जेटली के साथ कई यादगार लम्हे एक रिपोर्टर के नजरिए से

अमिताभ सिन्हा | News18Hindi
Updated: August 24, 2019, 5:46 PM IST
जेटली के साथ कई यादगार लम्हे एक रिपोर्टर के नजरिए से
अरुण जेटली बीजेपी प्रवक्ता के तौर पर पत्रकारों के बीच काफी लोकप्रिय रहे

जेटली 1991 से लगातार बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य (BJP National Executive Members) रहे. वाजपेयी सरकार (Vajpayee Government) में अक्टूबर 1999 को पहली बार अरुण जेटली सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (Information and Broadcasting Minister) बने. जुलाई 2000 (JULY 2000) में उन्हें विनेवेश विभाग का राज्य मंत्री और अक्टूबर 2000 में पहली बार उन्हे कैबिनेट मंत्री (CABINET MINISTER) बनाया गया वो भी अपने पसंदीदा कानून मंत्रालय (LAW MINISTER) का.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 24, 2019, 5:46 PM IST
  • Share this:
एक युवा पत्रकार (A Young Journalist) के लिए किसी शीर्ष नेता (TOP LEADER)  के कमरे में जाना और अगर वो नेता अगर नाम भी जानता हो तो वो खासा मायने रखता है. हम जैसे बीजेपी कवर (BJP BEAT REPORTERS) करने वाले जर्नलिस्टों के लिए हर शाम जेटलीजी (ARUN JAITLEY) के कमरे में जा कर बातें सुनना ही एक मिशन हुआ करता था. अब दो दशकों से ज्यादा वक्त गुजर गए. 2-4 नौकरियां भी बदल लीं लेकिन उनके लिए अमिताभ नाम ही काफी था. कभी ये नहीं पूछा की किस चैनल में हो बस भरोसा था की खबरों से के साथ खेल नहीं करेगा इसलिए साथ लंबा निभा.

एक काम करने में वो कभी पीछे नहीं रहते थे और वो काम था कि संपादकों से सामने मेरी तारीफों के पुल बांधने का. पिछले दो दशकों में आज तक कोई ऐसा चुनाव नहीं हुआ जिसमें उन्होने मुझे इंटरव्यू (INTERVIEW) नहीं दिया हो. 2019 के लोकसभा चुनावों का तो उन्होने अपना पहला इंटरव्यू हमें ही दिया और वो भी हिंदी में. साथ ही साथ ये बता दूं कि 2014 के लोकसभा चुनावों का प्रचार खत्म होने वाले दिन उन्होने वाराणसी में उस दिन का और उस चुनाव का आखिरी इंटरव्यू मुझे ही दिया था.

हिंदी जर्नलिस्टों के लिए भी दरवाजे कभी बंद नहीं हुए

जेटली कानून के जानकार तो थे ही साथ ही वह एक सुलझे राजनेता भी थे


उनके अंग्रेजी प्रेम पर उनके विरोधी काफी सवाल उठाते थे लेकिन हम जैसे हिंदी जर्नलिस्टों के लिए तो जेटलीजी के दरवाजे कभी बंद नहीं हुए. इस धारणा को विपरित हमने पाया कि विधानसभा चुनावों में स्थानीय मीडिया के सहारे वोटरों तक पहुंचने की रणनीति पर चलने वाले वो पहले रणनीतिकार थे जिसका फायदा भी बीजेपी को काफी मिला. कई राज्यों में बतौर चुनाव प्रभारी अरुण जेटली को जीत दिलाने में उनेक इस मीडिया मैनेजमेंट ने खासा रोल अदा किया.

