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'सेनापति विहीन' कांग्रेस कैसे करेगी दिल्ली में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी?

Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: September 14, 2019, 8:51 PM IST
'सेनापति विहीन' कांग्रेस कैसे करेगी दिल्ली में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी?
पिछले कुछ दिनों से दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष पद को लेकर चर्चाएं तो बहुत हो रही हैं लेकिन अभी तक किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन पाई है. (FILE PHOTO)

अगले साल की शुरुआत में या फिर इस साल के अंत तक दिल्‍ली विधानसभा (Delhi Assembly Election) के चुनाव होने हैं. दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर जहां आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) और बीजेपी (BJP) जैसी पार्टियां मैदान में ताल ठोकने लगी है. वहीं कांग्रेस को अब भी अध्यक्ष का चेहरा नहीं मिल रहा है.

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  • Last Updated: September 14, 2019, 8:51 PM IST
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नई दिल्ली. पिछले कुछ दिनों से दिल्ली कांग्रेस (Delhi Congress) के अध्यक्ष पद को लेकर चर्चाएं तो बहुत हो रही हैं, लेकिन अभी तक किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन पाई है. पार्टी के अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) दिल्ली कांग्रेस (Delhi Congress) अध्यक्ष पद पर सहमति बनाने के लिए प्रयास तो बहुत कर रही हैं, लेकिन प्रयास में अब तक उनको कामयाबी हासिल नहीं हुई है. अगले साल की शुरुआत में या फिर इस साल के अंत तक दिल्‍ली विधानसभा (Delhi Assembly Election) के चुनाव होने हैं. दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर जहां आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) और बीजेपी (bjp) जैसी पार्टियां मैदान में ताल ठोकने लगी है. वहीं कांग्रेस को अब भी अध्यक्ष का चेहरा नहीं मिल रहा है.

शीला दीक्षित की मौत के बाद पद खाली
शीला दीक्षित (Sheila Dikshit) के निधन के बाद से ही दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष का पद खाली पड़ा है. कांग्रेस के एक बड़े नेता का कहना है कि सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) इसको लेकर बहुत चिंतित हैं. बीते कुछ दिनों से सोनिया गांधी दिल्ली कांग्रेस के कई दिग्गजों से लगातार मिल भी रही हैं. सोनिया गांधी से मिलने वालों में प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अजय माकन, पूर्व मंत्री अरविंदर सिंह लवली. एके वालिया, हारुण यूसुफ, सुभाष चोपड़ा, किरण वालिया, मंगतराम सिंघल, नरेंद्रनाथ और रमाकांत गोस्वामी जैसे नाम प्रमुख तौर शामिल हैं.

 दिल्ली में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नहीं होने से कार्यकर्ताओं में असमंजस की स्थिति बनी हुई है

दिल्ली में कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष नहीं होने से कार्यकर्ताओं में असमंजस की स्थिति बनी हुई है. प्रदेश कांग्रेस प्रभारी पीसी चाको से तो सोनिया गांधी ने कई दौर की बैठकें की हैं, लेकिन अभी तक किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन पाई है. बीते शनिवार को भी दिल्ली में नए अध्यक्ष के ऐलान के लिए सोनिया गांधी के घर पर बैठकें हुई थीं, जिसका कोई नतीजा नहीं निकल पाया था. बीते 10-15 दिनों में कई दौर की बैठकों के बाद भी सोनिया गांधी किसी एक नाम पर सहमति नहीं बना पाई हैं. पूर्व अध्यक्ष अजय माकन, अरविंदर सिंह लवली, सुभाष चोपड़ा, कांग्रेस प्रभारी पीसी चाको बैठक में शामिल तो हो रहे हैं, लेकिन नतीजा नहीं निकल पा रहा है.

गुटबाजी के कारण अभी तक नाम तय नहीं
दिल्ली कांग्रेस प्रभारी पीसी चाको का कहना है कि अगले कुछ दिनों में दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष का ऐलान कर दिया जाएगा. ये बातें बीते कई दिनों से कांग्रेसी नेताओं के द्वारा मीडिया में कही जा रही हैं. इस तरह की भी खबरें आ रही हैं कि जेपी अग्रवाल और अजय माकन में से किसी एक को दिल्ली कांग्रेस की कमान दी जा सकती है. इसके अलावा भी कुछ नेताओं का नाम शामिल है. ऐसा भी कहा जा रहा है कि सोनिया गांधी किसी युवा चेहरे पर भी दांव लगा सकती हैं. ऐसे में आप (AAP) की चांदनी चौक से विधायक अलका लांबा और लवली का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है.
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सोनिया गांधी किसी युवा चेहरे पर भी दांव लगा सकती हैं
सोनिया गांधी किसी युवा चेहरे पर भी दांव लगा सकती हैं


लेकिन, दिल्ली कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता न्यूज 18 हिंदी से बातचीत में कहते हैं, 'अलका लांबा 5-6 साल से कांग्रेस पार्टी से दूर रही हैं. लांबा का चांस इसलिए कम है क्योंकि वह आम आदमी पार्टी में रह कर कांग्रेस में आई हैं. अभी सोनिया गांधी इस तरह का निर्णय नहीं ले सकती हैं, जिससे पार्टी नेताओं में असंतोष उभरे. हरियाणा में अध्यक्ष पद के ऐलान के बाद सोनिया गांधी पर दबाव है कि जल्द से जल्द वह दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष का ऐलान कर दें.'

