कोर्ट में बोले मुस्लिम पक्ष के वकील-अयोध्या की विवादित भूमि कभी निर्मोही अखाड़े की नहीं थी

भाषा
Updated: September 11, 2019, 11:26 PM IST
कोर्ट में बोले मुस्लिम पक्ष के वकील-अयोध्या की विवादित भूमि कभी निर्मोही अखाड़े की नहीं थी
प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस भूमि विवाद मामले में 21 वें दिन की सुनवाई की.

अयोध्या केस (Ayodhya Case) की सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षों ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से कहा कि अयोध्या की विवादित भूमि कभी भी निर्मोही अखाड़ा (Nirmohi Akhara) की नहीं रही थी.

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नई दिल्ली. अयोध्या केस (Ayodhya Case) की सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षों ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से कहा कि अयोध्या की विवादित भूमि कभी भी निर्मोही अखाड़ा (Nirmohi Akhara) की नहीं रही थी. प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस भूमि विवाद मामले में 21 वें दिन की सुनवाई की. पीठ ने दोपहर दो बजे बैठने के बाद करीब डेढ़ घंटे मामले की सुनवाई की.

ये थी राजीव धवन की दलील
मुस्लिम पक्षों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने न्यायालय से कहा कि अखाड़ा इस कानूनी अड़चन से पार नहीं पा सकता कि (विवादित) स्थल पर कथित कब्जे पर उसके पुन: दावे से संबद्ध 1959 के मुकदमे की समय सीमा लिमिटेशन कानून के तहत खत्म हो गई. उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ भूमि का एक तिहाई हिस्सा अखाड़ा को प्रदान किया था.

अखाड़ा ने कहा था, 'जन्मस्थान अब जन्मभूमि के रूप में जाना जाता है और हमेशा ही उसका रहा है. धवन ने न्यायमूर्ति एस.ए. बोबडे, न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस.ए. नजीर की सदस्यता वाली पीठ से कहा कि निर्मोही अखाड़ा के मुताबिक 'उसका रहा’ शब्द ने मुकदमा दायर करने के लिए लिमिटेशन अवधि को विस्तारित किया.

धवन ने सुन्नी वक्फ बोर्ड और मूल वादी एम सिद्दीक सहित अन्य की ओर से पेश होते हुए कहा, 'इसका जवाब है कि यह (भूमि) उनकी(अखाड़े की) नहीं रही है और अखाड़ा ना तो ट्रस्टीशिप पर अंग्रेजों के कानून के तहत और ना ही शिबैत(उपासक) के रूप में इस जमीन का मालिक है.

मुस्लिम पक्षों ने कहा है कि अदालत द्वारा नियुक्त रिसीवर द्वारा पांच जनवरी 1950 को विवादित स्थल को कुर्क किये जाने के करीब नौ साल बाद अखाड़ा ने 1959 में एक मुकदमा दायर किया था.

1949 की घटना
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दरअसल, इससे पहले 22-23 दिसंबर 1949 को कुछ उपद्रवी तत्वों ने विवादित ढांचे के मध्य गुंबद के अंदर कथित तौर पर मूर्तियां रखी थी. उनका कहना है कि 1950 में हुई इस कथित कार्रवाई के तीन साल के अंदर मुकदमा दायर किया जाना चाहिए था और इस तरह अखाड़ा के 1959 के मुकदमे की समय सीमा खत्म हो गई. न्यायालय बृहस्पतिवार को भी सुनवाई जारी रखेगा, जब धवन दलीलें आगे बढ़ाएंगे.
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First published: September 11, 2019, 11:18 PM IST
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