अभी मैने जिक्र किया था लोकसभा चुनावों के पहले दिए गए उनके पहले इंटरव्यू का. उन्होने तय किया हुआ था कि इस बार पहला इंटरव्यू हिंदी में ही देंगे और शायद नाम भी चुना हुआ था तभी तो मेरा नंबर आ गया. सुबह 11 बजे का समय मिला था लेकिन मै एक घंटे पहले यानि 10 बजे ही उनके कृष्ण मेनन स्थित आवास पर पहुंच गया था. देखा तो जेटलीजी घर की चारदीवारी में ही बने फुटपाथ पर सुबह की वॉक ले रहे हैं. मुझे देखते ही अपने पास बुला लिया और मैने उनके साथ पूरे लॉन का एक चक्कर लगाया. स्वास्थ्य ठीक नहीं था लेकिन उन्होने न सिर्फ मेरा हाल चाल पूछा, बल्कि अपने स्वास्थ्य के बारे में भी बताया.

उन्होने बताया की उनका वजन (Weight) पहले से आधा रह गया है इसलिए उनकी सारी देशी-विदेशी जेकेट्स अब उन्हे फिट नहीं आती इसलिए मुझे कहा कि एक-दो तू भी ले जा क्योंकि अब वो तूझे ही फिट आएगी. खैर मैने वो गिफ्ट(GIFT) तो नहीं ली, लेकिन इसका जिक्र सिर्फ ये बताने के लिए किया है कि वो सिर्फ इलिट क्लास के नहीं थे, उन्हें सबकी चिंता थी. साथ ही हिंदी भी उनकी प्राथमिकता थी.
Loading...

Arun jaitley facts, Arun jaitley death, Arun jaitley and modi, Arun jaitley and advani, Arun jaitley biography, अरुण जेटली फैक्ट्स, अरुण जेटली निधन, अरुण जेटली और मोदी, अरुण जेटली और आडवाणी, अरुण जेटली जीवनी
अरुण जेटली बीते दो दशकों से भी ज्यादा समय से देश की नीति निर्धारण और महत्वपर्ण विषयों पर अपनी राय ऱखते आ रहे थे.


अब ये जिक्र कर ही दिया है तो मै एक और घटना बताता हूं. मोदी सरकार का पहला बजट( MODI GOVERNMENT FIRST BUDGET) पेश होना था. हमने उनसे मिलने का समय मांगा हुआ था. उन्होने बजट के दो दिन पहले हम दो जर्नलिस्टों को दोपहर के खाने पर बुला लिया वो भी रक्षा मंत्रालय में. तब वो वित्त और रक्षा दोनो विभाग संभाल रहे थे. लंच करते करते ही बातचीत हो सकती थी क्योंकि उनका काफी व्यस्त दिन था. खाने की मेज पर उनहोंने मुझसे पूछा की तेरी सैलरी कितनी है और उसमें से कितनी ईएमआई जाती है, बच्चों की फीस कितनी जाती है. कैसे पैसे बचाते हो. सब पूछने के बाद इधर-उधर की बातचीत हुई और हम वहां से निकले. बजट में हम जैसे मध्यम वर्ग को टैक्स में थोड़ी राहत की घोषणा हुई तो याद आया कि जेटली सर ने क्यों इतने सवाल पूछे थे. बजट के ठीक अगले दिन वो संसद के गेट नंबर 12 पर मिले तो गाड़ी से उतरते ही मुझसे वही सवाल पूछा कि अब सैलरी में से थोड़े पैसे बचेंगे की नहीं.

