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OPINION: सुप्रीम कोर्ट ने वर्षों पुराने विवाद को खत्म कर आगे बढ़ने का रास्ता बनाया है

News18Hindi
Updated: November 9, 2019, 3:57 PM IST
OPINION: सुप्रीम कोर्ट ने वर्षों पुराने विवाद को खत्म कर आगे बढ़ने का रास्ता बनाया है
कुछ असंतुष्टियों के बावजूद मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को स्वीकार कर लिया है.

Ayodhya Verdict: फैसले के फौरन बाद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) की तरफ से की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के वकील रहे ज़फरयाब जिलानी ने मुसलमानों से अपील की कि इस फैसले का कहीं कोई विरोध या इसके खिलाफ धरने प्रदर्शन नहीं किया जाना चाहिए.

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  • Last Updated: November 9, 2019, 3:57 PM IST
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युसूफ अंसारी

नई दिल्ली. अयोध्या (Ayodhya) मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने फैसला सुना दिया है. 2.77 एक विवादित जमीन रामलला विराजमान को राम मंदिर बनाने के लिए दे दी गई है. मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ जमीन देने का केंद्र सरकार को निर्देश दिया है. साथ ही यह भी निर्देश दिया कि मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार एक ट्रस्ट बनाए और उसमें निर्मोही अखाड़ा को भी प्रतिनिधित्व दिया जाए. हालांकि निर्मोही अखाड़े का दावा सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया लेकिन मंदिर के ट्रस्ट में उसकी हिस्सेदारी सुनिश्चित कर दी.

मुस्लिम पक्ष ने भी स्वीकार किया सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर उम्मीद के मुताबिक कोई प्रतिकूल प्रतिक्रिया नहीं आई है. मुस्लिम पक्ष ने भी कुछ बिंदुओं से असंतुष्टि जताते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ससम्मान स्वीकार किया है. फैसले के फौरन बाद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) की तरफ से की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के वकील रहे ज़फरयाब जिलानी ने मुसलमानों से अपील की कि इस फैसले का कहीं कोई विरोध या इसके खिलाफ धरना-प्रदर्शन नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, 'कुछ बिंदुओं से हम संतुष्ट नहीं हैं लेकिन फिर भी हम उसका सम्मान करते हैं.' उन्होंने यह जरूर कहा कि कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण या फैसले के पुनर्विचार के लिए वह दोबारा सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं लेकिन इसका फैसला राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में किया जाएगा. इससे पहले इस बारे में कुछ भी कहना मुनासिब नहीं है.

Mahoba hindu muslim clerics celebrate ayodhya verdict
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दोनों समुदाय में एकता और भाईचारे की तस्वीरें भी सामने आई हैं


इस मुद्दे को लेकर बदली मुसलमानों की सोच
सबसे अच्छी बात यह है कि कोर्ट का फैसला आने से पहले तमाम मुस्लिम पक्ष सार्वजनिक रूप से यह बात कह चुके थे कि सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आएगा, वो बगैर किसी ना नुकुर के उन्हें कुबूल होगा. फैसला आने के बाद इसी बात पर वो कायम भी है. दरअसल अयोध्या में वर्ष 1992 में मस्जिद गिराए जाने के बाद से इस विवाद को लेकर मुसलमानों की सोच में बहुत बदलाव आया है. पहले जहां इस मुद्दे पर तलवारें खिंची रहती थीं, वहीं अब मुस्लिम समुदाय ठंडे दिमाग से सोच रहा है. सोशल मीडिया पर जो मुस्लिम नौजवान प्रतिक्रिया दे रहे हैं, उनमें बड़ा हिस्सा उनका है जो यह कहते हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर के हक़ में फैसला सुनाया है तो मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन भी लेने से इनकार कर देना चाहिए.
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मस्जिद गिराना गैरकानूनी था
हालांकि मुस्लिम पक्ष की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कुछ विसंगतियों की तरफ ईशारा किया गया है. मसलन सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि वर्ष 1949 में मंदिर के अंदर मूर्तियां रखना एकदम गलत था और छह दिसंबर, 1992 को मस्जिद का गिराया जाना भी गैरकानूनी काम था. इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट का फैसला मंदिर के पक्ष में ही सुनाया गया. कुछ महीनों पहले ही केंद्रीय गृह मंत्री और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसे फैसले करने चाहिए जिन्हें लागू किया जा सके. उनका ईशारा केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तरफ था. इसे लेकर केरल में तीव्र जनाक्रोश था. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद इसे लागू नहीं किया जा सका और महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की इजाजत नहीं मिली.

