तो इसलिए PM मोदी अरुण जेटली पर करते थे आंख मूंदकर भरोसा

विक्रांत यादव | News18Hindi
Updated: August 24, 2019, 4:43 PM IST
तो इसलिए PM मोदी अरुण जेटली पर करते थे आंख मूंदकर भरोसा
अरुण जेटली ( फाइल फोटो)

पीएम बनने के बाद मोदी (PM Modi) ने एक बार कहा भी था कि दिल्ली के जायके के बारे में उन्हें अरुण जेटली (Arun Jaitley) से ही पता चलता था.

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'मुझे मंत्रिमंडल में कोई जिम्मेदारी ना देकर सेहत पर ध्यान देने के लिए पूरा वक्त दिया जाए. हालांकि मेरे पास सरकार या पार्टी के लिए अनौपचारिक तौर पर कोई भी काम करने का बहुत वक्त होगा.' ('I would obviously have a lot of time at my disposal to undertake any work informally to support the government or the party'), 2019 के लोकसभा चुनाव (2019 Lok Sabha Elections) में शानदार जीत के बाद जब मोदी सरकार दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ लेने वाली थी, तो उससे ठीक एक दिन पहले 29 मई 2019 को बीजेपी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली की चिट्ठी ने हड़कंप मचा दिया था. ऊपर लिखी लाइन उसी चिट्ठी के आखिरी शब्द थे. अरुण जेटली (Arun Jaitley) जिन्हें पहले बीजेपी (BJP) के लिए संकट मोचक या (trouble shooter) कहा जाता था. साल  2014 के बाद वो मोदी सरकार के सबसे बड़े संकट मोचक बन गए. स्वास्थ्य कारणों से मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में उन्होंने स्वयं मंत्री बनने से इनकार कर दिया था, लेकिन उनके पीएम मोदी को लिखे पत्र की आखिरी लाइन बताती है कि सरकार और पार्टी के लिए संकट मोचक की अपनी भूमिका के लिए वो अनौपचारिक रूप से सक्रिय रहना चाहते थे.

पीएम बनने के बाद मोदी ने एक बार कहा भी था कि...
2014 में जब बीजेपी को ऐतिहासिक बहुमत मिला था और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में दिल्ली आ रहे थे तो अरुण जेटली उन भरोसेमंद नेताओं में से एक थे, जिस पर दिल्ली के लिए तब तक 'आउटसाइडर' मोदी आंख मूंदकर भरोसा कर सकते थे. पीएम बनने के बाद मोदी ने एक बार कहा भी था कि दिल्ली के जायके के बारे में उन्हें जेटली से ही पता चलता था. पीएम मोदी को उन पर भरोसा किस कदर था, इसका अंदाजा इस बात से भी लग सकता है कि उन्हें रायसीना हिल्स के चार अहम मंत्रालयों में से दो नॉर्थ ब्लॉक (वित्त मंत्रालय) और साउथ ब्लॉक (रक्षा मंत्रालय) में एक साथ बैठने का मौका मिला.

सितंबर 2013 में अरुण जेटली ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखा था

इस भरोसे का कारण जेटली की कार्य क्षमता, राजनीतिक कुशलता के साथ- साथ विश्वास भी था, जो समय के साथ नरेंद्र मोदी के साथ विकसित हुआ था. 2002 से लेकर 2013 तक गोधरा, सोहराबुद्दीन शेख, इशरत जहां जैसे चर्चित मामलों में जहां विपक्ष नरेंद्र मोदी और अमित शाह को घेरने की कोशिश करता था, वहीं अरुण जेटली मजबूती से राजनीतिक और कानूनी तरीके से बचाव करते थे. सितंबर 2013 में अरुण जेटली ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखा था, जो काफी चर्चित रहा था. उस पत्र में उन्होंने इन सभी मामलों का जिक्र करते ही यूपीए पर जांच एजेंसियों का दुरुपयोग और बीजेपी नेताओं को फंसाने की कोशिश करने का आरोप लगाया था.

संसद के भीतर बहस के जरिए और संसद के बाहर प्रेस वार्ता के जरिए सरकार का बचाव किया
सरकार में रहते हुए भी अनेक मौके आए, जब जेटली संकट मोचक के तौर पर मजबूती से खड़े नजर आए. राफेल के मामले में कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी सरकार पर तीखे हमले कर रहे थे. यूं तो रक्षा मंत्री होने के नाते निर्मला सीतारमन जवाब दे रही थी, लेकिन अपने तर्कों के साथ जेटली ने कमान संभाली. संसद के भीतर बहस के जरिए और संसद के बाहर प्रेस वार्ता के जरिए सरकार का बचाव किया. ये मुद्दा जनता के बीच अपनी पैठ नहीं बना पाया. इसके पीछे एक कारण ये भी रहा. जेटली की गिनती मोदी सरकार के बेहतरीन कम्यूनिकेटर में होती थी. जिनकी हिंदी और अंग्रेजी पर जबरदस्त पकड़ थी.
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अरुण जेटली के आलोचक उन्हें इस बात पर घेरते थे कि वो जनता के नेता नहीं हैं और 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में भी हार गए थे. लेकिन ये भी तथ्य है कि पिछले एक दशक से ज्यादा समय में कई राज्यों के विधानसभा चुनाव उनकी देख रेख में हुए और बीजेपी ने उन्हें जीता भी. किसी भी बिल पर बहस के दौरान संवैधानिक मसलों पर उनकी पकड़ और राजनीतिक दांव- पेंच विरोधियों को पस्त करने के लिए काफी होता था. देश की जनता को जटिल तेल के बढ़ते दाम का वैश्विक कारण समझाना हो या 'एक देश एक टैक्स' की अवधारणा को पूर्ण करने के लिए GST लागू करना हो, ये अरुण जेटली की कार्यकुशलता ही थी, जिसने तीन तलाक जैसे संवैदनशील बिल को तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई.

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First published: August 24, 2019, 2:38 PM IST
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