यादों की फेहरिश्त बड़ी लंबी है

ऐसी यादों की फेहरिश्त बड़ी लंबी है. लेकिन इतना तो कहा जा सकता है जेटलीजी सही मायनों में पत्रकार थे जिनको खबर सूंघने की क्षमता थी. देश के सर्वश्रेष्ठ वकीलों में रहे, राजनीति में भी वो शीर्ष पर रहे लेकिन वो खबरों और गॉसिप के इनसाइक्लोपीडिया थे. खबर चाहे खेल की हो या फिर अर्थव्यवस्थआ से जुड़ी या फिर राजनीति से जुड़ी अरुण जेटली हमेशा अपडेटेड रहते थे. ये बात और है कि जब बात राजनीति की पूछों तो वे क्रिकेट केगॉसिप सुना देते थे या फिर कोई बीजेपी की अंदर की बात का जिक्र करो तो अपनी किसी विदेश यात्रा की कहानी सुनाकर मुद्दे को दूसरी दिशा में ले जाते थे. ये बात और है कि उसी बातचीत में उनके वन लाइनर्स पकड़ने पड़ते थे जिसमें सही खबर छिपी होती थी. उनके इस हंसी मंजाक वाले स्वभाव के कारण बातें इधर उधर फैलती थीं और अक्सर उनके दुश्मनों की संख्या बढ जाती थी. लेकिन जेटली बार बार यही कहते थे कि यार मैं पंजाबी हूं इसलिए हंसी मजाक करना तो मेरे स्वभाव में ही है जिसे लोग गलत समझ लेते हैं.

अब मैं बात करूंगा नेता अरुण जेटली की जिनकी राजनीति मैने पिछले 22-23 सालों में देखी. उसके पहले के बारे में ज्यादातर लोग जानते हैं कि कैसे छात्र राजनीति में आए. कैसे विध्यार्थी परिषद में रहकर इमरजेंसी के खिलाफ लडाई लड़ी और जेल भी गए. धीरे धीरे वकालत में शीर्ष पर पहुंचे और बीजेपी के प्रवक्ता भी बने. फिर राज्यसभा पहुंच कर कैसे वाजपेयी मत्रिमंडल में पहुंचे ये सफर छुपा नहीं है. लेकिन जो मैंने देखा उसकी चर्चा मै जरुर करना चाहूंगा वो भी पिछले दो दशकों को तीन चरणों में बांट कर.

पीएम मोदी और जेटली की दोस्ती काफी पुरानी थी


वाजपेयी सरकार में मंत्री

जेटली 1991 से लगातार बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य (BJP National Executive Members) रहे. वाजपेयी सरकार (Vajpayee Government) में अक्टूबर 1999 को पहली बार अरुण जेटली सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (Information and Broadcasting Minister) बने. जुलाई 2000 (JULY 2000) में उन्हें विनेवेश विभाग का राज्य मंत्री और अक्टूबर 2000 में पहली बार उन्हे कैबिनेट मंत्री (CABINET MINISTER) बनाया गया वो भी अपने पसंदीदा कानून मंत्रालय (LAW MINISTER) का.

लेकिन, वाजपेयी सरकार में तूती बोलती थी प्रमोद महाजन (PRAMOD MAHAJAN) की. फिर भी संकट मोचक के रुप मे अरुण जेटली की अहमियत लगातार बढ़ती चली गई. तहलका कांड (TEHELKA SCANDAL) ने पूरी वाजपेयी सरकार को हिला कर रख दिया था. एक तरफ तो बीजेपी अध्यक्ष पैसे लेते दिखे तो दूसरी ओर रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस के घर जया जेटली की पैसे लेने की तस्वीरें तो जनमानस के दिल और दिमाग में बैठ गयीं थीं. तीन हफ्ते संसद नहीं चली. लेकिन तहलका टेप कांड के सामने आते ही जेटली ने ही मोर्चा संभाला था. संसद से निकल कर जेटली और नीतीश कुमार जॉर्ज फऱ्नांडिस के घर पहुंचे और वहीं एक लंबी प्रेस कांफ्रेस कर पार्टी को एक लाइन दे दी. यहां से भी जेटली एक सितारा बन कर उभरे.

