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9 साल बाद ‘होम’ टर्फ पर अमित शाह, इस तरह बढ़ता गया सियासी कद

अमित शाह ने बतौर केंद्रीय गृह मंत्री शनिवार को अपना पदभार संभाला (फोटो-PTI)

अमित शाह ने बतौर केंद्रीय गृह मंत्री शनिवार को अपना पदभार संभाला (फोटो-PTI)

भारतीय राजनीति के चाणक्य अमित शाह अब देश के गृह मंत्री की भूमिका में हैं. उनसे बड़ी उम्मीदें भी हैं, क्योंकि उनके पास ह ...अधिक पढ़ें

    बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने आज (शनिवार) से देश के नए गृह मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाल ली है. नौ साल बाद अमित शाह की ये धमाकेदार ‘घर वापसी’ है. घर वापसी इसलिए क्योंकि आखिरी बार किसी सरकार में मंत्री वो 2010 में रहे थे, गुजरात की मोदी सरकार में. उसके बाद अब उन्होंने वापसी की है, राज्य की जगह सीधे देश के गृह मंत्री के तौर पर. अगर प्रभाव के बारे में कहा जाए, तो मोदी के बाद अगर देश में किसी का सबसे अधिक डंका बज रहा है तो अमित शाह ही हैं. और इसका कारण भी है.

    पिछले पांच साल में बतौर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी का जिस तरह विस्तार किया है और लगातार चुनावी सफलता हासिल की है, उसकी वजह से उन्हें चुनावी राजनीति का असली चाणक्य अब सबने मान लिया है. वैसे भी जिस तरह नरेंद्र मोदी स्वामी विवेकानंद से प्रभावित रहे हैं, उसी तरह अमित शाह चाणक्य से. दिल्ली के अकबर रोड के ग्यारह नंबर बंगले में उनके ड्राइंग रूम की दीवार के एक कोने में वीर सावरकर हैं, तो दूसरे कोने में चाणक्य. ऐसे में आराध्य की संज्ञा अगर भक्त को मिल रही हो, तो फिर शाह को ऐतराज कहां.

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अमित शाह
    नरेंद्र मोदी के साथ अमित शाह की राजनीतिक रूप से ट्यूनिंग काफी जमती है (फोटो: शैलेष रावल)


    अपने ऊपर था यकीन
    लेकिन अमित शाह की ये घर वापसी आसान नहीं रही है. जिस समय उन्होंने गुजरात में गृह राज्य मंत्री की कुर्सी छोड़ी थी, उनका भविष्य अंधकारमय दिखाई दे रहा था. 2010 की 24 जुलाई को असाधारण परिस्थितियों में उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था. परिस्थिति ऐसी थी कि ज्यादातर लोगों को ये यकीन नहीं था कि अमित शाह फिर से राजनीति में वापस खड़े हो पाएंगे, सरकार में आने की बात तो दूर. कई राजनीतिक पंडितों ने तो उनका सियासी फातिहा भी पढ़ दिया था, लेकिन अमित शाह को अपने ऊपर यकीन था. इस्तीफा देने के बाद और सीबीआई के सामने सरेंडर होने के पहले शाह ने सीना ठोक कर कहा था कि वो जल्दी ही वापसी करेंगे और धमाकेदार वापसी करेंगे, कोई उनके भविष्य के बारे में गलतफहमी न पाले.

    ..तब नहीं बचा था कोई विकल्प
    सवाल ये उठता है कि आखिर अमित शाह को इस्तीफा देने के लिए क्यों बाध्य होना पड़ा. दरअसल उस समय केंद्र में यूपीए की अगुआई वाली सरकार थी. वो अमित शाह को किसी भी कीमत पर सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले में फिट करने में लगी हुई थी. तत्कालीन केंद्र सरकार के इशारे पर ही सीबीआई ने, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पालतू तोते की संज्ञा दी थी, अमित शाह के खिलाफ अहमदाबाद की विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी. चार्जशीट में कहा गया था कि कुख्यात गैंगस्टर सोहराबुद्दीन को फर्जी मुठभेड़ में मार देने की साजिश अमित शाह ने रची थी.  इस तरह की चार्जशीट के बाद शाह के पास गुजरात की तत्कालीन मोदी सरकार से इस्तीफा देकर सीबीआई के सामने सरेंडर होने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा था.

