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जन्मदिन विशेष: यूं ही नहीं भारतीय राजनीति के सबसे बड़े 'खिलाड़ी' हैं अमित शाह!

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: October 22, 2019, 1:17 PM IST
जन्मदिन विशेष: यूं ही नहीं भारतीय राजनीति के सबसे बड़े 'खिलाड़ी' हैं अमित शाह!
अमित शाह निगेटिव खबरें भी संभालते हैं

अपनी लगन, कर्मठता और कार्यशैली की वजह से ही अमित शाह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे विश्वासपात्र साथी हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कोई भी अमित शाह की विचारधारा और कार्यशैली की आलोचना कर सकता है, लेकिन उनकी जीवटता और मेहनत पर सवाल नहीं उठा सकता.

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नई दिल्ली. अमित शाह आज अपना 55वां जन्मदिन मना रहे हैं. वो मौजूदा भारतीय राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं. बीजेपी चुनावों में लगातार धमाकेदार जीत दर्ज कर रही है तो इसका असली सेहरा अमित शाह के सिर ही बंधता है. इसके पीछे कई वजहें भी हैं. वो शतरंज के खिलाड़ी रहे हैं.  वो जानते हैं कि कौन मोहरा किस जगह राजा और रानी के लिए ख़तरा बन सकता है. आर्टिकल 370 में संशोधन के बाद शाह भारतीय जनमानस के बीच पहले से अधिक लोकप्रिय हो गए हैं. हालांकि वो अपने ज्यादातर कार्यों का श्रेय पीएम नरेंद्र मोदी को देते हैं.

खास बात ये है कि अमित शाह के राजनीतिक शतरंज के कोई तयशुदा नियम नहीं है, जैसा मौक़ा वैसी चाल. नाटकों में भी उनकी रुचि रही है. अपने विद्यार्थी जीवन में उन्होंने मंच पर कई बार प्रदर्शन किया है. सियासत भी रंगमंच ही है, इसे उनसे बेहतर कौन समझ सकता है. वो सियासत को भी रंगमंच की तरह ही डील करते हैं. शाह की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहली मुलाकात 1986 में हुई थी. यह मुलाकात धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गई. अब ये दोनों भारतीय राजनीति की नंबर 1 जोड़ी हैं. पीएम मोदी उनकी कार्यशैली और जुनून के कायल हैं.

पीएम मोदी ने उनके जन्मदिन पर ट्वीट किया- 'कर्मठ, अनुभवी, कुशल संगठनकर्ता और मंत्रिमंडल में मेरे सहयोगी अमित शाह जी को जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं. सरकार में बहुमूल्य भूमिका निभाने के साथ ही वह भारत को सशक्त और सुरक्षित करने में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं. ईश्वर उन्हें दीर्घायु करे और सदा स्वस्थ रखे.’

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बीजेपी को सबसे अधिक ऊंचाई देने वाली जोड़ी! (File Photo)


राजनीतिक नक्शे का रंग बदल दिया

गृह मंत्री रहते हुए सरदार पटेल ने रियासतों में बंटे भारत का एकीकरण किया और गृह मंत्री बनने के बाद गुजरात के ही अमित शाह ने वर्षों से चली आ रही आर्टिकल 370 की समस्या खत्म कर दी. 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को प्रचंड जीत दिलाने वाले चाणक्य अमित शाह जब नरेंद्र मोदी कैबिनेट का हिस्सा बनने जा रहे थे तब ज्यादातर लोगों को उम्मीद थी कि वो गृह मंत्री बनेंगे और भारतीय राजनीति में कुछ खास करेंगे. शाह लोगों की ऐसी उम्मीदों पर बिल्कुल फिट बैठे. अपनी लगन और मेहनत की वजह से ही वो पीएम नरेंद्र मोदी के लिए इतने महत्वपूर्ण हैं. उनकी मेहनत और कार्यशैली की बदौलत लगातार दो बार केंद्र में बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर ऐसा काम किया कि देश के राजनीतिक नक्शे का रंग ही बदल गया.

रैलियों और यात्रा का रिकॉर्ड
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अमित शाह ने 2019 का चुनाव जीतने के लिए 312 लोकसभा क्षेत्रों का दौरा किया. 161 रैलियां और 18 रोड शो किए. कुल 1.58 लाख किमी की यात्रा की. यह देश की किसी भी अन्य पार्टी के अध्यक्ष से अधिक है. बीजेपी ने इस बार 302 लोकसभा सीट अकेले जीत ली हैं. उसके पीछे यह मेहनत ही है. शाह कभी चैन से नहीं बैठते. शाह जब किसी प्रदेश को जीतने के लिए उतरते हैं तो अपने काम में इतने इनवॉल्व हो जाते कि पांच-छह घंटे ही सोते हैं.