लेकिन, इस दौर में उन्होने अपने कुछ राजनीतिक दोस्तों के साथ संबंध ऐसे पुख्ता किए कि आने वाले दिनों में वो बीजेपी के लिए खासे फायदेमंद साबित होने वाले थे. खासकर शिरोमणी अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल, जेडीयू के नीतीश कुमार, और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी. एक ऐसा रिश्ता कायम हुआ जो उतार चढाव के दौर में भी चलता रहा. गुजरात में केशुभाई पटेल के नेतृत्व में पार्टी थोड़ी पिछड़ती दिखी तो नरेन्द्र मोदी को सीएम बना कर गुजरात भेजने के पक्ष में बीजेपी के शीर्ष नेताओं को करने का काम जेटली ने ही पूरा किया. 2002 दंगों के बाद पीएम वाजपेयी ने सीएम बदलने का मूड बनाया तो ऐसी व्यूहरचना हुई कि नरेन्द्र मोदी की कुर्सी भी बरकरार रही और गोवा में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी का पूरा समर्थन भी मिल गया.

फिर, राम मंदिर जैसे मुद्दे हों या विनिवेश जैसे मुद्दे पर संघ की नाराजगी या फिर स्वदेशी जागरण मंच का विचारधारा से जुडे हर मुद्दे पर सरकार का बचाव करते रहे. यूपीए सरकार सीएम मोदी पर जितने भी आरोप मढ्ती, उनकी काट ढूंढ कर जेटली हमेशा एक ढाल की तरह अपने दोस्त के आगे खड़े रहते थे. मोदी फॉर पीएम के भी मुख्य व्यूहकारों में से एक जेटली भी थे.

अरूण जेटली की कई बातें उन्हें अन्य राजनीतिज्ञों से काफी जुदा रखती हैं


अकाली और बीजेपी गठबंधन ने पंजाब में 10 साल राज किया तो नीतीश कुमार को आगे रख चुनाव लड़ने की रणनीति बिहार में कारगर साबित हुई क्योंकि लालू राज और उनके जाति.य समीकरण को हराना एक मुश्किल ही काम था. नीतीश अलग भी हो गए थे, लेकिन अरुण जेटली से संबंध नहीं टूटे. जब दिल्ली आते मुलाकात होती और एक बार भोजन नीतीश कुमार जेटलीजी के घर पर जरूर करते थे जहां उनके पसंदीदा रसगुल्ले मंगाए जाते थे. 2019 में भी जब सीटों के तालमेंल को लेकर अनबन हुई तो पीएम मोदी ने जेटली को ही लगाया था नीतिश कुमार को पटरी पर लाने के लिए. 2003 में अरुण जेटली मध्यप्रदेश के चुनाव प्रभारी बने और 10 साल से टिके दिग्विजय सिंह के शासन का अंत किया. उमा भारती को मुख्यमंत्री बनाने मे उनकी भी खासी भूमिका रही. धीरे धीरे एक कुशल रणनितिकार के रुप में उनकी छवि निखरने लगी थी. लेकिन वाजपेयी सरकार में प्रमोद महाजन भारी पड़े थे. और लोकसभा चुनावों की पूरी कमान वाजपेयीजी ने प्रमोद महाजन के हाथ सौंप दी थी. लेकिन फील गुड और शाइनिंग इंडिया के फेर में बीजेपी को मुंह की खानी पड़ी थी.

विपक्ष के 10 साल

6 साल राज करने के बाद केन्द्र की सत्ता से बाहर होने के झटके से उबरने की कोशिश में बीजेपी लग गई थी. लोकसभा चुनावों की हार के बाद मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री उमा भारती पर आरोप लगे तो उनको पद छोडने के लिए मनाने का काम भी जेटली ने किया. प्रमोद महाजन के घर अरुण जेटली बैठे थे जहां उमा भारती को भी बुलाया गया था. शाम को वाजपेयी के घर संसदीय बोर्ड होनी थी. उसके पहले उमा को मनाना जरुरी था. उमा मान तो गईं लेकिन संबंधों में खटास आनी शुरु हो चुकी थी. प्रमोद महाजन की असामयिक मौत ने अरुण जेटली को बीजेपी के मुख्य रणनीतिकार के रुम में स्थापित कर दिया था. फिर तो जेटलीजी ने मु़ड कर नहीं देखा. शिखर पर चढते चले गए. नरेन्द्र मोदी और एनडीए के घटक दलों से उनकी दोस्ती ने भी उनको पार्टी के भीतर मजबूत किया. उनका कानूनविद होना भी पार्टी और संघ के लिए खासा फायदेमंद था.

