीजेपी के सदस्यता अभियान में अब तक 38 लाख से ज्यादा फार्म जमा हो चुके हैं. यानि विधानसभा चुनाव भले ही 2021 में होने हैं लेकिन बीजेपी और टीएमसी दोनों अभी से तैयारी में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते.

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