लाइव टीवी

अयोध्या केस: मुस्लिम पक्ष ने कहा- बाबर के काम को इस्लामिक कानून की कसौटी पर नहीं परख सकते

Sushil Pandey | News18Hindi
Updated: September 30, 2019, 11:17 PM IST
अयोध्या केस: मुस्लिम पक्ष ने कहा- बाबर के काम को इस्लामिक कानून की कसौटी पर नहीं परख सकते
सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू पक्षकारों से कहा कि मुस्लिम पक्ष की दलीलों पर गुरुवार तक अपना जवाब दें (File Photo)

अयोध्या भूमि विवाद (Ayodhya Land Dispute) पर निर्मोही अखाड़े (Nirmohi Akhara) के दावों को लेकर निज़ाम पाशा (Nizam Pasha) ने दिलचस्प दलील दी. पाशा ने कहा- निर्मोही का मतलब है कि जो मोह से परे हो. जिसे सम्पतियों से लगाव न हो, वो निर्मोही कहलाता है. लेकिन अखाड़ा उसी (सम्पति) के लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 30, 2019, 11:17 PM IST
  • Share this:
नई दिल्ली. अयोध्या मामले (Ayodhya Case) की सोमवार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में 34वें दिन सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष (Muslim Side) के वकील निज़ाम पाशा ने एक मस्जिद के तौर पर बाबरी मस्जिद (Babri Masjid) की वैधता पर उठाए गए हिंदू पक्ष (Hindu Side) के सवालों का जवाब दिया. हिंदू पक्ष का कहना था कि इस्लामिक क़ानून के लिहाज से बाबरी मस्ज़िद एक वैध मस्जिद नहीं कही जा सकती. किसी की ज़मीन पर जबरन कब्ज़ा करके या धार्मिक स्थान को तोड़कर बनाई मस्जिद वैध नहीं हो सकती.

निजाम पाशा ने इस पर जवाब दिया कि बाबर (Babar) बादशाह था, वो सर्वेसर्वा था. वो वक्त था, जब देश में कोई संविधान लागू नहीं था. बादशाह खुद में क़ानून था. वो किसी इस्लामिक क़ानून (Islamic law) से भी नहीं बंधा था. उसे जो सही लगा, उस लिहाज से उसने मस्जिद का निर्माण कराया. उसके काम को आज के क़ानून या इस्लामिक क़ानून की कसौटी पर नहीं आंक सकते. बाबर के वक्त शरिया क़ानून लागू नहीं या था. कुरान के सिद्धांत के आधार पर ये तो तय हो सकता है कि उसने पाप किया या नहीं, लेकिन क़ानूनी वैधता पर सवाल नहीं उठा सकते.

'निर्मोही होकर भी संपत्ति से मोह'
विवादित ज़मीन पर निर्मोही अखाड़े के दावों को लेकर निज़ाम पाशा ने दिलचस्प दलील दी. पाशा ने कहा- निर्मोही का मतलब है कि जो मोह से परे हो. जिसे संपत्तियों से लगाव न हो, वो निर्मोही कहलाता है. लेकिन अखाड़ा उसी (संपत्ति) के लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ रहा है.

'मस्जिद का कोई भी तय डिजाइन ज़रूरी नहीं'
निजाम पाशा ने ये भी कहा कि बाबरी मस्ज़िद की वैधता पर सवाल उठाने वाले हिंदू पक्ष की दलीलें गलत हैं. बिना किसी मीनार के या बिना वजूखाने के भी मस्जिद हो सकती है. मस्जिद के डिजाइन का शरिया से सीधा कोई वास्ता नहीं है. क्षेत्र विशेष के वास्तु शिल्प के आधार पर मस्जिद बनाई जाती रही है. ये देखना होगा कि लोग क्या मानते हैं. क्या बाबरी मस्जिद में वजू करने की व्यवस्था थी या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इस्लाम में घर से भी वजू करके मस्जिद आने की परंपरा रही है.

when allahabad high court divided ayodhya ram mandir babri masjid disputed land into 3 parts
मुस्लिम पक्ष ने निर्मोही अखाड़े के संपत्ति को लेकर मोह पर सवाल खड़े किए हैं.

Loading...