हर दिन औसतन 524 किमी का सफर


मार्च 2017 तक की उनकी यात्राओं का विश्लेषण करें तो शाह ने एक दिन में औसतन 524 किमी का सफर किया. आपको शायद यकीन न हो, उन्होंने तब तक 32 महीने में पांच लाख 7 हजार किलोमीटर से ज्‍यादा लंबी यात्राएं कीं थीं. सियासी विश्लेषकों के मुताबिक, शाह की सक्रियता का ही नतीजा है कि बीजेपी इस तरह से उभरी. देश का राजनीतिक नक्शा बदल चुका है तो उसके पीछे कहीं न कहीं शाह की रणनीति और मेहनत काम करती है.

चुनाव जीतने के लिए वह उसी तरह तैयारी करते, जैसे कोई मेहनती छात्र परीक्षा में अव्वल आने के लिए लगन से पढ़ाई करता है. इसीलिए वह लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल करते गए. वो एक चुनाव जीतते हैं और दूसरे की तैयारी में जुट जाते हैं.

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पीएम मोदी के सबसे करीबी हैं अमित शाह! (File Photo)


कभी चुनाव नहीं हारे

शाह 1989 से 2019 के बीच छोटे-बड़े 44 चुनाव लड़ चुके हैं. जीवन में एक भी चुनाव नहीं हारे. उनको करीब से जानने वाले लोग बताते हैं, "शाह को यूं ही चाणक्य नहीं कहा जाता. वह सियासी चक्रव्यूह रचने में माहिर हैं. वह विरोधियों को या तो हाशिए पर धकेल देते हैं या अपने पक्ष में कर लेते हैं. उन्हें जहां पर सेंध लगानी होती है, वहां की पूरी स्टडी करते हैं. बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अपने एक लेख में बताया है कि शाह चुनावों के लिए बहुत पहले से उसी तरह तैयारी करते हैं, जैसे प्रतिभावान और मेहनती छात्र लगातार पढ़ाई करते हैं. अमित शाह ने 17 साल की उम्र में ही चाणक्य का पूरा इतिहास पढ़ लिया था.

सुबह 7 बजे टेबल पर होती है डिटेल!

वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु मिश्र कहते हैं, "कोई भी अमित शाह की विचारधारा और कार्यशैली की आलोचना कर सकता है, लेकिन उनकी जीवटता और मेहनत पर सवाल नहीं उठा सकता. अलग-अलग भाषाओं के अखबारों में क्या छपा है, इस बारे में वह सुबह 7 बजे तक अपडेट हो जाते हैं. 6 बजे पूरी डिटेल उनकी टेबल पर होती है. उनकी टीम में भी उन्हीं की तरह छह घंटे की नींद लेने वाले लोग काम करते हैं.”

मिश्र के मुताबिक, संगठन क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता कि वह किसी भी बूथ के कार्यकर्ता से सीधे संपर्क कर सकते हैं. सबका डेटाबेस उनके पास है. एक लक्ष्य पूरा होने से पहले वह दूसरा तय रखते हैं. किसी को कभी बैठने नहीं देते. उनके किसी प्रदेश में पहुंचने से पहले उनकी टीम पहुंच जाती है. वह जल्दी किसी पर विश्वास नहीं करते, लेकिन जब किसी पर उन्हें विश्वास हो जाता है तो फिर उसे बहुत मानते हैं."

मिश्र के मुताबिक, रणनीति बनाने वाली इनकी कोर टीम में कैलाश विजयवर्गीय, भूपेंद्र यादव, राम माधव, अनिल जैन और सुनील बंसल बताए जाते हैं. मीडिया की रणनीति अमित मालवीय और अनिल बलूनी बनाते हैं.

शास्त्रीय संगीत और शतरंज!

शतरंज के खेल में उनकी दिलचस्पी इतनी है कि जब 2006 में वो गुजरात स्टेट चेस एसोसिएशन के प्रमुख थे तब उन्होंने पायलट प्रोजेक्ट के रूप में अहमदाबाद के सरकारी स्कूलों में शतरंज को शामिल करा दिया था. दरअसल, शतरंज के नियम उन्होंने सियासत में भी बखूबी आजमाए हैं.

देखने में बहुत गंभीर लगने वाले शाह अपनी अति-व्यस्तता और बहुत सारे सार्वजनिक कार्यक्रमों के बावजूद शास्त्रीय संगीत सुनकर तथा शतरंज खेलकर खुद को तरोताजा कर लेते हैं. समय मिलने पर वह क्रिकेट का भी आनंद लेते हैं. शतरंज के खिलाड़ी की तरह ही चुनाव में भी जीत के लिए काम करते रहना उनका शौक बन गया है. इसीलिए वो बीजेपी के सबसे सफल अध्यक्ष हैं.