    अमित शाह (फाइल फोटो)
    विधायक के रूप में शुरुआत करने वाले अमित शाह 2019 में पहली बार लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने हैं (फोटो: शैलेष रावल)


    दस विभागों के थे मंत्री
    सीबीआई के सामने 25 जुलाई 2010 को सरेंडर होने के बाद शाह को अदालत ने न्यायिक हिरासत में अहमदाबाद के उस साबरमती सेंट्रल जेल में भेज दिया, जो जेल कुछ समय पहले तक उनके अधिकार क्षेत्र का हिस्सा था. दरअसल जब अमित शाह ने मोदी मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया, उस समय उनके पास कोई एक-दो विभाग नहीं थे, बल्कि वो दस विभागों के मंत्री थे- गृह विभाग के राज्य मंत्री के अलावा उनके पास ट्रांसपोर्ट, पुलिस हाउसिंग, बॉर्डर सिक्योरिटी, सिविल डिफेंस, होम गॉर्ड्स, ग्राम रक्षक दल, नशाबंदी और आबकारी, कानून व न्याय के साथ संसदीय कार्य मंत्रालय का भी स्वतंत्र प्रभार था. इस तरह वो नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली राज्य सरकार में सबसे ज्यादा विभाग संभालने वाले मंत्री थे.

    करना पड़ा दिल्ली का रुख
    साबरमती सेंट्रल जेल, जहां सुरक्षा से लेकर संसाधनों के स्तर पर उन्होंने ढेर सारे सुधार किए थे, उसके तिलक वार्ड में करीब तीन महीने तक उन्हें रहना पड़ा. तीन महीने के इस जेलवास के दौरान अमित शाह ने अपना ज्यादातर समय किताबें पढ़ने और अपनी खोली में ही टहलने में बिताया. आखिरकार उनको 29 अक्टूबर 2010 को गुजरात हाईकोर्ट से जमानत मिली, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की अपील पर ये शर्त जोड़ दी कि वो गुजरात में नहीं रहेंगे, बल्कि उन्हें गुजरात के बाहर रहना पड़ेगा. ऐसे में जमानत पर जेल से बाहर आने के बाद अमित शाह को अगले दिन ही सीधे दिल्ली का रुख करना पड़ा, जिस शहर ने उनके आगे के करियर में बड़ी भूमिका निभाई.

    चुनाव प्रचार में रोडशो के दौरान अमित शाह (फाइल फोटो)
    गुजरात में दोबारा वापसी करने के बाद रोडशो में अमित शाह (फोटो: शैलेष रावल)


    2012 में फिर बने विधायक
    तीस अक्टूबर 2010 को दिल्ली आने के बाद अमित शाह जहां एक तरफ अपनी कानूनी लड़ाई लड़ने में लगे, वही उनके राजनीतिक संपर्क का दायरा भी बढ़ना शुरू हुआ. इसके पहले राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें काम करने का मौका 1997 में तब मिला था, जब वो बीजेपी युवा मोर्चा के कोषाध्यक्ष थे और जयप्रकाश नड्ढा उनके अध्यक्ष. दिल्ली आने पर  अमित शाह को अरुण जेटली ने अपने एक घर में रहने का न्योता दिया, लेकिन शाह इसकी जगह ज्यादातर समय गुजरात भवन में ही रहे. उनको करीब से जानने वाले लोग बताते हैं कि 30 अक्टूबर 2010 से लेकर अगले दो साल तक अमित शाह अपनी कानूनी लड़ाई लड़ने के साथ ही देश के तमाम बड़े धर्म स्थानों पर तो गए ही, देश के अलग-अलग हिस्सों में गुमनाम तरीके से जाकर जनता के मिजाज को भी समझा. आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने 27 सितंबर 2012 को उनके गुजरात प्रवेश पर लगी रोक हटाई और इसके साथ ही 2012 के विधानसभा चुनावों के ठीक पहले अमित शाह का गुजरात लौटना हुआ और उन्होंने बड़े मार्जिन से नाराणपुरा सीट से विधानसभा का चुनाव जीता.