पार्टी के प्रवक्ता के तौर पर अपनी बातें रखना हो या फिर संसद में मनमोहन सरकार को घेरना हो. ये सब अरुण जेटली का काम नजर आने लगा था. राजनाथ पार्टी के अध्यक्ष थे, लेकिन आडवाणी को पीएम इन वेटिंग बनने का मौका मिल गया था. बीजेपी संसदीय बोर्ड और एनडीए ने बतौर पीएम उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी के नाम पर मुहर लगा दी. अरुण जेटली आडवाणी के सबसे भरोसे के सिपहसालार के रुप में स्थापित हो चुके थे. फिर क्या था पूरी की पूरी कमान उनके हाथ में आ गई. अनंत कुमार के घर तुगलक क्रिसेंट में चुनावों के लिए बीजेपी का वॉर रुम बना. लेकिन आडवाणी-जेटली का दांव नहीं चला. यूपीए की सरकार दोबारा बन गई थी. आडवाणी ने बतौर नेता अपना इस्तीफा संसदीय बोर्ड की बैठक में दिया तो जरुर लेकिन अपने सिपहसालारों की वजह से उसे वापस भी ले लिया.

मोदी 1 का कार्यकाल पूरा होने से पहेल से ही अरुण जेटली का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था.


अब बारी थी संघ की जिन्हे कमान युवा पीढ़ी के हवाले करनी थी. बात चल रही थी की अरुण जेटली को राज्यसभा में नेता विपक्ष बनाया जाए. लेकिन इस वक्त ही जेटली को एक बड़े राजनीतिक संकट का सामना भी करना पड़ा. जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी , राम जेठमलानी सरीखे नेता लग गए जेटली हटाओ अभियान में. सब आडवाणी के करीबी थे और एक के बाद एक खत लिख कर ये मांग कर रहे थे कि अगर जेटली के कारण चुनाव हारे हैं तो उनको नेता विपक्ष का इनाम क्यों दिया जा रहा है. राजनाथ सिंह पार्टी के अध्यक्ष थे, लेकिन फैसला आडवाणी को करना था. जेटली ने किसी का कोई जवाब नहीं दिया. चुनावी नतीजों के चंद हफ्तों के बाद वो आडवाणी को बताकर अपने परिवार के साथ विदेश चले गए. उनके खिलाफ ये विद्रोह भी धीरे धीरे शांत हो गया.

जेटली वापस आए और राज्य सभा में नेता विपक्ष बन कर बीजेपी के हमलों की धार तेज कर दी. उधर सुषमा स्वराज भी आडवाणी की जगह लोकसभा में विपक्ष की नेत्री बन गई थीं. ये वक्त था जब यूपीए 2 में घोटालों और सीएजी की रिपोर्ट्स ने धमाल मचा रखा था. संसद के अंदर और बाहर जेटली ही हमलों को धार दे रहे थे. पार्टी के प्रवक्ता उनकी पसंद के थे. सिर्फ राजनाथ सिंह की जगह नीतिन गटकरी अध्यक्ष बन गए थे. लेकिन जेटली चाणक्य बने रहे. 2जी, कोयला घोटाला, घोटालों की ऐसी लंबी लाइन लगी की बीजेपी के हमलों में धार आ गयी. अरुण जेटली के लिए ये मौका ऐसा था जिसने उन्हें मनमोहन सरकार पर हमले की धूरी बना दिया. इसी वक्त हिंदू आतंक, मालेगांव धमाको संघ से जोडने की कोशिशों में युपीए सरकार और उसके मंत्री लग गए थे. ऐसे में संघ और बीजेपी को बेदाग रखने के लिए कानूनी और राजनीतिक ल़डाई लडने की में पूरी मुहिम अरुण जेटली के कंधो पर ही रही और जिसको उन्होने बखूबी निभाया भी.

