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दिल्ली में साल भर जहरीली रहती है हवा, सिर्फ किसानों को कोसना छोड़िए!

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: November 7, 2019, 10:52 AM IST
दिल्ली में साल भर जहरीली रहती है हवा, सिर्फ किसानों को कोसना छोड़िए!
ज़हरीली हो गई है दिल्ली की हवा

Air Quality Index: दिल्ली में डस्ट और गाड़ियों के प्रदूषण (Pollution) पर नहीं लगी लगाम तो कभी नहीं मिलेगी साफ हवा. पराली (Parali) जलाने को नहीं ठहराया जा सकता जायज. लेकिन किसानों की आड़ में अपनी कमियों पर पर्दा नहीं नहीं डाल सकती दिल्ली

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  • Last Updated: November 7, 2019, 10:52 AM IST
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नई दिल्ली. दिल्ली (Delhi) के एक छोर पर एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 300 है तो दूसरे पर 1600 तक पहुंच गया है. अगर यहां के प्रदूषण (Pollution) के लिए सिर्फ पराली (Parali) ही जिम्मेदार है तो ऐसा नहीं होना चाहिए. एक ही शहर के प्रदूषण के आंकड़ों में इतना अंतर बताता है कि दिल्ली के गैस चैंबर बनने के पीछे अपने खुद कारण भी हैं. इसलिए 15 दिन तक हरियाणा-पंजाब (Haryana-Punjab) के किसानों (Farmers) को कोसने की बजाए स्थानीय कारणों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. क्योंकि बारिश और गर्मी के कुछ महीनों को छोड़ दिया जाए तो दिल्ली में हमेशा प्रदूषण का जानलेवा स्तर बना रहता है. पर्यावरणविदों का कहना है कि हमारी चिंताएं उन स्थानीय कारणों पर ज्यादा होनी चाहिए जिनकी वजह से दिल्ली की हवा साल भर तक खराब रहती है.

इन महीनों में भी साफ नहीं रहती दिल्ली

दिल्ली में प्रदूषण के लिए किसानों को कोसने वाले पर्यावरणविदों, नेताओं और नौकरशाहों के लिए ये आंकड़ा बहुत काम का है. दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण कमेटी (DPCC) का आंकड़ा बताता है कि 2012 से 2019 तक जनवरी से जुलाई महीने के बीच पीएम 2.5 और पीएम 10 कभी नॉर्मल नहीं रहा. पीएम-10 यहां 237 से 326 तक रहा. जबकि पीएम 2.5 इस दौरान 101 से 147 तक रिकॉर्ड किया गया. पीएम 10 की सेफ लिमिट 100 माइक्रो ग्राम प्रति क्‍यूबिक मीटर (एमजीसीएम) और पीएम 2.5 की 50-60 एमजीसीएम है. ध्यान रहे इन महीनों में न तो धान की कटाई होती है और न किसान पराली जलाता. इसके बावजूद पराली जलाने की घटनाओं को जायज नहीं ठहराया जा सकता.

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दिल्ली की हवा को कौन कर रहा है जहरीला?


कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा कहते हैं कि दिल्ली का प्रदूषण उसके अपने कारणों से है. किसान उसका कारण नहीं है. पराली जले या न जले दिल्ली तो हमेशा जहरीली गैस का चैंबर बनी रहती है. दिल्ली के लोग अपनी लाइफस्टाइल नहीं बदलना चाहते. एसयूवी कारें बढ़ती जा रही हैं और दोष देते हैं किसानों को. कंस्ट्रक्शन बढ़ता जा रहा है और दोष देते हैं किसानों को. एसी बढ़ते जा रहे हैं और दोष दे रहे हैं किसानों का. सच तो ये है कि दिल्ली को अपने कारणों के समाधान पर काम करना चाहिए.

दिल्ली के प्रदूषण में पराली का योगदान

वायु प्रदूषण में किस कारक का कितना योगदान है इसके आंकड़े रोज बदलते रहते हैं. इसकी निगरानी करने वाली पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक संस्था है सफर (SAFAR), जिसका पूरा नाम है इंडिया सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फॉरकास्टिंग एंड रिसर्च. इसके मुताबिक दिल्ली और आसपास के इलाकों में दूषित हवा के लिए जिम्मेदार कारकों में पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं का 4 से लेकर 44 प्रतिशत तक योगदान है. दिवाली से दो दिन पहले पराली का योगदान 4 फीसदी था जो दिवाली के दिन 19 फीसदी था. अधिकतम 44 फीसदी 31 अक्टूबर को रिकॉर्ड किया गया है.
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दिल्ली में पीएम 2.5 के स्रोत


दिल्ली में प्रदूषण के लिए कौन जिम्मेदार है?

दिल्ली के प्रदूषण पर वर्ष 2016 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी (आईआईटी), कानपुर ने एक स्टडी की थी. इसकी रिपोर्ट दिल्ली सरकार और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण कमेटी को सबमिट (सौंपी) की गई थी. यह रिर्पोट सार्वजनिक है. इसमें बताया गया है कि यहां प्रदूषण के लिए कौन कितना जिम्मेदार है.

>>पीएम10 (पीएम यानी पर्टिकुलेट मैटर, ये हवा में वो पार्टिकल होते हैं जिस वजह से प्रदूषण फैलता है) में सबसे ज्यादा 56 फीसदी योगदान सड़क की धूल का है.

>>पीएम 2.5 (पीएम 2.5 का अर्थ है हवा में तैरते वह सूक्ष्म कण जिनका व्यास 2.5 माइक्रोन से कम होता है) में इसका हिस्सा 38 फीसदी है.

सरकारें क्यों नहीं देतीं सहयोग?

देविंदर शर्मा कहते हैं कि नेताओं और कुछ नौकरशाहों के लिए किसान सॉफ्ट टारगेट हो गया है. प्रदूषण हो तो वो किसान को घेरते हैं. पानी की कमी हो तो वो किसान को कोसते हैं. किसी ने अन्नदाताओं के नजरिए को समझने की कोशिश नहीं की. यही कारण है कि हर डिबेट में किसान को खलनायक बनाया जा रहा है, जो बहुत गलत है. पंजाब में अकेले 200 लाख टन पराली होती है. हमारा तंत्र क्या इतनी पराली का समाधान कर पाएगा. आखिर क्या समाधान होना चाहिए इसका?

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दिल्ली में पीएम-10 के स्रोत


किसान जान बूझकर पराली नहीं जला रहा. जब किसान सरकार से यह कह रहे हैं कि हमें आप इसके निस्तारण के लिए 200 रुपये प्रति क्विंटल दे दीजिए. हम बिना जलाए इसका मैनेजमेंट कर लेंगे. तो फिर किसान की सपोर्ट करने के लिए सरकारें क्यों नहीं आगे आ रही हैं. पंजाब, हरियाणा और यूपी में कुल मिलाकर इसके लिए 3000 करोड़ रुपये का खर्च आएगा और समाधान हो जाएगा. यह दुखद बात है कि सरकारें मशीनों के लिए सब्सिडी देने का तैयार हैं लेकिन किसानों को पराली निस्तारण के लिए पैसा नहीं देना चाहतीं. समाज और सरकार सभी को किसानों के साथ खड़ा होना पड़ेगा तभी इसका समाधान होगा. यदि इसके बाद भी पराली जले तो एफआईआर करिए.



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First published: November 6, 2019, 10:08 AM IST
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