मसालेदार खाना, मुकेश का गाना और अंताक्षरी

गृह मंत्री शाह अपनी छोटी-छोटी ख्वाहिशों को पूरा करना नहीं भूलते. बताया जाता है कि शाह खाने के काफी शौकीन हैं. उन्हें मसालेदार खाना भाता है. पाव भाजी पसंद है. शाह अपनी लंबी कार यात्राओं के दौरान शास्त्रीय संगीत सुनते हैं. वह गायक मुकेश के प्रशंसक हैं. अंताक्षरी खेलना भी उन्हें बहुत अच्छा लगता है. कहा जाता है कि शाह कभी अंताक्षरी में हारते नहीं. उन्हें हिंदी के बेशुमार गाने याद हैं.

शाह की सियासत

यह शतरंज के खिलाड़ी अमित शाह की सियासी जादूगरी ही है कि उन्‍होंने कांग्रेस को सिर्फ पांच राज्यों में समेटकर देश का सियासी नक्शा ही बदल दिया है. चुनाव जीतने के लिए अमित शाह ने गणित भी लगाया और केमिस्ट्री भी बनाई. उन पार्टियों से भी समझौता किया, जिनका सिर्फ किसी क्षेत्र विशेष या जाति विशेष में ही प्रभाव था. कोशिश बस पार्टी के लिए जोड़ने की रही. उन्होंने ओबीसी और दलितों को पार्टी से जोड़ने के लिए जातियों के नेताओं को पार्टी में तवज्जो दी. मौर्य, कुशवाहा, यादव, राजभर और निषादों को बड़े पैमाने पर बीजेपी के साथ शिफ्ट करने में वह कामयाब रहे.

संभालते हैं निगेटिव खबरें

आमतौर पर नेताओं को पॉजिटिव खबरें ही पसंद आती हैं, लेकिन शाह ऐसे नेता हैं जो अपने लिए छपी निगेटिव खबरों को भी संभाल लेते हैं. अमित शाह ने अपनी वेबसाइट पर 'प्रेस' कॉर्नर में Critic ऑप्शन भी डलवाया है. वो अपनी आलोचनाओं से सीखते हैं. साथ ही यह बताने की कोशिश करते हैं वह आलोचनाओं को बर्दाश्त करते हैं.

शाह के साथ यूं ही नहीं जुड़ते गए रिकॉर्ड!

अमित शाह अगस्‍त 2014 से बीजेपी के अध्‍यक्ष हैं. उन्होंने न सिर्फ भारत के सियासी नक्शे को भगवामय किया है बल्कि भाजपा को 10 करोड़ सदस्‍यों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भी बनवाया है. इसके पीछे उनकी रणनीति और मेहनत काम करती है. 2016 के विधानसभा चुनावों में असम, त्रिपुरा में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी. यही नहीं केरल, पश्‍चिम बंगाल तथा तमिलनाडु में भी मजबूती से उभरी. इसलिए कोई इससे इनकार नहीं कर सकता कि वे बीजेपी के अब तक के शानदार सफर के सबसे बड़े सेनानी हैं. बीजेपी के किसी भी अध्यक्ष के लिए अमित शाह जैसा काम कर पाना और बने हुए रिकॉर्ड को बरकरार रखना आसान नहीं होगा.

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लगातार काम करते रहना अमित शाह का शौक बन गया है (File Photo)


किसी दिन बैठते नहीं

शाह किसी दिन बैठते नहीं, बल्कि पार्टी को मजबूत करने के लिए किसी न किसी जगह का उनका दौरा तय रहता है. शाह का यात्रा विवरण देखें तो उन्होंने सिर्फ उन राज्यों का दौरा नहीं किया, जिनमें बीजेपी की सरकार हैं बल्कि उन पर भी फोकस किया जहां अभी भगवा ध्वज फहराया जाना बाकी है. शाह के ज्‍यादातर दौरे वो थे जिनमें वह पार्टी का जमीनी ढांचा मजबूत कर रहे थे या उसे आंध्र प्रदेश, केरल, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना एवं पश्‍चिम बंगाल जैसे पारंपरिक रूप से कमजोर राज्यों में पूरी तरह जमीन से ही खड़ा करने में लगे हुए थे. अपनी यात्रा में वह न सिर्फ संगठन को चुनौतियों से उबारने का मंत्र बताते हैं बल्कि उनकी कोशिश होती है कि सरकार और संगठन की आपसी नाराजगी दूर हो.