शेखर नाफड़े की दलील
निज़ाम पाशा से पहले मुस्लिम पक्ष के वकील शेखर नाफड़े ने दलीलें रखीं. शेखर नाफड़े की दलील कानून के ‘रेस ज्यूडिकाटा’ सिद्धांत पर आधारित थी. इस सिद्धांत के मुताबिक, अगर किसी मामले का कोर्ट में निपटारा हो जाए तो उसे बार-बार नहीं उठाया जा सकता. शेखर नाफड़े का कहना था कि 1885 में फैज़ाबाद कोर्ट से मंदिर निर्माण की रघुवर दास की याचिका खारिज हो गई थी. लिहाजा अब इन याचिकाओं पर सुनवाई नहीं होनी चाहिए. वैसे इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट 'रेसज्युडिकाटा' को लेकर मुस्लिम पक्ष की दलील को खारिज कर चुका है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी माना था कि रघुवर दास ने याचिका व्यक्तिगत रूप से की थी. उनकी याचिका को पूरे हिंदू समाज की याचिका नहीं कहा जा सकता है.

क्या रघुवर दास हिंदू समाज के प्रतिनिधि?
शेखर नाफड़े ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष को गलत बताया और ये साबित करने की कोशिश की कि मंहत रघुवरदास को मठ और हिंदुओं का क़ानूनी प्रतिनिधि माना जा सकता है. नाफड़े ने कहा कि रघुवर दास के नाम के आगे महंत लगा था. महंत का मतलब होता है किसी अखाड़े का प्रतिनिधि या पूरे समाज का प्रतिनिधि.

जस्टिस बोबडे ने इस पर नाफड़े को टोका और कहा- अखाड़े और हिंदुओं ने ऐसा कोई दावा नहीं किया कि रघुवर दास उनके प्रतिनिधि हैं. खुद महंत रघुवर दास ने ऐसा दावा नहीं किया कि उन्होंने मठ या पूरे हिन्दू समाज की ओर से अर्जी दायर की है.

हिंदू पक्ष की ओर के परासरन की दलील
मुस्लिम पक्ष की ओर से दलीलें रखे जाने के बाद रामलला की ओर से वकील के परासरन ने श्रीरामजन्म स्थान को न्यायिक व्यक्ति का दर्ज़ा देकर उनकी ओर से केस दायर करने पर अपनी दलीलें रखीं. उन्होंने कहा- यहां न्यायिक व्यक्ति की परिभाषा को हिंदू क़ानून के लिहाज से देखने की ज़रूरत है, न कि किसी रोमन या अंग्रेजी क़ानूज की नज़र से. हिंदू धर्म में ईश्वर एक ही है, लेकिन उनकी विभिन्न मन्दिरों में विभिन्न तरीकों से, विभिन्न स्वरूपों में पूजा होती रही है. आम भक्त ईश्वर की आराधना सगुण रूप में करते हैं. इसी मकसद से मन्दिर के मूर्ति स्थापित की जाती है, उनकी प्राण प्रतिष्ठा की जाती है और न्यायिक व्यक्ति का दर्जा देना उनके अधिकारों की रक्षा के लिए है. भक्तों की ये आस्था रहती है कि खुद ईश्वर उस मूर्ति के जरिए प्रकट हुए हैं. इस लिहाज से वो संपत्ति के मालिक हैं.

हिंदू पक्ष के पास जवाब देने के लिए शुक्रवार तक का वक़्त
सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू पक्षकारों से कहा कि मुस्लिम पक्ष की दलीलों पर गुरुवार तक अपना जवाब दें. शुक्रवार को राजीव धवन सुन्नी वक्फ़ बोर्ड की तरफ से दलील देंगे. हालांकि रामजन्मभूमि पुनरोद्धार समिति के वकील पीएन मिश्रा ने कोर्ट से और समय की मांग की लेकिन चीफ जस्टिस ने इससे इनकार कर दिया. चीफ जस्टिस ने कहा- हमारे पास समय नहीं है, आप वो चीज मांग रहे हैं जो हमारे पास है ही नहीं.

ये भी पढ़ें-

अयोध्या मामला: मध्यस्थता प्रक्रिया में भाग लेना नहीं चाहते हैं रामलला के वकील

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए अयोध्या से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: September 30, 2019, 10:41 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...