    बढ़ता गया सियासत में कद
    वहां से अगले सात साल का सफर अमित शाह के लिए लगातार बढ़ते सियासी कद वाला रहा. सोहराबुद्दीन शेख और तुलसी प्रजापति मामले में आरोपी होने के कारण अमित शाह चुनाव बाद 2012 के मोदी मंत्रिमंडल में शरीक तो नहीं हुए, लेकिन उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र गुजरात की जगह पूरे देश को बना लिया. आखिरकार 31 मार्च 2013 को अमित शाह को केंद्रीय संगठन में महामंत्री की जिम्मेदारी मिली और फिर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया. शाह ने 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में बीजेपी को उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक जीत दिलाई. कुल 80 सीटों में से 71 तो बीजेपी के खाते में डाली और दो सहयोगी संगठन अपना दल के खाते में.

    अमित शाह (फाइल फोटो)
    मोदी सरकार 2.0 में अमित शाह केंद्रीय गृह मंत्री बनाए गए हैं (फोटो: शैलेष रावल)


    इस जबरदस्त कामयाबी के साथ ही पूरे देश ने अमित शाह के राजनीतिक कौशल का लोहा मान लिया और उन्हें भारतीय राजनीति का चाणक्य कहा जाने लगा. उसके बाद अमित शाह ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद खुद बीजेपी अध्यक्ष की भूमिका में एक के बाद एक लगातार अपनी पार्टी को चुनावी कामयाबी दिलाते गए. इसके साथ ही उनकी और मोदी की जोड़ी भारतीय जनता पार्टी के इतिहास की सबसे सफल जोड़ी होने के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति की भी सबसे सफल जोड़ी में तब्दील हो गई.

    मनवा दिया रणनीतिक कौशल का लोहा
    2019 के चुनावों ने उन्होंने अपने रणनीतिक कौशल का फिर से लोहा मनवा दिया और तमाम आशंकाओं और अटकलों के बीच अपनी पार्टी को तीन सौ से ज्यादा सीटें और पूरे एनडीए को साढ़े तीन सौ से ज्यादा सीटें दिलाने में कामयाब रहे, जिसका दावा वो चुनाव के पहले से ही करते आ रहे थे. खास बात ये है कि जिस केस के कारण उन्हें गुजरात छोड़ने के लिए 2010 से 2012 के बीच बाध्य होना पड़ा था, उस केस से खुद अदालत ने ये कहते हुए अमित शाह को चार साल बाद डिस्चार्ज कर दिया कि अदालत की निगाह में चार्ज फ्रेम करने के लिए सीबीआई के पास कोई सबूत ही नहीं था.

    चुनावी कामयाबी के लगातार सिलसिले और केस के पचड़े से निकलने के बाद अब अमित शाह देश के गृह मंत्री का पद संभाल चुके हैं. इसके साथ ही उनकी नई चुनौतियां भी शुरू हो गई हैं और परीक्षा भी. लेकिन इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए उनके पास इच्छाशक्ति और राजनीतिक कौशल  ही नहीं, प्रशासनिक अनुभव भी है. ऐसे में उम्मीद ये की जा रही है कि राजनीति की बिसात पर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अमिट छाप छोड़ने के बाद अब वो गृह मंत्री के तौर पर भी पूरे देश में  अपनी प्रशासनिक क्षमता का लोहा मनवाएंगे.

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    अपने परिवार के साथ अमित शाह (फोटो: शैलेष रावल)


    काम आएगा पुराना अनुभव
    राष्ट्रीय स्तर पर गृह मंत्रालय से जुड़ी तमाम चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए उनका गुजरात का अनुभव काम आएगा. गुजरात एक ऐसा राज्य है, जिसकी न सिर्फ अपनी जमीनी सीमा पाकिस्तान से मिलती है, बल्कि जिसकी समुद्री सीमा पूरे देश में सबसे अधिक है, करीब सोलह सौ किलोमीटर लंबी. इसलिए सुरक्षा से जुड़ी सभी चुनौतियों के मुकाबले के लिए उनके पास होमवर्क है, पुराना अनुभव भी है.