पोल एजेंट से पार्टी अध्यक्ष तक

अमित शाह गुजराती हैं, लेकिन उनका जन्म (22 October 1964) मुंबई में हुआ था. अहमदाबाद में वह आरएसएस सदस्य बने. एबीवीपी के लिए काम किया और 1984-85 में बीजेपी में आए. पहली बार पार्टी ने उन्हें अहमदाबाद के नारायणपुर वार्ड में पोल एजेंट बनाया था. पोल एजेंट रहने के दौरान ही उन्होंने राजनीति का गणित समझना शुरू कर दिया था.हालांकि, दिल्ली और बिहार में हार के बाद बीजेपी के कई वरिष्ठ नेताओं ने अमित शाह की लीडरशिप पर सवाल खड़े किए थे लेकिन असम, त्रिपुरा जैसे राज्यों में जीत के बाद उनकी तारीफ करने में तनिक भी देर नहीं की. ज़ाहिर है कि यह तारीफ बेकार नहीं गई. बिहार में भी नीतीश कुमार के साथ बीजेपी की सरकार बनवा ली.  2019 में भी जब बीजेपी को अकेले 302 सीटें मिलीं तो लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था. लेकिन यह सच था. अबकी बार, तीन सौ पार का नारा तो अमित शाह पहले ही दे चुके थे. जाहिर है अपने काम की बदौलत उनमें इतनी सीटों को जीतने का कांफिडेंस था.

इसके बाद भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और फिर गुजरात भाजपा के उपाध्यक्ष तक वह एक के बाद एक सीढ़ियां चढ़ते गए. ज़मीनी स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं तक उनकी पहुंच और उनसे निजी तौर पर जुड़े रहने के कारण उनकी छवि बाक़ी नेताओं से अलग बनी. जब गुजरात में मोदी युग शुरू हुआ तो उन्‍हें गृह मंत्रालय दिया गया. अब वो मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री बन रहे हैं. देखना ये है कि वो कौन सा मंत्रालय संभालेंगे.

यूपी की चुनौती से पार पाना

चुनावी गणित के महारथी शाह को छोटे से छोटे आंकड़े पर गौर करने के लिए जाना जाता है. इसीलिए वह जानते थे कि केंद्र में सरकार बनाने के लिए उत्तर प्रदेश में जीतना बेहद महत्वपूर्ण है. 2014 लोकसभा चुनाव भी बेहद अहम थे और तभी से उनका उत्तर प्रदेश से रिश्ता शुरू हुआ. बीजेपी ने उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे सियासी तौर पर बेहद जटिल माने जाने वाले राज्य का काम सौंपा. वह भी इस चुनौती को समझ रहे थे. इस बैटल ग्राउंड को जीतने के लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश के हर कोने की यात्रा की और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के साथ पार्टी के विकास के एजेंडा को आगे बढ़ाया. नतीजा इतना शानदार रहा कि बीजेपी ने यूपी में 80 में 73 सीटों पर जीत हासिल की. 2019 में भी उनकी सबसे ज्यादा यात्राएं यूपी में ही हुई हैं.

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अमित शाह ने साधारण कार्यकर्ता से शुरू किया था सफर (File Photo)


पार्टी अध्यक्ष बनते ही मार लिया था मैदान

पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद पहले ही साल बीजेपी ने पांच में चार विधानसभा चुनाव जीत लिए- महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा में पार्टी के मुख्यमंत्री बने तो जम्मू-कश्मीर में उपमुख्यमंत्री के पद के साथ बीजेपी गठबंधन सरकार का हिस्सा बनी. उन्‍होंने यूपी विधानसभा चुनाव में भी प्रचंड बहुमत के साथ बीजेपी की सरकार बनवाने की कामयाबी हासिल की. वहां पार्टी का वनवास खत्म करवाया.

हालांकि, दिल्ली और बिहार में हार के बाद बीजेपी के कई वरिष्ठ नेताओं ने अमित शाह की लीडरशिप पर सवाल खड़े किए थे लेकिन असम, त्रिपुरा जैसे राज्यों में जीत के बाद उनकी तारीफ करने में तनिक भी देर नहीं की. ज़ाहिर है कि यह तारीफ बेकार नहीं गई. बिहार में भी नीतीश कुमार के साथ बीजेपी की सरकार बनवा ली.  2019 में भी जब बीजेपी को अकेले 302 सीटें मिलीं तो लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था. लेकिन यह सच था. अबकी बार, तीन सौ पार का नारा तो अमित शाह पहले ही दे चुके थे. जाहिर है अपने काम की बदौलत उनमें इतनी सीटों को जीतने का कांफिडेंस था.

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First published: October 22, 2019, 1:06 PM IST
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