ARUN JAITLEY AND NITSH KUAMR FRIENDSSHIP
अरुण जेटली की बिहार के सीएम नीतीश कुमार से मित्रता भी किसी से छुपी नहीं है


जब यूपीए सरकार पूरी तरह अपनी विश्वसनियता खो चुकी थी तो बीजेपी में भी सुगबुगाहट हुई कि किसके नेतृत्व में पार्टी चनाव लड़े. सुषमा स्वराज, खुद अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, गडकरी को हटाकर राजनाथ सिंह बीजेपी के अध्यक्ष बन चुके थे. ऐसे में अरुण जेटली ने अपनी हदों को समझते हुए नरेन्द्र मोदी के लिए बैटिंग शुरु कर दीं. अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी आडवाणी के विरोध के बावजुद मोदी के पक्ष में ही जाना बेहतर समझा. आरएसएस तक हवा का रुख पहचान कर मोदी के पीछे खड़ा हो गया था. अब जनमत कांग्रेस के खिलाफ था और गुजरात की मजबूती देख कर जनमानस पर भी नरेन्द्र मोदी को लेकर एक उम्मीद थी. गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में राजनाथ सिंह ने मोदी के नेतृत्व में ही चुनावों में जाने का फैसला ले ही लिया. आडवाणी गोवा नहीं पहुंचे और ना ही उन्होंने मोदी के नाम का अनुमोदन किया. साफ था कि आडवाणी का युग समाप्त होने वाला था और पूरी कमान उनकी बनाई हुई दूसरी पीढी के हाथ चली गयी थी.

2014---मोदी युग और जेटली

स्पष्ट बहुमत से जीत कर बीजेपी और एनडीए की सरकार बनी और मोदी प्रधानमंत्री. जेटली इस आंधी में भी अमृतसर से चुनाव हार गए थे. लेकिन मोदीजी ने उनका साथ नहीं छोडा. शपथ लेने के पहले ही साफ हो गया था कि अरुण जेटली की इस सरकार के गठन में क्या भूमिका होने वाली है. गुजरात भवन में दिन-रात चर्चाओं का दौर चलता था और सरकार की तस्वीर जब उभर कर समाने आई तो छाप अरूण जेटली की ही थी. मंत्री भी उन्ही की पसंद के, विभाग भी उनके हिसाब से ही बंटे. मोदीजी बार बार यही कहते थे कि दिल्ली उन्हें समझ मे नहीं आती और उनकी जानकारियां जेटलीजी ही पूरा करते हैं.

आलम ये है कि पीएम मोदी को मीडिया के मित्रों के मिलवाने का काम भी अरुण जेटली ने ही किया. तीन दिनों तक लगातार अरुण जेटली के सरकारी आवास पर मुलाकातों का दौर चला. एक शाम चैनलों के संपादकों, एक शाम चैनल और अखबार के मालिकों के साथ साथ एक शाम बीजेपी बीट कवर करने वाले एक दर्जन पत्रकारों को भी देश के दो सबसे शक्तिशाली लोगों से गप्पें मारने का मौका मिल गया. जेटली एक बार फिर शीर्ष पर थे.