    गुजरात में गृह राज्य मंत्री के तौर पर करीब आठ वर्ष काम करने का अनुभव है उनके पास. गुजरात के इतिहास में उनकी गिनती सबसे सफल गृह मंत्रियों में होती है. उनके आठ वर्ष के बतौर गृह राज्य मंत्री के कार्यकाल के दौरान पूरे राज्य में कभी एक दिन भी कर्फ्यू नहीं लगा. ये एक ऐसा रिकॉर्ड है, जो गुजरात के हिसाब से असाधारण है. सांप्रदायिक तौर पर संवेदनशील इस राज्य में कई शहर ऐसे हैं, जहां अतीत में हर बात में कर्फ्यू लगते रहे, अहमदाबाद से लेकर सूरत और गोधरा से लेकर वडोदरा तक. लेकिन अमित शाह हमेशा इस बात पर गर्व करते रहे हैं कि उनके गृह राज्य मंत्री रहते हुए गुजरात में कभी कर्फ्यू लगाने की नौबत नहीं आई और ये कानून-व्यवस्था पर उनकी पकड़ का नमूना रहा है.

    आतंकवाद होगा सबसे बड़ी चुनौती
    अमित शाह को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने का भी ठीक-ठाक अनुभव है. केंद्रीय गृह मंत्री के तौर पर ये उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती रहने वाली है. गुजरात में जब 27 जुलाई 2008 को इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े हुए आतंकियों ने सीरियल धमाके किये थे, तो उसमें पचास से भी अधिक लोगों की जान गई थी. लेकिन इस घटना के तुरंत बाद अमित शाह ने संकल्प लिया कि आतंक के आकाओं और उनके गुर्गों को किसी भी कीमत पर पकड़ के रहेंगे.

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    अमित शाह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ राजनीतिक रूप से लंबे समय से जुड़े रहे हैं (फोटो: शैलेष रावल)


    ये अपने आप में रिकॉर्ड है कि इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े आतंकियों ने 2005 में गोरखपुर में सीरियल ब्लास्ट करने के साथ जो सिलसिला शुरू किया था, अहमदाबाद में जुलाई 2008 में उन्होंने जब धमाके किए, तो ये 35वीं वारदात थी, लेकिन कभी कोई आतंकी पकड़ा नहीं गया था. लेकिन अहमदाबाद धमाकों के बाद रिकॉर्ड समय में देश के तमाम हिस्सों से इंडियन मुजाहिदीन के आतंकियों को गिरफ्तार किया गया और पूरी साजिश का भंडाफोड़ हुआ. गुजरात पुलिस की इस बड़ी सफलता के कारण ही देश में इंडियन मुजाहिदीन की कमर टूट गई और उसके बाद देश में इनके आतंकियों के धमाकों का सिलसिला बंद हुआ.

    आधुनिकीकरण पर भी जोर
    अमित शाह ने अपने कार्यकाल के दौरान सुरक्षा की गंभीर चुनौतियों के मद्देनजर न सिर्फ जेल से लेकर थानों तक का आधुनिकीकरण किया, बल्कि तकनीक, हथियार और उपकरणों के आधुनिकीकरण पर भी जोर दिया. पहली बार गुजरात पुलिस ने शरारती तत्वों पर निगाह रखने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल शुरू किया, जो देश में अपने आप में अनूठी घटना थी. यही नहीं, पुलिस बल को पुरानी इनफील्ड राइफलों की जगह न सिर्फ भारतीय ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों में प्रोड्यूस होने वाले इंसास राइफलों से लैस किया गया, बल्कि एमपी-5 से लेकर ग्लॉक पिस्टल और एके-47 राइफल जैसे उम्दा विदेशी हथियार भी मुहैया कराए गए, ताकि हर परिस्थिति के लिए गुजरात पुलिस तैयार रहे.