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अयोध्या मामले पर 40 दिन तक लगातार चली सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को बहुप्रतिक्षित फैसला सुनाया


बातचीत से भी मुद्दे को सुलझाने का दिया मौका
अयोध्या का फैसला राम मंदिर के पक्ष में आएगा इसके संकेत पहले से मिलने शुरू हो गए थे. कुछ महीने पहले ही एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मस्जिद इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है. नमाज़ कहीं भी पढ़ी जा सकती है. उसके लिए मस्जिद का होना जरूरी नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या पर सुनवाई करने से पहले बातचीत से मामले को सुलाने का एक मौका दिया था. इसके लिए एक मध्यस्थता कमेटी भी बनाई थी. कमेटी ने आठ हफ्तों तक सभी पक्षों से बातचीत भी की लेकिन इसका कोई रास्ता नहीं निकला, तब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई शुरू की.

'जमीन का मामला नहीं बल्कि इसके कुछ ऐतिहासिक पहलू भी'
पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वो इसे आस्था के चश्मे से देखने के बजाय सिर्फ जमीन के विवाद के रूप में देखेंगे. सुनवाई के पहले दिन ही सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (सीजेआई) रंजन गोगोई ने साफ कर दिया था कि यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं है बल्कि इसके कुछ ऐतिहासिक पहलू भी हैं. लिहाजा तमाम पहलुओं पर गौर कर के ही इस पर फैसला सुनाया जाएगा. सुनवाई के दौरान कई ऐसे मौके भी आए जब  सुप्रीम कोर्ट के जजों ने दोनों ही पक्षों को फटकार भी लगाई थी.

विवाद को खत्म करना ही अच्छा तरीका
अयोध्या विवाद के पटाक्षेप के लिए मुस्लिम समुदाय के बीच एक आम सहमति है कि अगर फैसला राम मंदिर के पक्ष में आ गया है तो अब इसका विरोध नहीं किया जाए. राम मंदिर निर्माण होने दिया जाए. इस विवाद को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका है. वैसे भी मुसलमानों को कुरान में हिदायत दी गई है कि ऐसे मुश्किल वक्त में सब्र रखें. अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है. मुस्लिम बुद्धिजीवियों की तरफ से भी समुदाय से यही अपील की जा रही है.

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सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में पूरी विवादित जमीन रामलला विराजमान को देने का आदेश दिया है


वर्ष 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी मुस्लिम समुदाय की तरफ से कोई उकसाने वाली प्रतिक्रिया नहीं आई थी. इस बार भी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले ही यह माहौल बना हुआ था. फैसला आने के बाद भी कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

विवाद को खत्म कर आगे बढ़ने का रास्ता
दरअसल सुप्रीम कोर्ट का फैसला अयोध्या विवाद को निपटाने वाला है. कुछ लोगों को लगता है कि उनके साथ इंसाफ नहीं हुआ है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बरसों पुराने विवाद को खत्म कर के आगे बढ़ने का एक रास्ता बनाया है. विवाद से जुड़े सभी पक्ष इस पर सहमत हैं. सबसे बड़ी अदालत ने सभी पक्षकारों को खुश करने वाली बात कही है.

मुस्लिम समुदाय का विश्वास जीतने के लिए सरकार दे गारंटी
ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों की यह जिम्मेदारी बन जाती है कि मंदिर मस्जिद से जुड़े अन्य विवादों को पनपने नहीं दे. यहां याद दिलाना जरूरी है कि वर्ष 1991 में संसद ने कानून बनाया था जिसके तहत गारंटी दी गई है कि 15 अगस्त, 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्वरूप में है उसे बदला नहीं जा सकता. इस कानून के दायरे से अयोध्या विवाद को अलग रखा गया था. तमाम मुस्लिम संगठन भले ही मन बना चुके हैं कि अगर सरकारें यह गारंटी देती हैं तो वो खामोश रहकर फैसला मानेंगे. मामला इसी तरह बढ़ता हुआ दिख रहा है. ऐसे में केंद्र सरकार की जिम्मेदारी बन जाती है कि वो मुस्लिम समुदाय का विश्वास जीतने के लिए गारंटी दे कि अयोध्या के बाद अब किसी और मस्जिद पर हिंदू संगठन दावा नहीं करेंगे.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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First published: November 9, 2019, 3:26 PM IST
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