यमुना की व्यथा

ater Pollution: यमुना जैसी कई नदियों का प्रदूषण बहुत ज्यादा बढ़ गया है.

ater Pollution: यमुना जैसी कई नदियों का प्रदूषण बहुत ज्यादा बढ़ गया है.

यमुना नदी में प्रदूषण सामान्य से कहीं ज्यादा बढ़ गया है. यह नदी दिल्ली समेत जहां से भी गुजरती है, वहां का सारा कचरा इसमें बहा दिया जाता है. इन कचरों में सबसे प्रमुख है प्लास्टिक वेस्ट और अनट्रीटेड सीवेज जो धड़ल्ले से यमुना नदी में छोड़ दिया जाता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 28, 2021, 10:29 AM IST
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नई दिल्ली. यमुना नदी हिमालय की गोद से उत्पन्न हुई गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी के रूप में विख्यात है. यमुनोत्री नामक ग्लेशियर से निकलने वाली यह नदी उत्तराखंड और दिल्ली होते हुए त्रिवेणी संगम प्रयागराज में मिलती है. यमुना नदी न केवल गंगा की एक सहायक नदी के रूप में लोकप्रिय है, बल्कि धार्मिक कोण से भी बहुत प्रसिद्ध है. यमुना नदी से जुड़े कई त्योहार और व्रत सदियों से निभाए जाते रहे हैं. लेकिन आज के समय में, यमुना, जिसकी इतनी ख्याति है वही प्रदूषण का सबसे बुरा सामना कर रही है.

यमुना जैसी कई नदियों का प्रदूषण स्तर सामान्य से कहीं ज्यादा बढ़ गया है. यह नदियां जिन शहरों और गांव से बहती हैं वहां के जलस्तर को सुचारू रूप से चलायमान रखती है और खेती के लिए पर्याप्त पोषण प्रदान करती हैं. मगर यमुना का प्रदूषण कई कारणों से बढ़ता ही जा रहा है. यमुना नदी दिल्ली के जलग्रहण क्षेत्र में स्थित है और दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों का सारा कचरा इस नदी में बहा दिया जाता है. इन कचरों में सबसे प्रमुख है प्लास्टिक वेस्ट और अनट्रीटेड सीवेज जो धड़ल्ले से यमुना नदी में छोड़ दिया जाता है.

यमुना नदी में जाने वाला कचरा मूल रूप से डिटर्जेंट और घरेलू इस्तेमाल किए गए रसायनों से भरा होता है. सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के बावजूद, कई बार खराब सिस्टम या बिजली की खराबी के कारण, अनुपचारित सीवेज नदी में छोड़ दिया जाता है. खुले नालों में फेंके गए प्लास्टिक के कचरे, बड़े औद्योगिक घरानों से निकलने वाले औद्योगिक कचरे, ये सभी यमुना में पाए जाते हैं जो नदी के भारी धातु विषाक्तता के जोखिम को बढ़ाते हैं.


कई त्योहारों में, मूर्तियों को नदियों में विसर्जित किया जाता है. इन मूर्तियों को यमुना में भी विसर्जित किया जाता है, जिससे लेड और क्रोमियम से बने पेंट पानी में घुल जाते हैं और इसकी विषाक्तता बढ़ जाती है।. यही पानी जब कृषि प्रयोग में लाया जाता है तो हैवी मेटल टॉक्सिसिटी वाली सब्जियों के कारण लिवर, किडनी आदि की अनेकानेक बीमारियों की जड़ बन जाता है. लॉकडाउन से पहले, यमुना की स्थिति यह थी कि फोम की एक परत पूरी नदी में तैरती थी. लॉकडाउन में बंद उद्योगों की वजह से यमुना काफी साफ और हरी भरी नज़र आई. लेकिन कोरोना के चलते निकले भीषण प्लास्टिक वेस्ट से आगे चलकर यह कब तक सुरक्षित रहती है, यह कहना मुश्किल है.
सरकार द्वारा यमुना एक्शन प्लान, कई फेसेस में काफी दिनों से चल रहा है, जिसमें आस पास के लोगों को जागरूक करने से लेकर, वेस्ट मैनेजमेंट सिखाना, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की संख्या में वृद्धि, सुलभ शौचालयों की स्थापना, और पौधरोपण जैसे अनेक कदम उठाए गए हैं. इन सबमें सबसे अहम बात यह है कि यमुना हमारी दाता है, यह हमें जल, फल-फूल और सुन्दर वातावरण से पोषित करती है, तो क्या हमारा कर्त्तव्य नहीं बनता की हम इसकी सफाई के प्रति व्यक्तिवार कदम उठाएं और इसे साफ़ और स्वच्छ रखने में अपना योगदान दें?  शुरुआत आसपास की जगह को प्रदुषण मुक्त रखने और वेस्ट मैनेजमेंट के तरीकों से अपनी नदियों और पर्यावरण का बचाव करने से होगी. हम जिस पर्यावरण में रहते हैं, उसे सहेजना और उसकी देखभाल करना कितना आवश्यक है, इसका पता इस बात से लगाया जा सकता है कि आज प्रदूषण से होने वाली बीमारियों की संख्या हर दिन बढ़ती जा रही है. नदियां, पर्वत, पेड़, हरियाली, इन सब के प्रदूषण मुक्त हो. होने से ही मानव जीवन सुरक्षित हो पाएगा.
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