स्पष्ट बहुमत से जीत कर बीजेपी और एनडीए की सरकार बनी और मोदी प्रधानमंत्री
स्पष्ट बहुमत से जीत कर बीजेपी और एनडीए की सरकार बनी और मोदी प्रधानमंत्री


मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में दो बड़े फैसले हुए जिसको लेकर खासा बवाल उठा. दोनो मुद्दों ने कांग्रेस के हमलों को तीखी धार भी दे दी थी. ये थे नोटबंदी और जीएसटी. ये वित्त मंत्री अरुण जेटली की काबिलियत थी की जीएसटी में आई बाधाओं को अपनी जिरह और सौम्य वय्वहार से विरोधियों को पटरी पर लाकर नैय्या पार लगा दी. ये एक बहुत बड़ी जीत थी, जिसमें सभी राज्य सरकारों की भी सहमति मिल गई थीं. इसके बावजुद जब गब्बर सिंह टैक्स जैसे आरोपों से निपटने की बात आई तो जेटली ने आगे बढ कर मोर्चा संभाला था ताकि पीएम मोदी अपने विकास के कामों में लगे रहे. नोटबंदी भी ऐसा फैसला दी जिसकों बतौर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बखूबी संभाला.

पिछले एक-दो सालों मे स्वास्थ्य बिगडता गया

मोदी 1 का कार्यकाल पूरा होने से पहेल से ही अरुण जेटली का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था. कई तरह की बीमारियों ने उन्हें जकड़ा हुआ था. खाने पीने के शौकिन थे लिहाजा परहेज बड़ी मुस्किल से हो पाता था. आलम ये था कि संसद मे बजट भी वो खड़े होकर नहीं पढ पा रहे थे. लेकिन किडनी ट्रांसप्लांट के बाद तो स्थितियां बिगडती चलीं गईं. चुनावों के ठीक पहले उन्हें इलाज के लिए अमरीका भी जाना पड़ा था. लौट कर आए तो जरुर और चुनावों में ब्लॉग लिख कर, चंद इंटरव्यू देकर और बीजेपी प्रवक्ताओं को सही दिशा देकर भी वो सरगर्मी में शामिल रहे. धीरे धीरे उनकी सार्वजनिक उपस्थिति कम होती जा रही थी. चुनावों के बाद तो उन्होने पीएम मोदी को खत लिख कर साफ कर दिया था कि खराब स्वास्थ्य के चलते वो सरकार को हिस्सा नहीं बनेंगे. फिर भी पीएम मोदी शपथ ग्रहण के पहले उनसे मिलने उनके घर जा पहुंचे.

सरकारी आवास खाली कर वो अपने प्राइवेट आवास में भी चले गए थे
सरकारी आवास खाली कर वो अपने प्राइवेट आवास में भी चले गए थे


मुलाकात में क्या पका ये तो सामने नहीं आया लेकिन इतना तो साफ हो चला था कि जेटली युग का भी अंत करीब आ गया है. सरकारी आवास खाली कर वो अपने प्राइवेट आवास में भी चले गए थे. लेकिन इलाज की लंबी प्रक्रिया ने उन्हें बिस्तार से ही बांध दिया था.

राजनीति में तो वो अपने विरोधियों से आर पार कर आगे बढ़ने का रास्ता तलाश लिया था, लेकिन बीमारी से हार गए. और एक युग का अंत हो गया जिसने बीजेपी को आवाज दी, टीवी की दुनिया में मैदान मारने की कला सिखाई. राजनीति में हर किसी की जगह लेने वाला कोई न कोई मिलता है लेकिन अपनी काबिलियत से उन्होने एक ऐसी छाप छोडी की उस खालीपन को भरना आसान नहीं होगा.

ये भी पढ़ें:

अरुण जेटली के बेटे ने PM मोदी से कहा- आप देश के लिए बाहर गए हैं, दौरा रद्द न करें
जानिए अरुण जेटली के परिवार के सदस्यों के बारे में, क्या करते हैं उनके बच्चे
अरुण जेटली के निधन पर भावुक हुए क्रिकेटर गौतम गंभीर, बताया पिता तुल्य
अरुण जेटली ने अंतिम समय में इन लोगों को किया याद

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए Delhi से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: August 24, 2019, 5:46 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...