तीनों कार्यकारी अध्यक्षों में तकरार
कांग्रेस के एक नेता ने न्यूज 18 हिंदी के साथ बातचीत में कहते हैं, 'फिलहाल दिल्ली कांग्रेस में तीन कार्यकारी अध्यक्ष हैं. दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री हारून युसूफ, कांग्रेस नेता देवेंद्र यादव और राजेश लिलोठिया कार्यकारी अध्यक्ष हैं. तीनों नेताओं में कहीं तालमेल नहीं है. हारून और देवेंद्र अलग-अलग काम कर रहे हैं तो लिलोठिया कांग्रेस कार्यालय में बैठकें कर रहे हैं. कांग्रेस विधानसभा चुनाव को लेकर न तो प्रचार नीति बन पा रही है और न ही कोई निर्णय ही ले पा रही है. कार्यकर्ता नेताओं के चौखट पर जाते हैं तो उनको निराशा हाथ लगती है.

1998 से 2013 तक लगातार तीन बार सत्ता में रही कांग्रेस की नजरें तो आगामी विधानसभा चुनाव पर टिकी हुई हैं
1998 से 2013 तक लगातार तीन बार सत्ता में रही कांग्रेस की नजरें तो आगामी विधानसभा चुनाव पर टिकी हुई हैं


1998 से 2013 तक लगातार तीन बार सत्ता में रही कांग्रेस की नजरें तो आगामी विधानसभा चुनाव पर टिकी हुई हैं, लेकिन संगठन और नेतृत्व की कमी के कारण कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में निराशा का माहौल है. दूसरी ओर बीजेपी और आप ने तो अपना अभियान भी शुरू कर दिया है. आम आदमी पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस दोनों को करारी मात दी थी. साल 2013 के विधानसभा चुनाव में आप और कांग्रेस पार्टी ने मिलकर सरकार बनाई थी, लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का सफाया हो गया था. इस चुनाव में आप ने 70 में से 67 और बीजेपी ने 3 सीटें जीती थीं.

'कांग्रेस समय पर सही निर्णय नहीं ले पाती है'
वरिष्ठ पत्रकार संजीव पांडेय कहते हैं, 'कांग्रेस की यह पुरानी आदत रही है कि वह निर्णय लेने में बहुत देर कर देती है. कांग्रेस की यह कमजोरी आज के दौर में पार्टी के लिए घातक साबित होगी. वह भी दिल्ली जैसे जगहों पर जहां पर विपक्षी पार्टियां काफी मजबूत है. हरियाणा में भी कांग्रेस ने अंतिम समय में अध्यक्ष घोषित किया जब चुनाव नजदीक है. जहां तक दिल्ली में अनुभवी युवा चेहरे पर ही दांव खेलने की बात है तो मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता. हो सकता है कि कांग्रेस किसी महिला चेहरे को अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दे, लेकिन क्योंकि शीला दीक्षित के कद की कोई महिला नेता कांग्रेस में नहीं है इसलिए पार्टी पुराने चेहरे पर ही भरोसा करेगी. काफी बुजुर्ग और अनुभवहीन युवा नेताओं को भी प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सौंपे जाने में मुझे संदेह नजर आ रहा है. अजय माकन, अरविंदर सिंह लवली और जेपी अग्रवाल सशक्त दावेदारों में हैं. इन्हीं तीनों में से किसी एक को प्रदेश कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया जा सकता है.'

अनुभवहीन युवा नेताओं को प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सौंपे जाने में कुछ संदेह नजर आ रहा है
अनुभवहीन युवा नेताओं को प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सौंपे जाने में कुछ संदेह नजर आ रहा है


ऐसे में जब पार्टी नेताओं में ही नेतृत्व को लेकर अस्वीकार्यता सामने आ रही है. पार्टी के अंदर आपसी खींचतान की वजह से अध्यक्ष पद की घोषणा में देरी हो रही है. ऐसे में कैसे उम्मीद किया जाए कि आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी सत्ता में वापसी कर सकती है. एक तरफ कार्यकर्ताओं के मनोबल पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है तो दूसरी तरफ कांग्रेस की गिरती साख और संगठन की विफलता ने विपक्षी पार्टियों को आसान मौका दे दिया है.

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First published: September 14, 2019, 6:41 PM IST
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