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    नरेंद्र मोदी के साथ अमित शाह (फोटो: शैलेष रावल)


    आतंकियों के खतरे को देखते हुए चेतक कमांडो फोर्स की विशेष टुकड़ियां गठित की गईं, हर जिले में स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप की यूनिट तैयार की गईं और समुद्री सीमा की सुरक्षा के लिए विशेष मरीन पुलिस स्टेशन के साथ ही मरीन कमांडो फोर्स जैसा विशेष सुरक्षा दस्ता भी तैयार किया गया.

    कठिन परिश्रम की क्षमता
    गुजरात में गृह राज्य मंत्री के तौर पर किये गए अमित शाह के कार्यों की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त है, लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है उनकी कठिन परिश्रम की क्षमता. पार्टी के लिए पिछले छह साल में राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने किस तरह से दिन-रात पसीना बहाया है, ये सबको पता है, अब गृह मंत्री की भूमिका में भी इसी जज्बे की उम्मीद है. शाह की खासियत है कि वो हर समस्या की गहराई में जाते हैं और फिर उसका हल निकालते हैं. गुजरात पुलिस के अधिकारी भी जब उनके पास किसी विषय पर चर्चा के लिए जाते थे, तो पूरी तैयारी के साथ जाते थे, पता नहीं क्या पूछ लें.

    खास बात ये है कि आठ वर्ष के अपने कार्यकाल के दौरान विधानसभा में पूछे गए किसी भी सवाल का जवाब उन्होंने किसी अधिकारी से तैयार कर नहीं मंगवाया, बल्कि वो मंगाते थे सिर्फ आंकड़े, जवाब खुद तैयार करते थे. और तैयारी इस कदर होती थी कि मूल प्रश्न तो ठीक, अगर पूरक प्रश्न भी पूछ लिए जाएं, तो फाइल देखने की नौबत शायद ही आती. न सिर्फ कानून-व्यवस्था, बल्कि खुफिया विभाग के कामकाज का भी उन्हें पूरा ज्ञान है. बतौर गृह राज्य मंत्री राज्य खुफिया विभाग के ढांचे को उन्होंने काफी मजबूत किया था, जिसके कारण कई आतंकी वारदातों को टाला जा सका और कई मामलों में आतंकियों की गिरफ्तारी तक हुई.

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    अमित शाह को बीजेपी के 'चाणक्य' के रूप में भी जाना जाता है (फोटो: शैलेष रावल)


    प्रशासन में भी बड़ी लकीर खींचने का मौका
    राजनीति के इस शहंशाह के पास अब राष्ट्रीय स्तर पर गृह मंत्री के तौर पर अपना जलवा दिखाने का मौका है. गृह मंत्रालय की ये पिच उनके लिए अनजानी भी नहीं है, फर्क सिर्फ ये है कि राज्य की जगह देश की पिच है और अंतराल नौ वर्ष का आ गया है. लेकिन खुद अमित शाह भी इस दौरान प्रदेश की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी इतनी बड़ी पहचान बना चुके हैं कि अब उन्हें मोदी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा है. जिस कुर्सी पर आज वो बैठे हैं, उस कुर्सी पर आजाद भारत के इतिहास में सबसे पहले सरदार पटेल बैठे थे.

    वो सरदार पटेल, जिनसे न सिर्फ अमित शाह अपनी प्रेरणा पाते हैं, बल्कि पूरी पार्टी. ऐसे में मौका है कि उनके पास कुछ ऐसा बड़ा कर जाने का, जैसा सरदार ने अपने दौर में किया. अमित शाह के लिए राजनीति के बाद प्रशासन में भी ये बड़ी लकीर खींचने का मौका है, नई चालें चलने का मौका है, चौक्के-छक्के लगाने का मौका है और भारतीय राजनीति का ये चाणक्य क्रिकेट के मैदान और शतरंज के  बिसात की भी बेहतरीन समझ रखता है और इसी भरोसे नई और बड़ी लकीर खीचने के लिए तैयार भी.

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    Tags: Amit shah, BJP, Gujrat news, Home ministry, Modi government, Narendra modi

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