चीन के भिखारियों को मिलती है डिजिटल 'भीख', अब भारत में हुई डिमांड

दिल्ली-एनसीआर में एक तरफ तो भिखारियों की संख्या में तेजी आ रही है तो दूसरी तरफ भीख देने वाले लोगों की संख्या में लगातार कमी आ रही है.

Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: July 17, 2019, 4:33 PM IST
चीन के भिखारियों को मिलती है डिजिटल 'भीख', अब भारत में हुई डिमांड
पिछले साल ही दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली में भीख मांगने को अपराध घोषित करने वाले कानून को समाप्त कर दिया था.
Ravishankar Singh
Ravishankar Singh | News18Hindi
Updated: July 17, 2019, 4:33 PM IST
पिछले साल ही दिल्ली हाईकोर्ट ने भीख मांगने को अपराध घोषित करने वाले कानून को समाप्त कर दिया था. हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद ही दिल्ली में भीख मांगना अपराध की श्रेणी में नहीं आता. दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद दिल्ली पुलिस ने भिखारियों पर सख्ती करना लगभग बंद ही कर दिया. इस फैसले के बाद से ही दिल्ली-एनसीआर ही नहीं देश के दूसरे हिस्सों में भी भिखारियों की संख्या में और तेजी आई है. लेकिन, भीख मिलना पहले की तुलना में काफी कम हो गया है. भिखारियों का कहना है कि हाल के कुछ वर्षो में जब से डिजिटल ट्रांजेक्शन का दौर आया है भीख देने वाला छुट्टे का बहाना बना कर आगे बढ़ जाता है.

एक एनजीओ के मुताबिक एक साल पहले तक दिल्ली-एनसीआर में लगभग एक लाख भिखारी भीख मांगने का काम करते थे. सिर्फ दिल्ली-दिल्ली में ही 50 से 60 हजार भिखारी सड़कों पर भीख मांगते नजर आ रहे थे. पिछले साल की तुलना में इस साल भिखारियों की संख्या में कुछ ज्यादा ही तेजी आई है. दिल्ली-एनसीआर के लगभग सभी मेट्रो स्टेशनों पर भिखारी नजर आते हैं ही रेड लाइट और चौक-चौराहों पर भी भिखारी कुछ ज्यादा देखे जा रहे हैं.

भिखारी दिल्ली-एनसीआर के हर मेट्रो स्टेशन और चौक-चौराहों पर नजर आ जाते हैं


नोएडा सेक्टर 15 मेट्रो स्टेशन पर भीख मांगने का काम करने वाली कन्नौज की रहने वाली एक महिला अपना नाम नहीं बताने के शर्त पर न्यूज 18 हिंदी के साथ बातचीत में कहती हैं, 'मैं पिछले 10-15 सालों से भीख मांगने का काम करती हूं. मेरे तीन बच्चे हैं. तीनों बच्चे अब बड़े हो गए हैं. पहले दिल्ली में इधर-उधर भीख मांगने का काम करती थी, लेकिन पिछले चार-पांच सालों से नोएडा के सेक्टर 16 मेट्रो स्टेशन और उसके आस-पास के इळाकों में भीख मांगती हूं. दो-तीन साल पहले तक पांच सौ रुपए से लेकर हजार-पंद्रह सौ रुपए तक भी हो जाते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों से 500 रुपए अगर हो जाए तो यही बड़ी बात है. लोग-बाग छुट्टे का बहाना बना कर आगे बढ़ जाते हैं. खासकर छोटे उम्र के बच्चे और बच्चियों के पास खुल्ले नहीं होते हैं. वे लोग कहते हैं कि नंबर बताओ PAYTM कर देते हैं. बड़े लोग तो भीख देना ही नहीं चाहते. छोटे बच्चे और बच्चियां ही ज्यादा पैसे देती आ रही थी वह भी अब कम हो गया है. इसलिए अब हमलोग भी अपना तरीका बदल रहे हैं.’

