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Ayodhya Verdict: रामलला विराजमान कैसे बने पक्षकार?

News18Hindi
Updated: November 10, 2019, 12:05 AM IST
Ayodhya Verdict: रामलला विराजमान कैसे बने पक्षकार?
सुप्रीम कोर्ट में 9 साल चला मामला

Supreme Court on Ayodhya Case: रामलला विराजमान (Ram lalla Virajman) को सबसे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पार्टी माना था. रिटायर्ड जज देवकीनंदन अग्रवाल (Devkinandan Agarwal) ने रामलला को पार्टी बनाने की मांग की थी.

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नई दिल्ली. अयोध्या विवाद (Ayodhya Dispute) में भगवान राम (रामलला) भी एक इंसान की तरह ही पक्षकार थे. जब इस केस में रामलला विराजमान (Ram lalla Virajman) को भी एक पक्ष के तौर पर शामिल करने की अर्जी दी गई तब इसका किसी ने विरोध नहीं किया था. यह अर्जी 1 जुलाई 1989 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक रिटायर्ड जज देवकीनंदन अग्रवाल ने दी थी. उन्होंने रामलला विराजमान को इस केस में पार्टी बनाने की अपील दायर की. जानकार बताते हैं कि जब फैजाबाद की अदालत में रामलला विराजमान की तरफ से दावा पेश किया गया तब सिविल कोर्ट के सामने इस विवाद से जुड़े चार केस पहले से ही चल रहे थे. जुलाई 1989 में ये सभी पांच मामले इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में ट्रांसफर कर दिए गए.

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने शनिवार को निर्मोही अखाड़ा (Nirmohi Akhara) और शिया वक्फ बोर्ड का दावा खारिज करके विवादित जमीन रामलला विराजमान को दे दी. रामलला विराजमान को सबसे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पार्टी माना था. हाईकोर्ट ने सितंबर 2010 में अयोध्या की विवादित जमीन को तीन पक्षों-निर्मोही अखाड़ा, रामलला विराजमान और यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में बांटने को कहा था.

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सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया निर्मोही अखाड़ा का दावा


रामलला नाबालिग हैं, इसलिए उनके मित्र के तौर पर उनका मुकदमा इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज देवकीनंदन अग्रवाल ने लड़ा. अग्रवाल के निधन के बाद विश्‍व हिंदू परिषद के त्रिलोकी नाथ पांडेय ने रामलला विराजमान के पक्षकार के तौर पर कमान संभाली. अब सुप्रीम कोर्ट में 40 दिनों तक चली सुनवाई में रामलला विराजमान की तरफ से वरिष्‍ठ वकील के. पारासरन पैरवी कर रहे थे.

रामलला के केस लड़ने का क्या था आधार?
अयोध्या मामले में रामलला के पक्षकार बनने की कहानी दिलचस्प है. जिस मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा की गई होती है उसे हिंदू मान्यताओं में जीवित इकाई के तौर पर देखा जाता है. हालांकि यहां मूर्ति नाबालिग मानी गई. देवकीनंदन अग्रवाल ने कहा कि रामलला को पार्टी बनाया जाए, क्‍योंकि विवादित इमारत में साक्षात भगवान रामलला विराजमान हैं. इसी दलील को मानते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रामलला विराजमान को पार्टी पक्षकार माना.

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First published: November 9, 2019, 1:52 PM IST
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