पहले भीख मांगना अपराध कीश्रेणी में आता था, लेकिन पिछले साल दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद पुलिस भिखारी को परेशान नहीं कर सकती है


पिछले साल दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि मुंबई में भीख मांगने वाली रोकथाम कानून में काफी संतुलन है. इस कानून में भीख मांगना अपराध की श्रेणी में गिना जाता है. लेकिन, जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंडर और कर्णिका सहनी ने अपने-अपने जनहित याचिका में भिखारियों के लिए मूलभूत मानवीय सुविधाएं और मौलिक अधिकार मुहैया कराए जाने का अनुरोध किया था. हर्ष मंदर भारत में भूख और भिखारियों पर काफी सालों से काम करते आ रहे हैं. इस काम के लिए उन्हें राजीव गांधी सदभावना अवार्ड भी मिल चुका है.

ताज्जुब की बात यह है कि देश की संसद ने भीख मांगने के खिलाफ अब तक कोई भी कानून पारित नहीं किया है. दिल्ली सहित देश के दूसरे कई राज्यों में मुंबई में भीख मांगने वाली रोकथाम अधिनियम 1959 को ही अपनाया जाता है. इस अधिनियम के तहत अभियोजन पक्ष को (धारा 11) के तहत भिक्षा मंगवाने वाले गिरोहों और लोगों को गिरफ्तार किया जा सकता है. धारा 11 के तहत दोषी पाए गए लोगों को कम से कम एक वर्ष और अधिकतम तीन साल की सजा सुनाई जाती है. यह अधिनियम पुनर्वास करने के लिए बहुत काम करता है, लेकिन दंड का प्रावधान नहीं के बराबर है. इस अधिनियम की धारा 11 के तहत व्यक्ति को रोजगार के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.
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भिखारी भी अब हाईटेक होना चाह रहे हैं.


साल 1960 में इस अधिनियम को दिल्ली में लागू किया गया था. कई सालों के बाद इस अधिनियम को पहली बार सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर और कर्णिका सावनी ने चुनौती दी, जिन्होंने अधिनियम की धारा 11 को छोड़कर सभी वर्गों की वैधता और संवैधानिकता पर सवाल उठाया था.

न्यूज 18 हिंदी ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद दिल्ली-एनसीआर के कई इलाकों में भिखारियों की स्थिति का जायजा लिया. न्यूज 18 तफ्तीश में ज्यादातर भिखारियों की दयनीय स्थिति के बारे में पता चला, लेकिन तफ्तीश में ऐसे भी कई गिरोहों के बारे में पता चला, जो मासूम बच्चों और अनाथों से भीख मंगवाने का काम कराते हैं. दिल्ली में ज्यादातर भिखारी पहाड़गंज, हजरत निजामुद्दीन, लाल किला, चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के इलाके, कनॉट प्लेस और पहाड़गंज के इलाकों में देखने को मिलते हैं. खासकर टूरिस्ट प्लेस और पुराना किला के भैरव मंदिर हो या कनॉट प्लेस के हनुमान मंदिर इन जगहों पर भिखारियों की संख्या बहुत ज्यादा होती है.

क्या चीन की तरह भारत में भी भिखारियों को क्यूआर कोड देना जरूरी हो गया है?


बता दें कि चीन में भिखारियों ने भीख मांगने का नया तरीका निकाला है. यहां के भिखारी पैसे मांगने के लिए क्यूआर कोड और ई-वॉलेट का इस्तेमाल कर रहे हैं. भिखारी इन नए तरीकों से हर हफ्ते 45 हजार रुपये तक की कमाई कर रहे हैं. बताया जाता है कि बैंकों ने इसके लिए बकायदा भिखारियों का अपने यहां पर अकाउंट भी खोला हुआ है. खबर है कि जो भी भिखारियों को क्यूआर कोड या फिर ई-वॉलेट के जरिए पैसा देता है उनका डाटा कंपनियों को बेच दिया जाता है.

चीन में भिखारियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अब चीन में अलीबाबा की अलीपे और वी चैट जैसी बड़ी ई-वॉलेट कंपनियां भी मैदान में उतर चुकी हैं. चीन के इन भिखारियों ने यहां के पर्यटन स्थलों को अपने कब्जे में ले लिया है. ज्यादातर भिखारी पर्यटन स्थल पर डिजिटल पेमेंट या क्यूआर कोड सिस्टम लेकर बैठे होते हैं. भिखारियों का कहना है कि डिजिटल पेमेंट की वजह से उन्हें आसानी से भीख मिल जाती है. भिखारियों का कहना है कि पहले लोग छुट्टे पैसे नहीं होने का बहाना करते थे लेकिन अब ऐसा नहीं होता.

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First published: July 17, 2019, 4:31 PM IST
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